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    पहलगाम आतंकी हमले की बरसी: दिल पत्थर, यादों की धरोहर और नहीं भूल पा रहे वो खौफनाक मंजर

    Updated: Tue, 21 Apr 2026 02:36 AM (GMT+05:30)

    पहलगाम आतंकी हमले की बरसी पर पीड़ित परिवारों ने अपने प्रियजनों को याद किया। हमले में मारे गए लोगों के परिवार आज भी उस खौफनाक मंजर को नहीं भूल पा रहे ह ...और पढ़ें

    पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी। (फाइल फोटो)

    पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी। (फाइल फोटो)

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    जागरण टीम, नई दिल्ली। 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम की बैसरन घाटी में हंसते-खेलते लोगों की खुशियां देखते ही देखते रूदन में बदल गईं। मानवता के दुश्मन आतंकियों ने मासूम बच्चों और पत्नियों के सामने परिवार के पुरुष सदस्यों को धर्म पूछकर गोलियों से भून दिया था।

    देश ने ऑपरेशन सिंदूर कर 22 निर्दोष लोगों के साथ हुई क्रूरता का बदला ले लिया, लेकिन उस खौफनाक दौर को यादकर आज भी प्रभावित परिवार सिहर उठते हैं।

    परिजनों के घाव आज भी हरे

    कानपुर के शुभम द्विवेदी के स्वजन उनकी यादों की धरोहर को सहेजे हुए हैं तो करनाल के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल के स्वजन चाहकर भी उस काले दिन को भूल नहीं पा रहे।

    कानपुर के रघुवीर नगर हाथीपुर निवासी सीमेंट कारोबारी संजय द्विवेदी व स्वजन के दिल पर बने घाव आज भी हरे हैं। उनके पुत्र शुभम द्विवेदी की नवविवाहिता एशान्या के हाथों की मेंहदी भी सही ढंग से छूट नहीं पाई थी कि दोनों की हंसती-खेलती दुनिया उजड़ गई।

    'गम में दिल तो पत्थर हो ही गया, शरीर भी निर्जीव मालूम पड़ता है'

    स्वजन कहते हैं कि शुभम के गम में दिल तो पत्थर हो ही गया, शरीर भी निर्जीव जान पड़ता है। ऐसा लगता है जैसे शुभम ने हमारी सारी खुशियों को देश के नाम कुर्बान कर दिया। अब बस यही लगता है कि दोबारा कोई ऐसी आतंकवादी घटना न हो। शुभम को बलिदानी का दर्जा नहीं दिए जाने से परिवार मायूस है।

    वे कहते हैं कि अगर बलिदानी दर्जा न भी मिले तो उसके समकक्ष कुछ सरकार दे, जिससे उनकी यादों में जी सकें। करनाल के सेक्टर-7 निवासी लेफ्टिनेंट विनय नरवाल का परिवार आज भी गम और गर्व के दोराहे पर खड़ा है। विनय के पिता राजेश नरवाल पानीपत में जीएसटी विभाग में अधीक्षक हैं।

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    भर आईं विनय के पिता की आंखें

    दैनिक जागरण से बातचीत में उनकी आंखें भर आईं। वह कहते हैं, विनय ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया है, लेकिन एक पिता के तौर पर मेरा मानना है कि उसे सच्ची श्रद्धांजलि तब मिलेगी, जब इस दुनिया से आतंकवाद मिट जाएगा।

    राजेश कहते हैं कि यदि सरकार विनय की स्मृति में कोई अस्पताल या शिक्षण संस्थान शुरू करती है, तो वे सरकार से मिलने वाली पूरी राशि और परिवार की संपत्ति में विनय का हिस्सा दान कर देंगे। वे अपने बेटे के नाम को जनकल्याण के माध्यम से अमर देखना चाहते हैं।

    विनय की बहन सृष्टि ने यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी है। विनय की विधवा हिमांशी अब गुरुग्राम में अपने माता-पिता के साथ रहती हैं। पिता ने एक मई को विनय के जन्मदिन पर इस बार भी रक्तदान शिविर का निर्णय लिया है।

    यादों के भरोसे आगे बढ़ रहा सुशील का परिवार

    पहलगाम में आतंकियों की क्रूरता का शिकार हुए इंदौर के वीणापुर में रहने वाले सुशील नथानियल का परिवार उनकी यादों के भरोसे आगे बढ़ रहा है। सुशील एलआईसी में अधिकारी थे। पत्नी सरकारी शिक्षक हैं, बेटी आकांक्षा बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत है।

    पत्नी के सरकारी सेवा में होने के कारण परिवार बेटे ऑस्टिन की एलआईसी में अनुकंपा नियुक्ति चाहता था, लेकिन उसे अनुकंपा नियुक्त नहीं मिली। जम्मू कश्मीर व असम सरकार के माध्यम से आर्थिक मदद भी मिली थी।

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