हाथी वेश से रघुनाथ तक... श्रीजगन्नाथ के 32 दिव्य वेश, हर रूप में छिपा है सनातन का विराट दर्शन
भगवान श्रीजगन्नाथ के 32 दिव्य वेशों का विस्तृत वर्णन, जो भारतीय सभ्यता और सनातन धर्म के विराट दर्शन को दर्शाते हैं। ...और पढ़ें
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श्रीजगन्नाथ के 32 दिव्य वेश
HighLights
भगवान जगन्नाथ के 32 प्रमुख वेशों का विस्तृत वर्णन।
रघुनाथ वेश और नागार्जुन वेश की दुर्लभता एवं ऐतिहासिकता।
प्रत्येक वेश भारतीय सभ्यता के आध्यात्मिक संदेश का प्रतीक।
संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल (ओडिशा)। भगवान श्रीजगन्नाथ केवल एक देवता नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के उस विराट स्वरूप के प्रतीक हैं, जो संपूर्ण मानवता को एक सूत्र में जोड़ता है। 'जगन्नाथ' अर्थात 'जगत के नाथ'.... ऐसे ईश्वर जिन पर किसी एक संप्रदाय, जाति, भाषा अथवा भूगोल का अधिकार नहीं। यही कारण है कि पुरी का श्रीमंदिर वैष्णव, शैव, शाक्त, गणपत्य, बौद्ध और आदिवासी परंपराओं के अद्भुत समन्वय का जीवंत केंद्र माना जाता है।
श्रीजगन्नाथ की सबसे विलक्षण परंपराओं में से एक है 'बेशा' (वेश)। यह केवल वस्त्र परिवर्तन या श्रृंगार नहीं, बल्कि ईश्वर के विविध दार्शनिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वरूपों का सार्वजनिक उद्घोष है। वर्ष भर में भगवान विभिन्न अवसरों पर अलग-अलग रूप धारण करते हैं। प्रत्येक वेश किसी न किसी अवतार, ऋतु, पर्व, पौराणिक प्रसंग या लोकविश्वास से जुड़ा है।
32 वेशों की अद्भुत परंपरा
जगन्नाथ संस्कृति के अनुसार भगवान के 32 प्रमुख वेश वर्णित हैं। इनमें 30 वेश प्रतिवर्ष नियमानुसार संपन्न होते हैं, जबकि रघुनाथ वेश और नागार्जुन (परशुराम) वेश अत्यंत दुर्लभ खगोलीय एवं पंचांगीय योग बनने पर ही आयोजित किए जाते हैं।
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि भगवान जगन्नाथ का कोई एक निश्चित स्वरूप नहीं है। वे स्वयं 'पूर्ण ब्रह्म' हैं। इसलिए समय, अवसर और भक्तों की भावना के अनुरूप वे विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं। यही कारण है कि कभी वे श्रीराम बनते हैं, कभी श्रीकृष्ण, कभी वामन, कभी नृसिंह और कभी शिव-हरि के संयुक्त स्वरूप हरिहर के रूप में दर्शन देते हैं।
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मदला पांजी में दर्ज है वेशों का इतिहास
पुरी श्रीमंदिर का ऐतिहासिक अभिलेख ''मदला पांजी'' इन वेशों का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। इसके अलावा स्कंद पुराण, नीलाद्रि महोदय, पुरुषोत्तम माहात्म्य तथा अन्य वैष्णव ग्रंथों में भी इन परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
इतिहासकारों का मानना है कि गजपति राजाओं के काल में इन वेशों को सुव्यवस्थित स्वरूप मिला और आज भी इन्हें शताब्दियों पुरानी परंपरा के अनुसार संपन्न कराया जाता है।
रघुनाथ वेश की एक शताब्दी से अधिक समय से है प्रतीक्षा
रघुनाथ वेश भगवान जगन्नाथ के सबसे दुर्लभ वेशों में गिना जाता है। यह केवल तब आयोजित होता है जब बैसाख कृष्ण नवमी गुरुवार को विशेष पंचांगीय संयोग बनता है।
श्रीमंदिर के अभिलेखों के अनुसार यह वेश इतिहास में अब तक केवल दस बार संपन्न हुआ है। उपलब्ध अभिलेखों में 1577, 1739, 1809, 1833, 1842, 1850, 1893, 1896 तथा 1905 का उल्लेख मिलता है।
27 अप्रैल 1905 को रघुनाथ वेश के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचे थे। भारी भीड़ के कारण बड़ी संख्या में भक्त दर्शन से वंचित रह गए। इसके बाद 3 मई 1905 को पुनः रघुनाथ महावेश कराया गया। तब से लेकर आज तक यह दुर्लभ वेश दोबारा आयोजित नहीं हुआ।
