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    जस्टिस वर्मा के खिलाफ साबित हुए कौन-से तीन आरोप? अब तक क्या-क्या हुआ, पूरी रिपोर्ट

    By Arvind SharmaEdited By: Sakshi Gupta
    Updated: Wed, 12 Aug 2026 11:25 PM (IST)

    लोकसभा की जांच समिति ने जस्टिस यशवंत वर्मा को उनके सरकारी आवास से बेहिसाब नकदी मिलने के आरोप में दोषी ठहराया है। ...और पढ़ें

    जस्टिस यशवंत वर्मा को दोषी पाया गया (फाइल फोटो)

    जस्टिस यशवंत वर्मा को दोषी पाया गया (फाइल फोटो)

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    संक्षेप में पढ़ें

    अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने के मामले में संसद की जांच समिति ने उनके विरुद्ध लगाए गए तीनों आरोपों को सही पाया है।

    लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जस्टिस वर्मा नकदी के स्रोत, उसके मालिकाना हक एवं सरकारी बंगले के स्टोर रूम में उसके होने के कारणों को स्पष्ट नहीं कर पाए। यहां तक कि महत्वपूर्ण सुबूतों को सुरक्षित नहीं रखा गया और जस्टिस वर्मा की सफाई भी संतोषजनक नहीं थी।

    दोनों सदनों में बुधवार को समिति की दो खंडों वाली रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें जांच के दौरान मौके से मिले साक्ष्य भी शामिल हैं। समिति ने आगे की कार्रवाई की भी सिफारिश की है।

    इस प्रकरण के सामने आने के बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट से उनके मूल हाई कोर्ट इलाहाबाद भेजा गया था। जुलाई, 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने उन्हें हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके बाद स्पीकर ओम बिरला ने 12 अगस्त, 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की थी।

    जस्टिस वर्मा ने संसद की ओर से हटाए जाने की कार्यवाही के बीच अप्रैल, 2026 में राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज दिया था। लेकिन कानून मंत्रालय ने अभी तक उनके इस्तीफे की अधिसूचना जारी नहीं की है। इसी कारण रिपोर्ट संसद में पेश की गई।

    क्या है पूरा मामला?

    मामला 14 मार्च, 2025 की रात का है। जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी बंगले में आग लग गई थी, जिसे बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में 500-500 रुपये के जले एवं अधजले नोटों के बंडल दिखाई दिए थे। नोट स्टोररूम में करीब सात-आठ फीट तक फैले हुए थे।

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    पुलिस अधिकारी रूपचंद से जब पूछा गया कि क्या नकदी की मात्रा पांच लाख रुपये से अधिक थी, तो उन्होंने कहा कि यह आंकड़ा बहुत छोटा है।

    हालांकि नोटों की गिनती नहीं की गई और न ही उनके नमूने सुरक्षित किए गए। इसलिए समिति यह तय नहीं कर सकी कि वास्तव में वहां कितनी नकदी थी। फिर भी नोटों के बंडल, उसके स्रोत और मालिकाना हक की संतोषजनक जानकारी नहीं मिलने को समिति ने पहला आरोप का साबित होना माना।

    दूसरा आरोप स्टोर रूम में मिले सुबूतों के रखरखाव से जुड़ा है। समिति ने पाया कि आग बुझने के बाद स्टोर रूम को तुरंत कानूनी तरीके से सील नहीं किया गया।

    सुरक्षा अधिकारी ने जस्टिस वर्मा के कर्मचारियों को रात करीब तीन बजे वहां सफाई करते देखा। सुबह तक जला हुआ सामान बाहर निकाल दिया गया और कमरे की स्थिति बदल गई।

    समिति के मुताबिक, कानूनी सीलिंग एवं निरीक्षण से पहले कमरे की स्थिति बदलने से सुबूत नष्ट हो गए। वहां मिले कुछ नोट बाद में उपलब्ध नहीं हुए और उनके गायब होने का स्पष्ट कारण नहीं बताया जा सका। समिति ने इसे भी सुबूतों के संरक्षण में गंभीर लापरवाही माना। हालांकि समिति ने यह नहीं कहा कि नोट खुद जस्टिस वर्मा ने हटाए थे।

    तीसरा आरोप जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण से जुड़ा है। समिति ने 22 मार्च, 2025 को दिए उनके जवाब की खास तौर पर जांच की।

