कारगिल में 18 हजार फीट की ऊंचाई पर IAF ने पाकिस्तान को चखाया था हार का स्वाद, ऑपरेशन सफेद सागर की पूरी कहानी
कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने 'ऑपरेशन सफेद सागर' के तहत 18,000 फीट की ऊंचाई पर युद्ध लड़ा। शुरुआती चुनौतियों के बावजूद, वायुसेना ने अपनी रणनीति बदली और पाकिस्तान को धूल चटा दी।

ऑपरेशन सफेद सागर के दौरान वायुसेना ने दिखाया था पराक्रम।
HighLights
भारतीय वायुसेना ने कारगिल में 18,000 फीट पर युद्ध लड़ा।
शुरुआती चुनौतियों के बाद वायुसेना ने रणनीति में बदलाव किया।
मिराज-2000 ने मुंथो ढालो और टाइगर हिल पर सटीक हमले किए।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 1999 में मई की भीषण गर्मी पड़ी रही थी और लोगों पर क्रिकेट वर्ल्ड कप का खुमार चढ़ा हुआ था। इन सब के बीच अचानक ही देश का ध्यान कारगिल की बंजर और सुनसान चोटियों की ओर जाता है। दूर-दराज इलाके में बसा एक ऐसा शहर जिसके बारे में देश ने बहुत कम सुना था।
यहां मई की शुरुआत में ही मुश्किलों के संकेत मिलने लगे थे। सबसे पहले स्थानीय लोगों ने घाटी से हजारों फीट ऊपर ऊंची चोटियों पर कुछ अजीब हलचल देखी। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया की अगुवाई वाली पहली पेट्रोलिंग टीम को गोलीबारी के बाद पकड़ लिया गया। इस टीम के सदस्यों को बेरहमी से प्रताड़ित करके मार डाला गया।
जब दूसरी पेट्रोलिंग टीम पर हुआ हमला
इसके बाद 17 मई के आसपास एक और पेट्रोलिंग टीम भेजी गई, जिसका काम पहली टीम का पता लगाना था। इस टीम पर जबरदस्त हमला हुआ और वे कैप्टन अमित भारद्वाज और हवलदार राजवीर सिंह श्योराण की बहादुरी और बलिदान की वजह से ही वहां से सुरक्षित निकल पाए। जैसे-जैसे घुसपैठ का दायरा साफ हुआ, कार्रवाई तेजी और फैसले के साथ की गई।
वायुसेना के सामने चुनौती
सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी ने कारगिल में हवाई ताकत के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी। भारतीय वायुसेना के सामने एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि किसी भी वायु सेना ने पहले कभी 14,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर लड़ाई नहीं लड़ी थी।
जिन पायलटों को बड़े बख्तरबंद ग्रुप और साफ तौर पर पहचाने जाने वाले टारगेट पर हमला करने की ट्रेनिंग मिली थी, उन्हें अब ऊबड़-खाबड़ चट्टानों पर बने मजबूत जमीनी ठिकानों पर सटीक हमले करने थे। ये ठिकाने इतनी आसानी से नहीं पहचाने जा सकते थे।

पतली हवा की वजह से इंजन का थ्रस्ट कम हो जाता था, कम ऊंचाई के हिसाब से सेट किए गए हथियारों के साइट्स टारगेट से आगे निकल जाते थे और जो बम कुछ मीटर से चूक जाते थे वे नीचे घाटियों में कई किलोमीटर दूर जा गिरते थे।
सरकार ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करने की पाबंदी लगाई थी, जिससे फाइटर पायलटों के पास विकल्प सीमित हो गए थे। उन्हें 18,000 फ़ीट की ऊंचाई पर हवा से जमीन पर हमला करने के अभियान के नए तरीके खोजने पड़े।
जब सैनिकों को मिला पाकिस्तान से लड़ने के आदेश
26 मई को 1971 की लड़ाई के बाद पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ लड़ने का आदेश मिला। ये घुसपैठिए नेशनल हाईवे-1A के ऊपर बनी पहाड़ियों की चोटियों पर जमे हुए थे। यह घुसपैठ द्रास से बटालिक तक फैली हुई थी।

