साइबर ठगी पर चौंकाने वाला खुलासा: विदेश से 'म्यूल खाते' चला रहा सिंडिकेट, सामने आया अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराधियों का पूरा पैटर्न
एक अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट विदेश से 'म्यूल खाते' संचालित कर रहा है, जिससे साइबर ठगी की रकम को तेजी से क्रिप्टो या विदेश भेजा जा रहा है। ...और पढ़ें

साइबर ठगी पर चौंकाने वाला खुलासा। (प्रतीकात्मक तस्वीर)
HighLights
अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट विदेश से 'म्यूल खाते' संचालित कर रहा है।
साइबर अपराधी शिकायत होते ही तुरंत खाते बदल देते हैं।
ठगी की रकम क्रिप्टो या विदेश में तुरंत भेजी जाती है।
नीलू रंजन, नई दिल्ली। साइबर ठगी की रकम ठिकाने लगाने वाले अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट ने जांच एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। साइबर ठगी के मामलों की फाइनेंशियल इंटेलीजेंस यूनिट और ईडी की साइबर ठगी के पैटर्न की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
इसके अनुसार विदेश में बैठा साइबर अपराधी सिंडिकेट भारत में खोले गए म्यूल एकाउंट को संचालित कर रहा है। यही नहीं, सिंडिकेट साइबर अपराध की रोकथाम के लिए बनाए गए नेशनल साइबर रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी नजर रखता है। जैसे ही किसी बैंक खाते की शिकायत पोर्टल पर होती है। सिंडिकेट तत्काल उस खाते का इस्तेमाल बंद कर दूसरा खाता शुरू कर देता है।
ईडी के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार विदेश में बैठकर भारत में खोले गए म्यूल खाते को संचालित करने के लिए सिंडिकेट जोहो ईमेल एकाउंट और एसएमएस फॉरवर्ड करने वाले एप का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनकी सहायता से म्यूल खाता धारकों से बिना बात किये वे खाते पर लेन-देन से जुड़े एसएमएस पर नजर रखते हैं।
इसकी मदद से साइबर ठगी की रकम को चंद मिनट नें कई म्यूल खातों में ट्रांसफर करते हुए क्रिप्टो करेंसी में बदलने या फिर दूसरे फिनटेक एप के माध्यम से विदेश में निकालने में सफल होते हैं। इसके कारण शिकायत मिलने के बाद भी ठगी की रकम रोकने या रिकवर करने में एजेंसियों को सफलता नहीं मिलती है।
खबरें और भी
जांच में यह भी सामने आया कि साइबर अपराधी फर्जी वेबसाइट के साथ यूपीआई आईडी, मर्चेंट क्यूआर कोड, वर्जचुअल एकाउंट नंबर और पेमेंट गेटवे जैसे डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़कर ठगी को अंजाम दे रहे हैं। इनमें ज्यादातर निवेश का झांसा देने वाले फ्रॉड, पार्ट टाइम जॉब से जुड़े फ्रॉड, गेमिंग और जुआ से जुड़े प्लेटफॉर्म और तत्काल लोन वाले फ्रॉड शामिल है।
नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर किसी भी म्यूल एकाउंट की रिपोर्टिंग होती है, सिंडिकेट तत्काल उसे हटाकर उसकी जगह नया म्यूल एकाउंट का इस्तेमाल करने लगता है। इस तरह से उसकी साइबर ठगी निर्बाध जारी रहती है।
हैरानी की बात है कि बैंक, सीबीआई, आरबीआई समेत तमाम एजेंसियों की कोशिशों के बावजूज म्यूल खातों पर लगाम लगाने में सफलता नहीं है। जांच में सामने आया है कि म्यूल खाते 30 से 35 हजार रूपये या फिर एक से दो प्रतिशत कमीशन में आसानी से हासिल कर लेते हैं। ऐसे म्यूल खातों को खोलने और उपलब्ध कराने के लिए सिंडिकेट में अलग से लोग रखे गए हैं, जिनका काम यही है।
एक बार खाता मिलने के बाद सिंडिकेट उसके पूरे ऑपरेशन को अपने हाथ में ले लेता है। जिनमें चेकबुक, डेबिट कार्ड, सिम कार्ड, इंटरनेट बैंकिंग के सारे क्रेडेंशियल्स, यूपीआई क्रेडेंशियल, मर्चेट क्यूआर कोड, पासवर्ड और अथोराइजेशन से जुड़े अन्य जानकारियां शामिल हैं।
एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार अभी तक साइबर ठगी के मामले की अलग-अलग जांच होने से पूरे सिंडिकेट की जानकारी मिल नहीं पाती थी। इसीलिए 2022 में सीबीआइ में दर्ज साइबर ठगी के दो मामले की जांच ईडी को सौंपी गई ताकि साइबर ठगी की रकम ठिकाने लगाने के पूरे पैटर्न और नेटवर्क का पता लगाया जा सके। जाहिर है जांच के निष्कर्षों के आधार पर सरकार इसपर लगाम लगाने के लिए जरूरी कदम उठाएगी।