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क्या है भारत-नेपाल का 'दसगजा' विवाद? अब ड्रोन कैमरों की मदद से सुलझेगा सीमा का उलझा गणित

Published: Thu, 27 Aug 2026 04:13 PM (IST)

भारत और नेपाल अपनी खुली सीमा पर 'दसगजा' क्षेत्र में अतिक्रमण और सीमा-पार कब्जे का सटीक मैप बनाने के लिए ड्रोन का उपयोग करेंगे।

भारत-नेपाल 'दसगजा' क्षेत्र में ड्रोन से मैपिंग करेंगे

भारत-नेपाल 'दसगजा' क्षेत्र में ड्रोन से मैपिंग करेंगे

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत और नेपाल अपनी खुली सीमा के उस हिस्से का सटीक मैप तैयार करने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे कागजों पर खाली रहना चाहिए। इस इलाके को 'दसगजा' कहा जाता है। यह भारत-नेपाल सीमा के साथ नो-मैन्स-लैंड या बफर जोन बनाता है।

हालांकि जमीनी हकीकत इससे काफी अलग है। इसके कुछ हिस्सों पर खेती हो रही है, कब्जा किया गया है या निर्माण कार्य हुए हैं। नदियों ने अपना रास्ता बदल लिया है और हजारों सीमा पिलर गायब या नष्ट हो चुके हैं। दोनों देश अब हवा से इस अंतर को मापना चाहते हैं।

इस महीने लखनऊ में सर्वे अधिकारियों की समिति की 13वीं बैठक में भारत और नेपाल ने 'दसगजा' में अतिक्रमण सहित सीमा-पार कब्जे का मैप बनाने के लिए ड्रोन का उपयोग करने पर सहमति बनी है। इसके सितंबर या अक्टूबर के आसपास शुरू होने और तीन साल के भीतर पूरा होने की उम्मीद है।

इसके बाद दोनों पक्ष तस्वीरों का मिलकर विश्लेषण करेंगे ताकि यह पता लगाया जा सके कि मान्यता प्राप्त सीमा के दूसरी ओर के नागरिकों द्वारा कितनी जमीन का उपयोग किया जा रहा है।

यह कदम मई में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेनद्र शाह की संसद में की गई उन टिप्पणियों के बाद उठाया गया, जिनमें उन्होंने कहा था कि भारत ने नेपाली जमीन पर अतिक्रमण किया है और नेपाल ने भी कुछ जगहों पर भारतीय जमीन पर कब्जा किया है।

बाद में नेपाल के विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि शाह कोई नया क्षेत्रीय दावा नहीं कर रहे थे, बल्कि ‘दसगजा’ में सीमा-पार कब्जे और अतिक्रमण का जिक्र कर रहे थे।

दसगजा क्या है?

दसगजा अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों तरफ छोड़ी जाने वाली करीब 10 गज की पट्टी है, जहां सामान्य तौर पर निर्माण या कब्जे की अनुमति नहीं होती।

भारतीय रिपोर्टों में आमतौर पर 10-गज के नो-मैन्स-लैंड का जिक्र किया जाता है, जबकि नेपाल के विदेश मामलों के संस्थान के एक अध्ययन में 20-गज चौड़े बफर का जिक्र मिलता है, जिसमें सीमा के दोनों ओर 10-10 गज का विस्तार शामिल है।

दोनों देश अब सिर्फ इस पट्टी को नहीं, बल्कि उन जगहों को भी ड्रोन से चिन्हित करेंगे जहां एक देश के नागरिक दूसरे देश की जमीन पर खेती कर रहे हैं, रह रहे हैं या उसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

खुली सीमा पर मैनेजमेंट की चुनौती

लगभग 1,880 किलोमीटर लंबी खुली सीमा पर ऐसा करना आसान नहीं है। यह सीमा खेतों, बस्तियों, जंगलों, सड़कों और नदियों से होकर गुजरती है। दोनों तरफ के समुदायों के बीच गहरे सामाजिक और आर्थिक संबंध हैं। नेपाल के विदेश मामलों के संस्थान ने ‘दसगजा’ में अस्थायी घरों और टेंटों में रहने वाले लोगों का रिकॉर्ड रखा है।