नागार्जुन (परशुराम) वेश
महाप्रभु का नागार्जुन वेश, जिसे परशुराम वेश भी कहा जाता है, तब आयोजित होता है जब कार्तिक माह में पंचक पांच के स्थान पर छह दिनों का हो और ''मल तिथि'' का विशेष योग बने।
इस वेश में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन को युद्धवीर परशुराम के स्वरूप में अलंकृत किया जाता है। भक्तों के लिए यह दर्शन अत्यंत दुर्लभ और विशेष महत्व रखता है।
आधुनिक समय में यह वेश 1966, 1967, 1968, 1993, 1994 और 27 नवंबर 2020 को आयोजित हुआ। पंचांग के अनुसार आगामी नागार्जुन वेश 20 नवंबर 2029, 9 नवंबर 2030 और 2 नवंबर 2036 में संभावित है।
हर वेश में छिपा है एक संदेश
जगन्नाथ संस्कृति में प्रत्येक वेश किसी न किसी आध्यात्मिक संदेश का प्रतीक है:-
- हाथी (गजानन) वेश गणेश तत्व का प्रतीक है।
- कालियादलन वेश अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देता है।
- वनभोजी वेश श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की याद दिलाता है।
- प्रलम्बासुर वध वेश दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक है।
- हरिहर वेश शैव और वैष्णव परंपरा के अद्वैत का संदेश देता है।
- लक्ष्मीनृसिंह वेश भक्त की रक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है।
- राधादामोदर वेश प्रेम, भक्ति और माधुर्य रस का प्रतीक है।
- सुनाबेश भगवान की ऐश्वर्य लीला का अद्भुत स्वरूप है।
श्रीमंदिर में तीन वेश प्रतिदिन संपन्न होते हैं:-
- अबकाश वेश
- नित्यधूप वेश
- बड़सिंहार वेश
इसके अतिरिक्त:-
- चंदनलागी वेश– 42 दिन
- राधादामोदर वेश– लगभग एक माह
- तान्याना अधधूप वेश– सात दिन
- श्राद्ध वेश– तीन दिन
- सुनाबेश– वर्ष में पांच बार
सप्ताह के सात दिन, सात रंगों के वस्त्र
श्रीमंदिर की परंपरा में भगवान को सप्ताह के प्रत्येक दिन अलग-अलग रंगों के वस्त्र पहनाए जाते हैं।
- रविवार– लाल
- सोमवार– सफेद
- मंगलवार– पंचरंगी
- बुधवार– हरा अथवा नीला
- गुरुवार– पीला
- शुक्रवार– सफेद
- शनिवार– काला
धार्मिक मान्यता है कि इन रंगों का संबंध ग्रहों, पंचतत्वों और वैदिक परंपरा से है।
जगन्नाथ क्यों हैं सबसे अलग?
भारत के अधिकांश मंदिरों में भगवान की प्रतिमा स्थिर रहती है, लेकिन पुरी में भगवान स्वयं भक्तों के बीच आते हैं, रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण करते हैं, बीमार पड़ते हैं, औषधि ग्रहण करते हैं, नवयौवन धारण करते हैं, शयन करते हैं और वर्षभर अनेक रूपों में दर्शन देते हैं। यही जीवंत परंपरा जगन्नाथ संस्कृति को विश्व में अद्वितीय बनाती है।
जगन्नाथ किसी एक मत के नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के आराध्य हैं। उनके 32 दिव्य वेश यह संदेश देते हैं कि ईश्वर एक है, किंतु उसकी अभिव्यक्ति अनंत है। विविधता में एकता का जो दर्शन भारतीय संस्कृति की आत्मा है, वह श्रीजगन्नाथ के प्रत्येक वेश में साकार दिखाई देता है।
भगवान जगन्नाथ के 32 प्रमुख वेश
अबकाश, नित्यधूप, बड़सिंहार, चंदनलागी, गजानन (हाथी), नवयौवन, सेनापटा, ताहिया लागी, सुनाबेश, तान्याना, अधधूप, वनभोजी, कालियादलन, प्रलम्बासुर वध, कृष्ण-बलराम, वामन, राधादामोदर, हरिहर, लक्ष्मीनारायण, बंकाचूड़ा, त्रिविक्रम, लक्ष्मीनृसिंह, नागार्जुन, घोड़ालागी, श्राद्ध, पुष्याभिषेक, महानारायण, मकर चौराशी, पद्म, जामालागी, गज उद्धारण, चचेरी और रघुनाथ वेश। श्रीजगन्नाथ के वेशों की तिथियां चंद्र पंचांग, श्रीमंदिर की परंपरा तथा विशेष खगोलीय संयोगों के अनुसार निर्धारित होती हैं।