एंटीबायोटिक दवाओं के गलत इस्तेमाल से वैश्विक स्वास्थ्य संकट, भारत के लोगों पर क्या पड़ रहा असर?
दुनियाभर में एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक और गलत इस्तेमाल हो रहा है, खासकर 'वॉच' श्रेणी की दवाओं का, जिससे एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढ़ रहा है। ...और पढ़ें

दुनिया में एंटीबायोटिक दवाओं का गलत इस्तेमाल (प्रतीकात्मक फोटो)
HighLights
दुनिया में एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक और गलत इस्तेमाल।
99% देशों में 'वॉच' श्रेणी की एंटीबायोटिक्स का अत्यधिक उपयोग।
भारत में भी एंटीबायोटिक खपत आदर्श स्तर से अधिक।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दुनिया के अधिकांश देशों में एंटीबायोटिक दवाओं का जरूरत से ज्यादा और कई मामलों में गलत इस्तेमाल हो रहा है। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि लगभग सभी देश विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की वॉच श्रेणी की एंटीबायोटिक्स का आवश्यकता से अधिक उपयोग कर रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यही प्रवृत्ति एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (दवाओं के प्रति बैक्टीरिया का प्रतिरोध विकसित होना) जैसी गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य समस्या को बढ़ा रही है।यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल द लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित हुआ है।
इसमें यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन सहित कई संस्थानों के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिसकी मदद से देश यह आकलन कर सकेंगे कि उनकी स्वास्थ्य जरूरतों के अनुरूप एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल हो रहा है या नहीं।
दुनिया में एंटीबायोटिक दवाओं का गलत इस्तेमाल
शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे दवाओं के अनावश्यक और अनुचित उपयोग पर नियंत्रण लगाने में मदद मिल सकती है।डब्ल्यूएचओ एंटीबायोटिक्स को एक्सेस, वॉच और रिजर्व तीन श्रेणियों में बांटता है।
इनमें एक्सेस दवाएं सामान्य संक्रमणों के इलाज के लिए पहली पसंद होती हैं, जबकि वॉच और रिजर्व श्रेणी की दवाओं का उपयोग गंभीर और जटिल संक्रमणों के लिए सीमित रखा जाना चाहिए।
अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2019 में दुनिया भर में बैक्टीरियल संक्रमणों के इलाज के लिए करीब 43 अरब एंटीबायोटिक कोर्स की जरूरत थी। इनमें से लगभग 77 प्रतिशत एक्सेस श्रेणी की दवाएं होनी चाहिए थीं, जो संयुक्त राष्ट्र के 2030 तक कम से कम 70 प्रतिशत एक्सेस एंटीबायोटिक्स के उपयोग के लक्ष्य का समर्थन करता है।
शोधकर्ताओं ने 67 देशों के वास्तविक आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि 72 प्रतिशत देशों में कुल एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल अनुमान से अधिक था, जबकि 99 प्रतिशत देशों में वॉच श्रेणी की एंटीबायोटिक्स का उपयोग जरूरत से ज्यादा किया जा रहा था।
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वहीं, आधे से अधिक देशों में रिजर्व श्रेणी की दवाओं का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं हो रहा था, जिससे गंभीर और दवा-प्रतिरोधी संक्रमण वाले मरीजों के इलाज पर असर पड़ सकता है।
इसके अलावा, 60 प्रतिशत देश अब भी ऐसी एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिन्हें डब्ल्यूएचओ ने मरीजों को न लिखने की सलाह दी है।
भारत के संदर्भ में अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि प्रति 1,000 लोगों पर प्रतिदिन एंटीबायोटिक्स की आदर्श खपत 9.9 से 14.7 डिफाइंड डेली डोज (डीआइडी) होनी चाहिए, जबकि वास्तविक खपत 18.3 डीआइडी दर्ज की गई। इसमें वॉच श्रेणी की एंटीबायोटिक्स का हिस्सा सबसे अधिक रहा।
शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि कम और मध्यम आय वाले देशों में संक्रामक रोगों और दवा-प्रतिरोध का बोझ अधिक होने के बावजूद, महंगी और प्रभावी एंटीबायोटिक्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल उच्च आय वाले देशों में हो रहा है।
उन्होंने सरकारों से ऐसी राष्ट्रीय नीतियां बनाने का आग्रह किया है, जो गैर-जरूरी एंटीबायोटिक्स के उपयोग पर रोक लगाएं और जरूरतमंद मरीजों को समय पर सही दवाएं उपलब्ध कराएं।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
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