    शुरुआत में जस्टिस वर्मा ने नकदी के बारे में जानकारी होने से ही इनकार कर दिया था। बाद में उन्होंने नकदी को नकली बताए जाने और साजिश के तहत वहां रखे जाने जैसी बातें कही थीं। लेकिन इन दावों के समर्थन में कोई प्राथमिकी, शिकायत या ठोस प्रमाण सामने नहीं आया।

    जस्टिस वर्मा ने खुद भी समिति के सामने गवाही नहीं दी और न अपने परिवार या कर्मचारियों को गवाह के रूप में पेश किया।

    समिति ने कहा कि उनका जवाब गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों की कसौटी पर खरा नहीं था। वह टालमटोल करते रहे। पारदर्शिता एवं संस्थागत जिम्मेदारी की कमी दिखी। ऐसे में यह आरोप भी साबित माना गया।

    इस्तीफे के लिए स्वीकृति आवश्यक नहीं

    सुप्रीम कोर्ट के 1978 के एक फैसले के अनुसार, राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपकर उसकी प्रति सार्वजनिक किए जाने के बाद जज को इस्तीफा दिया हुआ मान लिया जाता है।

    राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति इसके लिए जरूरी नहीं होती। बाद में कानून मंत्रालय की न्याय विभाग शाखा इसकी औपचारिक अधिसूचना जारी करती है, जो अभी तक जारी नहीं हुई है।

    यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस्तीफे के बावजूद उनके विरुद्ध गठित जांच पूरी हुई और उसकी रिपोर्ट संसद में रखी गई।

    शीत सत्र में महाभियोग प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है सरकार

    सरकार शीतकालीन सत्र के दौरान जस्टिस यशवंत वर्मा के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। सूत्रों ने यह जानकारी दी।

    जस्टिस वर्मा अप्रैल में इस्तीफा दे चुके हैं, लेकिन कानून मंत्रालय ने अभी तक उनके इस्तीफे की अधिसूचना जारी नहीं की है। उनका नाम अभी भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों की सूची में शामिल है।

    हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का कोई जज जब इस्तीफा देता है, तो आम तौर पर इसे स्वीकार मान लिया जाता है, इस बारे में सूत्रों ने कहा कि जस्टिस वर्मा ने संसद में हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस्तीफा भेजा था, इसलिए उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है।

    साथ ही कहा कि सरकार एक मिसाल कायम करना और यह संदेश देना चाह सकती है कि कोई जज गंभीर अनियमितताओं में शामिल होने के बाद इस्तीफा देकर भी हटाए जाने की प्रक्रिया से नहीं बच सकता।

    जस्टिस वर्मा के केस में अब तक क्या-क्या हुआ?

    वर्ष 2025

    14 मार्च : तुगलक क्रिसेंट स्थित सरकारी बंगले में आग लगी। आग बुझाने के दौरान जले हुए नोटों के बंडल बरामद।
    15 मार्च : दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर हाई कोर्ट अधिकारियों ने घटना स्थल का निरीक्षण किया।
    21 मार्च : सीजेआइ ने 22 मार्च की दोपहर तक जवाब मांगा। कोलेजियम ने इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर करने पर विचार किया।
    22 मार्च : जस्टिस वर्मा ने आरोपों का खंडन किया। सीजेआइ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठित की।
    22 मार्च : सुप्रीम कोर्ट ने मामले से संबंधित तस्वीरों और वीडियो समेत आंतरिक जांच रिपोर्ट अपनी वेबसाइट पर अपलोड की।
    28 मार्च : जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाई कोर्ट तबादला, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से न्यायिक कार्य नहीं सौंपने का आग्रह।
    03 मई : सुप्रीम कोर्ट की समिति ने जस्टिस वर्मा को कदाचार का दोषी पाया, पद से हटाने की सिफारिश की।
    08 मई : पद छोड़ने से इन्कार करने पर सीजेआइ ने उनके विरुद्ध महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की मांग की।
    17 जुलाई : जस्टिस वर्मा ने आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को अमान्य ठहराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
    07 अगस्त : सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका खारिज की।
    12 अगस्त : लोकसभा स्पीकर ने जस्टिस वर्मा को हटाने का बहुदलीय प्रस्ताव स्वीकार कर जजों की जांच समिति गठित की।
    16 दिसंबर : सुप्रीम कोर्ट ने जांच समिति गठन को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई।

    वर्ष 2026

    16 जनवरी : सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका खारिज की।
    09 अप्रैल : जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंपा।
    12 अगस्त : लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित जजों की जांच समिति ने जस्टिस वर्मा को सभी आरोपों में दोषी पाया।

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