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    ओडिशा के इस गांव में मंदिर नहीं, 4 दशकों से बांस के खंभों और पॉलीथिन की छत के नीचे विराज रहे हैं भगवान जगन्नाथ

    Updated: Fri, 03 Jul 2026 07:00 AM (IST)

    ओडिशा के मयूरभंज जिले के गुड़ियालबंधा गांव में करीब चार दशकों से भगवान जगन्नाथ की पूजा बांस के खंभों और पॉलीथिन की छत के नीचे एक अनोखी परंपरा के तहत क ...और पढ़ें

    बांस के खंभों और पॉलीथिन की छत के नीचे विराज रहे हैं भगवान जगन्नाथ

    बांस के खंभों और पॉलीथिन की छत के नीचे विराज रहे हैं भगवान जगन्नाथ

    HighLights

    1. मयूरभंज के गुड़ियालबंधा में 40 साल से अनोखी पूजा परंपरा।

    2. भगवान जगन्नाथ की पूजा बांस-पॉलीथिन के अस्थायी मंडप में।

    3. देव स्नान पूर्णिमा पर विशेष यज्ञ और रथयात्रा का आयोजन।

    जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर। ओडिशा के मयूरभंज जिले के बारीपदा शहर के बाहरी क्षेत्र स्थित गुड़ियालबंधा गांव में भगवान जगन्नाथ की पूजा की एक अनोखी परंपरा पिछले करीब चार दशकों से जारी है।

    यहां भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की पूजा किसी भव्य मंदिर में नहीं, बल्कि बांस के खंभों और पॉलीथिन की छत से बने एक साधारण आश्रय स्थल के नीचे की जाती है।

    छह बांस के खंभों और पॉलीथिन की छत वाला मंदिर

    स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले भगवान की प्रतिमाएं एक फूस (छप्पर) से बने मंदिर में स्थापित थी। हालांकि, वह संरचना ढह जाने के बाद प्रतिमाओं को छह बांस के खंभों और पॉलीथिन की छत वाले अस्थायी मंडप में स्थापित कर दिया गया। तब से लेकर आज तक यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना और सभी धार्मिक अनुष्ठान बिना किसी बाधा के जारी हैं।

    गांव में देव स्नान पूर्णिमा का विशेष महत्व है। यह दिन इस पूजा स्थल के स्थापना दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। जहां अन्य स्थानों पर स्नान पूर्णिमा बड़े पैमाने पर मनाई जाती है, वहीं गुड़ियाल बांधा गांव में इस अवसर पर विशेष यज्ञ (हवन) का आयोजन किया जाता है। इसके बाद भगवानों को रथ पर विराजमान कर पूरे गांव में शोभायात्रा निकाली जाती है।

    नौकरी छोड़कर रहे मंदिर की देखभाल

    इस अनोखी रथयात्रा में सैकड़ों श्रद्धालु शामिल होते हैं और रथ को खींचते हैं। रथ पहले गांव की ग्रामदेवी के मंदिर तक पहुंचता है, जहां भगवान एक दिन विश्राम करते हैं। अगले दिन उन्हें पुनः उनके पूजा स्थल पर लाया जाता है।

    पिछले 38 वर्षों से इस पूजा स्थल की देखरेख बाबा गजेंद्र नाथ कर रहे हैं। उन्होंने नौकरी छोड़कर आध्यात्मिक जीवन अपनाया था। बाबा गजेंद्र नाथ का कहना है कि उन्हें एक दिव्य स्वप्न प्राप्त हुआ था, जिसके बाद उन्होंने इस पूजा स्थल की स्थापना की। वे आज भी अपने निजी संसाधनों से पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं, क्योंकि इस स्थल को किसी प्रकार की सरकारी या अन्य आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं होती।

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    परंपरा को संरक्षित रखना चाहते हैं ग्रामीण

    ग्रामीणों का कहना है कि वे इस अनूठी परंपरा को संरक्षित रखना चाहते हैं और भविष्य में इसका विस्तार भी करना चाहते हैं, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।

    एक स्थानीय निवासी और श्रद्धालु ने कहा, “मैं बचपन से यह परंपरा देखता आ रहा हूं। हर साल देव स्नान पूर्णिमा पर इसी तरह रथयात्रा निकाली जाती है। दूर-दूर से लोग यहां आते हैं, लेकिन आर्थिक सहायता नहीं मिलने के कारण हम रथयात्रा का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं। गांव के लोग सहयोग करते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी बनी हुई है।

    एक अन्य ग्रामीण ने बताया, अब पहले की तुलना में काफी प्रगति हुई है। पहले यहां सड़क पर इतनी आवाजाही नहीं होती थी। तब हम भगवानों को बैलगाड़ी पर बैठाकर स्वयं खींचते थे। अब हमने चार पहियों वाला रथ तैयार कर लिया है। बांस और लकड़ी की सहायता से बने इस रथ पर भगवानों को विराजमान कर गांव में भ्रमण कराया जाता है।

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