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    जनगणना से पहले आवास गणना क्यों है जरूरी, क्या है इसकी अहमियत? इसी साल शुरू होगी गिनती

    Updated: Thu, 15 Jan 2026 06:10 PM (IST)

    भारत में अगली जनगणना की तैयारी शुरू हो गई है, जो दो चरणों में होगी। पहला चरण अप्रैल 2026 से सितंबर 2026 तक आवास जनगणना का होगा, जिसके बाद फरवरी 2027 स ...और पढ़ें

    जनसंख्या से पहले क्यों होती है आवास जनगणना (फाइल फोटो)

    जनसंख्या से पहले क्यों होती है आवास जनगणना (फाइल फोटो)

    HighLights

    1. जनगणना दो चरणों में होगी: आवास और जनसंख्या गिनती।

    2. आवास जनगणना घरों की पहचान कर आबादी का अनुमान लगाती है।

    3. यह सरकार को विकास योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण डेटा देती है।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में होने वाली अगली जनगणना की तैयारी शुरू हो चुकी है। केंद्र सरकार ने इसकी अधिसूचना जारी कर दी है। यह जनगणना दो चरणों में पूरी की जाएगी। पहला चरण आवास जनगणना और हाउस लिस्टिंग का होगा, जबकि दूसरे चरण में जनसंख्या की गिनती की जाएगी।

    पहला चरण 1 अप्रैल 2026 से 30 सितंबर 2026 तक चलेगा। इसके बाद फरवरी 2027 से जनसंख्या जनगणना शुरू होगी। सवाल यह है कि जनसंख्या गिनने से पहले आवास जनगणना क्यों की जाती है और यह इतनी अहम क्यों होती है?

    जनगणना की बुनियाद क्यों है आवास गणना?

    आवास जनगणना का मकसद देश में मौजूद हर आवासीय और गैर-आवासीय मकान की पहचान करना होता है। सरकार यह जानती है कि किस इलाके में कितने घर हैं और वहां कितनी आबादी रह सकती है। इसी जानकारी के आधार पर दूसरे चरणयानी जनसंख्या जनगणना की पूरी योजना तैयार होती है। इस प्रक्रिया से यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी घर या परिवार जनगणना से छूट न जाए। यही वजह है कि आवास जनगणना को मुख्य जनगणना की रीढ़ माना जाता है।

    पहले चरण में घरों की स्थिति और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ा डेटा इकट्ठा किया जाता है। इसमें मकान की हालत, कमरों की संख्या, पीने का पानी, बिजली, शौचालय, रसोई, खाना पकाने का ईंधन और घरेलू संसाधनों की जानकारी शामिल होती है।

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    यह डेटा सरकार को आवास योजनाएं, शहरी और ग्रामीण विकास, और कल्याणकारी नीतियां बनाने में मदद करता है। हाउस लिस्टिंग के जरिए सरकार के पास एक मजबूत आधार तैयार होता है, जिस पर पूरी जनसंख्या गणना टिकी होती है।

    आवास जनगणना का इतिहास

    भारत में पहली बार 1881 की जनगणना में आवास से जुड़ी जानकारी दर्ज की गई थी। 1951 में इसे अधिक व्यवस्थित रूप मिला और 1961 से इसे औपचारिक रूप से लागू किया गया। इसके बाद हर दशक की जनगणना में जनसंख्या गिनती से पहले मकानों की अलग गणना की जाने लगी। 1981 और 1991 में पेयजल, शौचालय और बिजली जैसे बुनियादी सुविधाओं का डेटा व्यवस्थित रूप से जुटाया गया।

    2001 में मकान की संरचना, छत और दीवार की सामग्री को शामिल किया गया। वहीं 2011 की जनगणना में मकान के स्वामित्व, रसोई गैस, टीवी और मोबाइल जैसी सुविधाओं की जानकारी भी दर्ज की गई।

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