सुरक्षा बल जब ऐसी बस्तियों को हटाते हैं, तब भी लोग वापस आ सकते हैं। कागजों पर यह बफर खाली जगह के रूप में काम करता है, लेकिन इसके कुछ हिस्से धीरे-धीरे सीमा के पास रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और आजीविका का हिस्सा बन गए हैं।

भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा है। बाड़ न होने से लोग काम, व्यापार, परिवार और अन्य गतिविधियों के लिए इसे अक्सर पार करते हैं। फिर भी सीमा तय है। यह सीमा स्तंभों, नक्शों और भौगोलिक निर्देशांकों के जरिए निर्धारित होती है। ‘दसगजा’ उस रेखा के चारों ओर बफर प्रदान करता है।

भौतिक मार्करों को बनाए रखना लगातार चुनौती बना हुआ है। नेपाल के सर्वेक्षण विभाग के अनुसार, सीमा पर 8,554 सीमा स्तंभ लगाए गए थे। इनमें से 1,325 गायब हैं और 1,956 आंशिक या पूरी तरह टूट गये हैं। किसी स्तंभ के गायब होने से अंतरराष्ट्रीय सीमा अपने आप नहीं बदलती।

सर्वेक्षण रिकॉर्ड, निर्देशांक और नक्शों से उसकी जगह फिर से पता लगाई जा सकती है। लेकिन जमीन पर मार्कर की अनुपस्थिति से सीमा की पहचान मुश्किल हो जाती है, खासकर जहां खेत, घर और सड़कें रेखा के करीब हैं।

नदियों का बदलता रास्ता बड़ी चुनौती

ड्रोन सर्वेक्षण ‘दसगजा’ से आगे तक जाता है। दोनों देश उस चीज की भी मैपिंग करना चाहते हैं जिसे अधिकारी ‘सीमा-पार कब्जा’ कहते हैं। ये ऐसे मामले हैं जिनमें एक देश के नागरिक उस जमीन पर रहते हैं, खेती करते हैं या उसका इस्तेमाल करते हैं जो कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त सीमा के दूसरी तरफ आती है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि शाह इसी मुद्दे का ज़िक्र कर रहे थे। उन्होंने इसे सीमा के नदी वाले हिस्सों में इस्तेमाल होने वाले ‘फिक्स्ड बाउंड्री प्रिंसिपल’ से जोड़ा था।

भारत-नेपाल सीमा के कई हिस्से नदियों के बीच से या उनके किनारे से होकर गुजरते हैं। नदियां कटाव, तलछट जमा होने और नए रास्ते बनने से अपना रास्ता बदलती रहती हैं। जब कानूनी सीमा पहले के सर्वे में तय जगह से जुड़ी होती है, तो मुश्किल हालात पैदा हो सकते हैं। स्थिर सीमा सिद्धांत के तहत सीमा तब भी स्थिर रह सकती है जब नदी अपना रास्ता बदल ले।

नतीजा अजीब हो सकता है जैसे कोई किसान उस जमीन पर खेती करता रहे जिसे उसका परिवार पीढ़ियों से इस्तेमाल कर रहा हो, लेकिन बाद के सर्वे से पता चले कि वह जमीन अब अंतरराष्ट्रीय सीमा के दूसरी तरफ है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने नदियों में होने वाले ऐसे बदलावों को सीमा-पार कब्जे की एक वजह बताया है। नेपाली अखबार कांतिपुर ने रिपोर्ट दी है कि दशकों से नदियों के रास्ते बदलने की वजह से हजारों हेक्टेयर जमीन सीमा के एक तरफ से दूसरी तरफ चली गई है।

ज्यादातर सीमा का नक्शा पहले से तैयार

नया ड्रोन सर्वे सीमा को फिर से बनाने या खोजने की कोशिश नहीं है। तकनीकी काम 1981 में शुरू हुआ था, जब संयुक्त तकनीकी स्तर की नेपाल-भारत सीमा समिति बनाई गई थी। कई सालों के सर्वे के बाद समिति ने 182 स्ट्रिप मैप तैयार किए, जिनमें लगभग 98 प्रतिशत सीमा शामिल थी।

इन नक्शों को 2007 में अंतिम रूप दिया गया, लेकिन इनमें कालापानी और सुस्ता के अनसुलझे इलाकों को शामिल नहीं किया गया। भारत के विदेश मंत्रालय ने भी माना है कि 98 प्रतिशत सीमा को कवर करने वाले स्ट्रिप मैप 2007 में प्रमाणित हुए। दोनों देशों ने कभी इन्हें अंतिम समझौते के रूप में औपचारिक रूप से मंजूरी नहीं दी। फिर भी ये महत्वपूर्ण तकनीकी संदर्भ बने हुए हैं।

सीमा पर पिलर क्यों महत्वपूर्ण हैं?

बिना भौतिक निशान के नक्शे पर बनी सीमा रेखा को जमीन पर पहचानना मुश्किल हो सकता है। इसलिए दोनों देश हजारों सीमा खंभे बनाए रखते हैं। कई खंभे क्षतिग्रस्त, नष्ट या खो गए हैं, खासकर नदियों और कटाव से प्रभावित इलाकों में।

जुलाई 2025 में सीमा कार्य समूह की सातवीं बैठक में दोनों देशों ने नए खंभे बनाने और क्षतिग्रस्त खंभों की मरम्मत पर सहमति जताई। 2014 में गठित यह समूह नो-मैन्स-लैंड खाली कराने, सीमा खंभों के निर्माण-रखरखाव, सीमा-पार संपत्ति रिकॉर्ड अपडेट करने और अन्य तकनीकी मामलों को देखता है।

इसमें कालापानी और सुस्ता के विवाद शामिल नहीं हैं। तंत्र तीन स्तरों पर काम करता है—सीमा कार्य समूह, सर्वेक्षण अधिकारियों की समिति और संयुक्त फील्ड सर्वेक्षण टीमें।

ड्रोन सर्वे का मकसद

इसका तुरंत मकसद जमीन पर असल स्थिति की सटीक तस्वीर पाना है। यूएवी उन इलाकों की हवाई तस्वीरें लेंगे जहां सीमा-पार कब्ज़े का शक है। भारतीय और नेपाली अधिकारी मिलकर इन तस्वीरों का विश्लेषण करेंगे और मौजूदा नक्शों, निर्देशांकों, सीमा खंभों तथा जमीनी रिकॉर्ड से तुलना करेंगे।

हवाई तस्वीरों से खेत, घर, सड़कें, नदियाँ और अन्य चीज़ें तय सीमा के मुकाबले कहां स्थित हैं, यह साफ पता चल सकता है। सबसे जरूरी संयुक्त जांच है। अगर दोनों देश एक ही तस्वीर पर काम करते हैं और तकनीकी तथ्यों पर सहमत होते हैं, तो आगे के कदम तय करना आसान हो जाता है। संयुक्त रिकॉर्ड कब्ज़े हटाने, जमीन वापस पाने या जरूरत पड़ने पर मुआवजे की बातचीत का आधार बन सकते हैं।

मौजूदा तकनीकी प्रक्रिया में कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और सुस्ता जैसे अनसुलझे इलाकों को शामिल नहीं किया गया है। 2025 के समझौते में इन्हें खास तौर पर बाहर रखा गया। ‘दसगजा’ अभ्यास का दायरा सीमित है यह नो-मैन्स-लैंड, सीमा के बुनियादी ढांचे और तय सीमा के साथ सीमा-पार कब्जे से संबंधित है।

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