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    भगवान अलारनाथ मंदिर में इतिहास ने खुद को दोहराया, वर्षों से बंद पड़ी भव्य 'बड़सिंघार वेश' की परंपरा फिर से शुरू

    Updated: Sat, 04 Jul 2026 08:00 AM (IST)

    भगवान अलारनाथ मंदिर में वर्षों से बंद पड़ी बड़सिंघार वेश की प्राचीन परंपरा को पुनः शुरू कर दिया गया है। अनसर काल के दूसरे दिन यह भव्य वेश संपन्न हुआ, ...और पढ़ें

    वर्षों से बंद पड़ी भव्य 'बड़सिंघार वेश' की परंपरा फिर से शुरू

    वर्षों से बंद पड़ी भव्य 'बड़सिंघार वेश' की परंपरा फिर से शुरू

    HighLights

    1. बड़सिंघार वेश की प्राचीन परंपरा पुनः शुरू हुई।

    2. अनसर काल के दूसरे दिन भव्य वेश संपन्न हुआ।

    3. श्रद्धालुओं ने जिला प्रशासन का आभार जताया।

    संवाद सूत्र, पुरी। भगवान अलारनाथ से जुड़ी प्राचीन परंपराओं को पुनर्जीवित करते हुए मंदिर प्रशासन ने वर्षों से बंद पड़ी बड़सिंघार वेश की परंपरा को फिर से शुरू कर दिया है। 

    अनसर (अनवसर) काल के दूसरे दिन गुरुवार को ब्रह्मगिरि स्थित श्री अलारनाथ मंदिर में भगवान का भव्य बड़सिंघार वेश संपन्न हुआ, जिसके दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। लंबे अंतराल के बाद भगवान को इस दिव्य श्रृंगार में देखकर अनेक भक्त भावुक हो उठे।

    बड़सिंघार वेश की परंपरा को पुनः प्रारंभ करने का आग्रह 

    बताया गया कि इस वर्ष अनसर पर्व की तैयारी बैठक के दौरान मंदिर के सेवायतों, वरिष्ठ नागरिकों और स्थानीय बुद्धिजीवियों ने पुरी के जिलाधिकारी दिव्य ज्योति परिड़ा से बड़सिंघार वेश की परंपरा को पुनः प्रारंभ करने का आग्रह किया था।

    सेवायतों की अनुशंसा के आधार पर जिलाधिकारी ने उपजिलाधिकारी राज किशोर जेना तथा ब्रह्मगिरि तहसीलदार देवाशीष सेठी को आवश्यक व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। इसके बाद श्री अलारनाथ मंदिर के सेवायत समुदाय के साथ विचार-विमर्श कर गुरुवार से इस परंपरा को पुनः लागू कर दिया गया।

    श्रद्धालुओं के आवागमन और दर्शन व्यवस्था में काफी सुगमता

    इधर, महाप्रसाद (भोग) व्यवस्था में किए गए संशोधित प्रबंध भी जारी रहे। तय व्यवस्था के अनुसार मंदिर के भीतर पारंपरिक कोठा भोग अर्पित किया गया, जबकि जजमानी भोग मंदिर परिसर के बाहर संपन्न कराया गया।

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    नई व्यवस्था से अनसर काल के दौरान श्रद्धालुओं के आवागमन और दर्शन व्यवस्था में काफी सुगमता आई। बड़सिंघार वेश की पुनर्बहाली पर सेवायतों और श्रद्धालुओं ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए जिला प्रशासन का आभार जताया। उनका कहना है कि इससे न केवल भगवान अलारनाथ की एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा का संरक्षण हुआ है, बल्कि तीर्थयात्रियों की सुविधा भी पहले की तुलना में बेहतर हुई है।

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