फ्रीहोल्ड से लीजहोल्ड तक... क्या हैं भारत में जमीन मालिकाना हक के नियम?
भारत में जमीन पर मालिकाना हक की व्यवस्था राज्यों के अनुसार अलग-अलग है, जिसमें फ्रीहोल्ड, लीजहोल्ड, पट्टा, भूमिधारी और रैयती जैसे कई प्रकार के अधिकार प ...और पढ़ें

(यह तस्वीर AI से बनाई गई है)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में जमीन पर मालिकाना हक को लेकर एक समान व्यवस्था नहीं है। भूमि प्रशासन मुख्य रूप से राज्य सरकारों का विषय होने की वजह से अलग-अलग राज्यों में नियम, कानून और शब्दावली अलग-अलग हैं। फ्रीहोल्ड, लीजहोल्ड, पट्टा, भूमिधारी और रैयत जैसे कई प्रकार के अधिकार प्रचलित हैं। आइए समझते हैं कि भूमि के प्रमुख मालिकाना हक कौन-से हैं और इनमें क्या अंतर है।
फ्रीहोल्ड और लीजहोल्ड मालिकाना हक
फ्रीहोल्ड प्रॉपर्टी में खरीदार को जमीन और उस पर बनी बिल्डिंग पर बिना किसी समय सीमा के पूर्ण अधिकार मिलता है। वह इसे बेच, गिफ्ट या ट्रांसफर कर सकता है। इसके उलट, लीजहोल्ड में जमीन का मूल मालिक (सरकार या विकास प्राधिकरण) तय अवधि, जैसे 99 साल, के लिए कब्जा और इस्तेमाल का अधिकार देता है। अवधि खत्म होने पर अधिकार वापस मूल मालिक के पास चला जाता है।
पट्टा, भूमिधारी और रैयती अधिकार
‘पट्टा’ राजस्व रिकॉर्ड का एक दस्तावेज है, जो राज्यवार अलग-अलग अधिकार देता है। इसे सीधे फ्रीहोल्ड नहीं कहा जा सकता है। उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के लिए ‘भूमिधारी अधिकार’ दिए जाते हैं, जो ट्रांसफर या गैर-ट्रांसफर हो सकते हैं। पूर्वी भारत के कई राज्यों में ‘रैयती अधिकार’ प्रचलित हैं, जो किसानों को जमीन पर कब्जा और खेती का अधिकार देते हैं।
अपार्टमेंट और सोसाइटी में ओनरशिप
फ्लैट खरीदने पर व्यक्ति को अपने अपार्टमेंट का मालिकाना हक और कॉमन एरिया में आनुपातिक शेयर मिलता है। लेकिन नीचे की जमीन का अधिकार फ्रीहोल्ड या लीजहोल्ड हो सकता है, जो सोसाइटी या बिल्डर के दस्तावेजों पर निर्भर करता है।
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भूमि खरीद में धोखाधड़ी से कैसे बचें
नेशनल बिल्डिंग कोड और रेरा के अनुसार, जमीन खरीदने से पहले कम से कम 30 साल पुराने मालिकों का इतिहास तथा कर्ज-बंधक से जुड़े भारमुक्त प्रमाण पत्र अवश्य जांचें। रजिस्ट्री के बाद नामांतरण (म्यूटेशन) जरूर करवाएं, ताकि राजस्व रिकॉर्ड में आपका नाम दर्ज हो जाए। इससे भविष्य में विवाद की आशंका काफी कम हो जाती है।