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    पैतृक संपत्ति में हक देकर बेटियों को दहेज हत्या से बचाएंः डा. वीणा तलवार ओल्डेनबर्ग  

    By Rumni GhoshEdited By: Shubham Tiwari
    Updated: Sat, 30 May 2026 09:20 PM (GMT+05:30)

    दहेज हत्याओं और महिलाओं की असुरक्षा पर डॉ. वीणा तलवार ओल्डेनबर्ग ने अपने शोध और अनुभवों को साझा किया है। उन्होंने बेटियों को पैतृक संपत्ति में अनिवार् ...और पढ़ें

    डा. वीणा तलवार ओल्डेनबर्ग

    डा. वीणा तलवार ओल्डेनबर्ग 

    HighLights

    1. दहेज हत्याएं रोकने को बेटियों को पैतृक संपत्ति में हक।

    2. डॉ. वीणा ओल्डेनबर्ग ने ब्रिटिश कानूनों से जोड़ा दहेज का इतिहास।

    3. शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता महिलाओं की सबसे बड़ी सुरक्षा।

    रुमनी घोष। एक महीने के भीतर भोपाल की त्विषा शर्मा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर और ग्वालियर की पलक रंजन ससुराल में मृत पाई गईं...21वीं में महिलाओं के आत्मनिर्भर होने का नारा लगाते-लगाते कथित दहेज हत्या की तीन चर्चित घटनाओं ने समाज से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को उद्वेलित कर दिया है। स्थिति यह है कि ससुराल में प्रताड़ना के बाद मायके में आसरा भी असुरक्षित हो जाता है। कानूनी प्रविधान होने के बावजूद सामाजिक या पारंपरिक मान्यताओं के कारण बेटियों को आज भी शादी के बाद पैतृक संपत्ति में बेटों जैसा अधिकार नहीं मिलता। यही असुरक्षा बेटियों के घुटकर जीने या हत्या/आत्महत्या की स्थिति तक पहुंचाती है। ऐसे में बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों की तरह अनिवार्य हिस्सेदारी देकर उन्हें एक सुरक्षा आवरण दिया जा सकता है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी सहित अमेरिका के कई प्रतिष्ठित कालेजों में प्रोफेसर रह चुकीं 79 वर्षीय डाक्टर जानी-मानी इतिहासविद् और समाजशास्त्री डा. वीणा तलवार ओल्डेनबर्ग ने बताया है कि वेद-पुराणों में स्त्रीधन के रूप में महिलाओं को दिए गए आर्थिक हक का स्वरूप अंग्रेजों द्वारा बनाए एक कानून के बाद धीरे-धीरे बदलता गया। ...और पंरपरा के नाम पर महिला अपराध का एक शृंखलाबद्ध दौर शुरू हुआ। ...और यह अभी भी जारी है। लखनऊ के प्रतिष्ठित परिवार में जन्मीं और 19 साल की उम्र में दिल्ली के धनाढ्य परिवार में ब्याही डा. वीणा तलवार खुद भी घरेलू हिंसा की पीड़ित रह चुकी हैं। खुद को जलने से बचाने के लिए पेटीकोट और ब्लाउज में ही घर से भागी थीं। हालांकि फिर पकड़ी गईं और उसके बाद उन पर और जुल्म हुए, लेकिन वह किसी तरह अपने पिता के घर लखनऊ वापस लौट पाईं। एमए की पढ़ाई पूरी कर स्कालरशिप लेकर अमेरिका गईं। पीएचडी की और बतौर इतिहासविद् खुद को स्थापित किया। कोलंबिया यूनिवर्सिटी सहित अमेरिका के कई प्रतिष्ठित कालेजों में प्रोफेसर रह चुकीं 79 वर्षीय डाक्टर वीणा ओल्डेनबर्ग की लखनऊ पर लिखी पुस्तक 'द मेकिंग आफ कोलोनियल लखनऊः 1856-1877' को ख्यात प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस ने प्रकाशित किया। नौ साल तक उन्होंने इस बात पर शोध किया कि दहेज ने कैसे समाज को जकड़ लिया है। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे दहेज हत्याओं पर लिखी उनकी पुस्तक 'डाउरी मर्डर: द इंपीरियल ओरिजिन आफ कल्चरल क्राइम' और उसके निष्कर्षों पर विस्तार से बातचीत की। उन्होंने तवायफों की जिंदगी और गांव से शहर में तब्दील हुए गुड़गांव पर भी पुस्तक लिखी है। मूलतः न्यूयार्क में रहने वाली डाक्टर ओल्डेनबर्ग इन दिनों अल्पावधि के लिए देश आई हुई हैं और गुड़गांव में रह रही हैं। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंशः

    लखनऊ के इतिहास, रिवायत, नवाबी खानदानों के बारे में लिखते-लिखते दहेज के बारे में शोध का विचार कैसे आया?
    - मैं खुद ही भुक्तभोगी हूं... इसलिए इस दर्द को मुझसे बेहतर कौन समझ सकता है। यही वजह है कि 'डाउरी मर्डर' में मैंने अपना शोध वेद-पुराणों में स्त्रीधन की व्याख्या, 19वीं सदी में महिलाओं की असामयिक मौत के कारणों से शुरू कर 2000 तक मामलों को टटोला। मेरी यह पुस्तक आक्सफोर्ड प्रेस ने 2000 में प्रकाशित की और पेंगुइन ने 2010 में पुनः प्रकाशित किया।

    भुक्तभोगी से क्या आशय है?

    - मैं लखनऊ के बहुत ही प्रतिष्ठित परिवार से संबंध रखती हूं। मेरे परदादा के परदादा गुलाब राय महाराजा रणजीत सिंह की सेना में ऊंचे पद पर ओहदेदार थे। उन्हें 'तलवार' की पदवी मिली थी। उसके बाद हमारा परिवार लखनऊ आकर बस गया। वे सब भी नवाबों के दरबार में ऊंचे पदों पर रहे। यह 1966 की बात है... मैं 19 साल की थी, तो मेरी शादी दिल्ली के रईस पंजाबी परिवार में हो गई। बीए की डिग्री भी पूरी नहीं हुई थी कि शादी की रस्में शुरू हो गई थीं। हालांकि मुझ पर मेरे माता-पिता की ओर से कोई दबाव नहीं था, लेकिन उस समय सामाजिक ताना-बाना, इस तरह का गठन, इस तरह दबाव था कि मैंने खुद ही मान लिया था कि कोई देखने आया है तो शादी करनी होगी। शादी के बाद जब मुझे पति की गलत आदतों, बिजनेस सीक्रेट्स के बारे में जानकारी मिलने लगी और विरोध दर्ज करवाया तो मुझ पर अत्याचार शुरू हुए। सात-आठ महीने के भीतर ही उन्होंने मुझे जलाने की कोशिश की। ब्लाउज और पेटीकोट में किसी तरह निकलकर भागी थी। हालांकि उन लोगों ने मुझे पकड़कर फिर बंद कर दिया था। लखनऊ में मां को सूचना भिजवाई कि वे लोग आकर ले जाएं। फिर मेरे माता-पिता ने तुरंत दिल्ली के तात्कालिक आईजी को सूचित किया। उन्होंने पुलिस फोर्स भेजकर मुझे मुक्त करवाया और घर भिजवाया।

    यानी माना जाए कि आपके पास माता-पिता का सपोर्ट सिस्टम था, इसलिए आप इससे निकल पाई थीं?
    - बिलकुल सही। मेरे माता-पिता ने कभी नहीं सिखाया-खेलो विद द कार्ड डेब्ट टू यू... यानी जो पत्ते मिले हैं, उससे ही खेला। इस कहावत का अर्थ है समझौता। समाज के दबाव के बावजूद मेरे माता-पिता ने कभी समझौता कर रहने के लिए नहीं कहा। ... इसलिए मैं लौट पाई। देश में अधिकांश परिवारों में आज भी लड़कियों को उनके माता-पिता ससुराल भेजते वक्त यह नहीं कहते हैं।

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    और समाज का कितना दबाव था?

    - समाज का इतना दबाव था कि जब लखनऊ में मैं पढ़ने के लिए घर से निकलकर कॉलेज जाती थी, तो आसपास लोग कहते थे, यह वही लड़की है, जो ससुराल से वापस आ गई है। ...लेकिन यह नजरिया तब बदल गया, जिस दिन मैंने लखनऊ के इतिहास पर किताब लिखी और उससे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। शिक्षा ने मेरी जिंदगी बदल दी।

    "राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में देशभर में 5,737 दहेज हत्याएं दर्ज हुईं। यानी हर दिन औसतन 16 हत्याएं दहेज के कारण हुई। 2023 में 6,156 दहेज हत्या के मामले दर्ज हैं।"

    डाउरी मर्डर' में आप स्त्रीधन के पक्ष में दलील देती नजर आती हैं। यह भी एक तरह से दहेज ही है। जहां दहेज बंद करने की बात चल रही है, वहां आप इसे बढ़ावा देने की बात कर रही हैं?
    - जब मैंने समाज की दहेज की उत्पत्ति पर शोध शुरू किया तो वेद-पुराणों में स्त्रीधन का उल्लेख मिला। इसमें विवाह के वक्त लड़कियों को स्त्रीधन दिए जाने का उल्लेख मिलता है। इस पर सिर्फ उसका ही हक होता था। इसमें चल-अचल संपत्ति सभी होते थे और यह उसकी सुरक्षा के लिए था, लेकिन अंग्रेजों द्वारा बनाए गए एक कानून के लागू होने के बाद इसने धीरे-धीरे हमारे सामाजिक ताने-बाने को तोड़ दिया और महिलाओं का धन-संबल छीनने के लिए परंपरा या संस्कृति की आड़ में श्रृंखलाबद्ध तरीके से महिला अपराध का जाल बिछाया गया।

    अंग्रेजों ने कौन-सा कानून बनाया था, जिससे महिलाओं की संपत्ति छीनी जाने लगी?

    - 16वीं सदी तक हमारे देश में जमीन पर उगाई गई फसल या धन-संपदा पर व्यक्ति विशेष का हक होता था, लेकिन जमीन किसी के नाम होती थी। भू-राजस्व इकट्ठा करने के लिए अंग्रेजों ने 'परमानेंट सेटलमेंट एक्ट-1793' लागू किया। इसे आम बोलचाल की भाषा में 'जमीदारी प्रथा' का नाम दिया गया। इसके लागू होने के बाद जमीन व्यक्ति विशेष के नाम होने लगा। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का मकसद था कि फसल हो या नहीं हो, ज्यादा से ज्यादा कर वसूलना। इसमें वह सफल हुए। और इधर जमीन पर कब्जे के लिए महिलाओं को हथियार बनाया गया। अब आप कड़ियों को मिलाइए... जमीन कब्जाने के लिए शादी के नाम पर लड़के वालों द्वारा जमीन मांगी जाने लगी। जिस घर में ज्यादा लड़के, उस घर के हिस्से में ज्यादा जमीन आने लगी। महिला रहे या नहीं रहे, जमीन उनकी ही रह जाती थी। इस स्थिति में महिलाओं पर अत्याचार शुरू हुए। महिलाओं पर आरोप लगाकर उन्हें प्रताड़ित करना। यहां तक कि उनकी हत्याएं होने लगीं। (आज भी यही होता है)। इसके बाद की कड़ी है 'भ्रूण हत्या'। जितनी लड़कियां होंगी, उतनी ज्यादा जमीनें बंट जाएंगी या चली जाएंगी। इस डर से लड़कियों को कोख में ही मारा जाने लगा। विधवाओं की संपत्ति पर नजर गढ़ाए परिजन उन्हें डायन घोषित कर देते हैं। ऐसे ही ढेरों अपराध। तभी मैं बार-बार दलील देती हूं कि डाउरी मर्डर, डाउरी केस, यानी दहेज हत्या या दहेज मामला लिखकर इस अपराध के दायरे को घटाया जा रहा है। श्रृंखलाबद्ध तरीके से महिला अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है। 18-19वीं सदी, यानी अंग्रेजों के समय से इसने विस्तार पाया, लेकिन हम सिर्फ दहेज हत्या का नाम देकर इसे एक या दो परिवारों के बीच सीमित दायरे में हुआ अपराध बताकर खामोशी से बैठ जाते हैं। मामला कोर्ट तक भी जाता है तो दो परिवारों की लड़ाई मानकर ही फैसला सुनाया जाता है, जबकि असली परेशानी कहीं और है।

    ससुराल पक्ष की दलील है कि भोपाल की त्विषा शर्मा और नोएडा की पलक ने आत्महत्या की, जबकि दीपिका की मौत छत से गिरने से हुई। 18वीं सदी के रोजनामचे व दस्तावेजों में महिलाओं के प्रति किस तरह के अपराधों का उल्लेख मिला?


    - इसमें बहुत ही रोचक तथ्य निकलकर आए थे। जब मैंने 18वीं-19वीं सदी के लखनऊ में दर्ज अपराधों के रिकॉर्ड देखे तो पता चला कि सालभर में सिर्फ तीन हत्याएं हुई हैं। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ तो मैंने उनसे सभी मौतों की जानकारी मिली। जब उसे टटोला तो पता चला कि सिर्फ लखनऊ में ही सालभर में 300 महिलाएं घर के भीतर बने कुएं में डूबकर मर गईं। सोचने वाली बात यह है कि घर का चप्पा-चप्पा संभालने वाली महिलाएं क्या इतनी ही असावधानी पूर्वक चलती थीं कि कुएं में गिर कर मर जाती थीं। इस घटना को ग्रेटर नोएडा वाली दीपिका नागर से मिला लीजिए। वह छत पर इतनी लापरवाही से चल रही थी कि वहां से गिर गईं। ऐसा ही एक दौर था कि स्टोव से साड़ी में आग लग जाती थी और महिलाएं जलकर मर जाती थीं।

    आप बार-बार महिलाओं को दहेज यानी स्त्रीधन दिए जाने की पक्षधर हैं। जिस दहेज की वजह से इतनी हत्याएं हो रही हैं। आप उसकी पैरोकारी कैसे कर सकते हैं?
    - इसका जवाब तथ्यात्मक से ज्यादा दार्शनिक है। महिलाओं को ऐसा स्त्रीधन दिया जाना चाहिए, जो हमेशा-हमेशा के लिए उसके पास सुरक्षित रहे। कोई उससे वह छीन न सके। जैसे- शिक्षा और पैतृक संपत्ति में उसका बराबर का अधिकार है। शिक्षा से वह आत्मनिर्भर बनेगी और यह हमेशा से ही उसके पास रहेगी। दूसरा, पैतृक संपत्ति में बराबरी का अधिकार। पैतृक संपत्ति में अधिकार देते वक्त इस तरह की शर्त या विल की जाए कि महिला की इच्छा के विरुद्ध कोई उससे वह संपत्ति छीन सके। ताकि वह सुरक्षित रहे। पति से तालमेल न बैठने और ससुराल में असामान्य परिस्थितियां पैदा होने पर वह वहां रहने को मजबूर न हो। वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो। हो सकता है कि ऐसा होता तो शायद त्विषा, दीपिका और पलक मेरी तरह ससुराल का चौखट लांघकर अपने घर लौट सकतीं। वहीं रहने की मजबूरी नहीं होती।

    आपके अनुसार विवाह के नियम कैसे हों, ताकि विवाहिताओं की हत्याएं रुक सकें?


    - कान्ट्रैक्ट मैरेज। मैं मानती हूं कि हमारे समाज में इसे मान्यता मिलना बहुत आसान नहीं है, लेकिन मुझे निजी तौर पर यही विकल्प समझ में आता है। पारंपरिक रीति-रिवाज हो या कोर्ट मैरेज, दोनों से ही ज्यादा जरूरी मुझे यह लगता है कि वर-वधु के बीच साझा अनुबंध होना चाहिए, कि वह अपने वैवाहिक जीवन को कैसे जीना चाहते हैं। इससे एक दूसरे के विचारों को समझ पाएंगे। जब इस अनुबंध पर कानूनी मुहर लगेगी, तो दोनों ही उसे मानने के लिए बाध्य होंगे। आसानी से इसे तोड़ नहीं पाएंगे। यह बहुत सी समस्याओं का हल है। मेरी और मेरे पति डाक्टर फिलिप ओल्डेनबर्ग की शादी ऐसे ही हुई थी। हम दोनों ने मिलकर एक अनुबंध तैयार किया और उसे मैरेज रजिस्ट्रार से साइन करवा लिया। आज जो शादी परंपरा से हुई थी, वह तो सात-आठ महीने भी नहीं चली, लेकिन डाक्टर ओल्डेनबर्ग और मेरी अनुबंध की शादी को 52 साल हो गए हैं।