दुश्मन की इन चौकियों ने लद्दाख और सियाचिन तक जाने वाली भारत की जीवन रेखा (सप्लाई लाइन) के लिए खतरा पैदा कर दिया था। सियाचिन वह इलाका था जिसे भारत ने पाकिस्तान से छीना था।
और शुरू हुआ ऑपरेशन सफेद सागर
इसके बाद 'ऑपरेशन सफेद सागर' शुरू हुआ। यह एक बहुत ही साहसी हवाई अभियान था जिसने ज्यादा ऊंचाई पर युद्ध लड़ने के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया। एयर कमोडोर अनिल कुमार सिन्हा और ग्रुप कैप्टन अरविंद ओक को क्रमशः हेलीकॉप्टर और फाइटर ऑपरेशन की कमान सौंपी गई थी। उन्होंने पहले ही गुप्त रूप से हवाई अभियानों की योजना बनाना शुरू कर दिया था।
Mi-17 ट्रांसपोर्ट हेलीकॉप्टरों को हमले के काम में लगाया गया। वहीं, फाइटर विमानों को दुश्मन की गोलीबारी को रोकने का काम दिया गया ताकि कमजोर माने जाने वाले रोटरी-विंग विमान (हेलीकॉप्टर) अपने रॉकेट पॉड से हमला करते हुए आगे बढ़ सकें।

25 मई को एयर चीफ मार्शल एवाई टिपनीस ने श्रीनगर में अपने कमांडरों से मुलाकात की। अगली सुबह भारतीय विमान टोलोलिंग और टाइगर हिल के ऊपर हरकत में आ गए। रॉकेट और बमबारी से पाकिस्तानी ठिकाने हिल गए। रेडियो इंटरसेप्ट से दुश्मन की घबराहट का पता चला, "अब हम पकड़े जाने वाले हैं।"
फ्लाइट लेफ्टिनेंट निचिकेता करना पड़ा इजेक्ट
लेकिन जल्द ही इस ऑपरेशन को तब एक झटका लगा जब फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता (कॉलसाइन हायना-2) को पकड़ लिया गया। उनके MiG-27 विमान का इंजन खराब हो गया था क्योंकि उसमें बंदूक से निकली गैस चली गई थी, जिससे इतनी ऊंचाई पर मौजूद कम हवा भी इंजन तक नहीं पहुंच पा रही थी। उन्हें विमान से बाहर निकलना पड़ा (इजेक्ट करना पड़ा)।
उनकी तलाश कर रहे स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को पाकिस्तानियों ने गोली मार दी और बेरहमी से उनकी हत्या कर दी। एक दिन बाद स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर की कप्तानी में एक Mi-17 हेलीकॉप्टर को स्टिंगर मिसाइल से मार गिराया गया। इस हेलीकॉप्टर में तीन अन्य क्रू सदस्य भी थे, फ्लाइट लेफ्टिनेंट मुहिलन, सार्जेंट राज किशोर साहू और सार्जेंट पी.वी.एन.आर. प्रसाद।

ऑपरेशन के शुरुआती दिनों में हुए इन नुकसानों के कारण रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ा। दुश्मन की कंधे से दागी जाने वाली SAM मिसाइलें बहुत खतरनाक साबित हुईं और वायुसेना को एहसास हुआ कि इस खतरे से निपटने के लिए नई रणनीतियां बनानी होंगी।
भारतीय वायुसेना ने बदली अपनी रणनीति
वायुसेना ने बमबारी और टोह लेने में मदद के लिए ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) और हाथ में पकड़े जाने वाले कैमरों जैसी आसानी से उपलब्ध तकनीक का इस्तेमाल किया। पायलटों ने टारगेट पर बेहतर नतीजे पाने के लिए हमले के नए और अनोखे तरीके भी तैयार किए।

खासकर बमबारी के कई ट्रायल एयर फोर्स की तोशे मैदान एयर-टू-ग्राउंड रेंज में किए गए, जो लगभग 10,000 से 12,000 फीट की कम ऊंचाई पर थी। बाद में कारगिल सेक्टर के बहुत ऊंचे इलाकों में हमले के लिए इनपुट को फिर से एडजस्ट किया गया।
बेंगलुरु में एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट में मिराज-2000 फाइटर जेट्स को लेजर-गाइडेड बम और राफेल के नए शामिल किए गए लाइटनिंग पॉड्स के साथ जल्दी-जल्दी तैयार किया गया। 4 जून तक ये विमान ऑपरेशन के लिए तैयार हो गए और इनका असर तुरंत दिखा।
शुरू हुई पाकिस्तान की तबाही की कहानी
17 जून को मिराज के हमले ने बटालिक में पाकिस्तान के एक बड़े लॉजिस्टिक्स बेस, मुंथो ढालो को तबाह कर दिया, जिसमें 100 से ज्यादा पाकिस्तानी मारे गए और उनकी सप्लाई लाइनें ठप हो गईं।

एक हफ्ते बाद मिराज-2000 विमानों ने टाइगर हिल पर पाकिस्तानी ठिकानों पर एकदम सटीक निशाना साधकर हमले किए। इन हवाई हमलों ने सैनिकों के लिए चोटी पर कब्जा करने का रास्ता साफ कर दिया।
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