ओडिशा: वाह रे विकास! 12 करोड़ के पुल पर चढ़ने के लिए मिला 'बांस', मुफ्त में लें एडवेंचर स्पोर्ट्स का मजा
संबलपुर के बामडा में 12 करोड़ की लागत से बने पुल में एप्रोच रोड न होने से ग्रामीण बांस की सीढ़ी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे जान का खतरा बना हुआ है। ...और पढ़ें
HighLights
12 करोड़ का पुल बिना एप्रोच रोड के।
ग्रामीण बांस की सीढ़ी से पुल पर चढ़ते हैं।
प्रशासन भूमि विवाद को देरी का कारण बताता है।
ज्योति लाठ, बामडा (संबलपुर)। अगर आपको लगता है कि पुल का काम सिर्फ आसानी से इस पार से उस पार जाना है, तो आप शायद बहुत पुराने जमाने में जी रहे हैं। विकास के नए और 'एडवेंचरस' मॉडल के दर्शन करने हों, तो संबलपुर जिले के कुचिंडा अनुमंडल के बामडा चले आइए।
यहां खरला नदी के सीने पर 12 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से एक ