साल दर साल फेल हो रहे खाद्य सैंपल, फूड क्वालिटी में भारत 80वें स्थान पर; क्यों नहीं रुक रही मिलावखोरी?
केंद्र सरकार के अनुसार, भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट एक गंभीर समस्या बनी हुई है। FSSAI की 2024-25 रिपोर्ट ...और पढ़ें
HighLights
FSSAI जांच में 17.6% खाद्य सैंपल फेल, 38% दूध के।
ग्लोबल फूड सिक्योरिटी इंडेक्स में भारत 80वें स्थान पर।
लूज बिक्री, कमजोर लैब नेटवर्क मिलावट रोकने की चुनौतियां।
डिजिटल डेस्क,नई दिल्ली। भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट रुकने का नाम नहीं ले रहा है। जबकि सरकार का कहना है कि मिलावटखोरी के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जा रही है। वहीं, जब जांच एजेंसियों की वार्षिक रिपोर्ट पर नजर पड़ती है तो कहानी कुछ और ही निकल कर आती है।
केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने साल 2024-25 में कुल 1.70 लाख खाद्य सैंपल की जांच की। इनमें 17.6% सैंपल जांच में फेल हो गए। इन सैंपल में सबसे ज्यादा दूध के 38% सैंपल फेल हुए। ये आंकड़े भारत में मिलावट की हकीकत दिखाती है।
खाद्य उत्पादों की लूज बिक्री करनी होगी बंद
दुनियाभर में खाद्य गुणवत्ता मापने वाले 'ग्लोबल फूड सिक्योरिटी इंडेक्स-2022' के अनुसार, भारत विश्व में 80वें स्थान पर है। वहीं, कनाडा पहले और अमेरिका दूसरे स्थान पर है। भारत में मिलावट रोकने का काम केंद्र और राज्य सरकार मिलकर करते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत एफएसएसएआई मानक तय करता है। राज्यों में जिला स्तर पर डेजिग्नेटेड ऑफिसर (डीओ) निगरानी करते हैं, फूड सेफ्टी ऑफिसर (एफएसओ) सैंपल जांचते हैं। इनकी रिपोर्ट पर डीओ कार्रवाई करते हैं।
इस वक्त खाद्य पदार्थों में मिलावटखोरी रोकने के लिए भारत के सामने 4 चुनौतियां है। पहला देश में आधे से ज्यादा खाद्य उत्पादों की लूज बिक्री। भारत में 70 फीसदी खाद्य उत्पाद लूज में बिकते हैं। देश में करीब 70% दूध और 65% मसाले अभी भी खुले में बिकते हैं। जबकि अमेरिका में 99% दूध पैक में बिकता है, जिससे उसकी ट्रेकिंग संभव हो पाती है। इससे निगरानी और जांच आसानी से हो पाती है।
सेल्फ-डिक्लेरेशन पर ही उत्पाद की हो जाती है बिक्री
भारत में दूसरी चुनौती कंपनियों के सेल्फ-डिक्लेरेशन पर ही उत्पाद की बिक्री हो जाती है। कई बार लैब रिपोर्ट से पहले सामान बिक जाता है। जबकि, जापान में रिपोर्ट के बिना डेयरी उत्पाद नहीं बिकता है। तीसरी चुनौती, फूड सेफ्टी अफसरों पर 50 गुना ज्यादा वर्क लोड। देश में डीओ के 16%, एफएसओ के 35% पद खाली है। 2,623 एफएसओ के मुकाबले 58 लाख फर्म हैं।
भारत में प्रति अफसर औसत 2200 फर्में है, जबकि कनाडा में 50 ही है। चौथी चुनौती देश में फूड जांच लैब नेटवर्क का कमजोर ढांचा होना है। भारत में 252 अधिसूचित फूड टेस्टिंग लैब है। देश के करीब 62 लाख लोगों पर औसत एक लैब है। कनाडा में 30 लाख लोगों पर एक राष्ट्रीय लैब उपलब्ध है।
इन 6 देशों जैसा करना होगा सिस्टम
कनाडा में हर साल 300 प्रोडक्ट मार्केट से वापस होते हैं। कानून के तहत हर प्रोडक्ट का डिजिटल डेटा उपलब्ध होता है। इससे मिलावट करना आसान नहीं होता है। अमेरिका में अगर एक भी व्यक्ति किसी खाद्य पदार्थ से बीमार होता है तो, देश से 24 घंटे में उसे हटाना पड़ता है। कंपनी को अपनी गलती मानते हुए टीवी पर विज्ञापन भी देना पड़ता है।
चीन में मिलावट करने पर उम्रकैद या फांसी की सजा मिलती है। चीन में बच्चों के दूध में जहरीला मेलैमाइन मिलाने के 2 दोषियों को 2009 में फांसी दी गई थी। नॉर्वे में सेंसर से की जाती है निगरानी। गोदामों के सेंसर सरकारी सर्वर से जुड़े होते हैं। कोल्ड स्टोरेज का तापमान अगर 2 डिग्री सेल्सियस से 1 डिग्री ऊपर जाता है तो, पूरा बैच रिजेक्ट हो होता है।
आयरलैंड में गाय-भैंस का 'बर्थ सर्टिफिकेट' बनाया जाता है। हर पशु को 'ईयर टैग'मिलता है। इसकी जानकारी के बिना फैक्ट्री में दूध की एंट्री नहीं होती है। ग्राहक को पता होता है कि दूध किस गाय का है। वहीं नीदरलैंड्स में हर खेत की मिट्टी का डीएनए टेस्ट खेती से पहले किया जाता है। मिट्टी में हैवी मेटल मिले तो खेत सील कर दिया जाता है। 2023 में 1,200 हेक्टेयर फसल को नष्ट किया गया था।
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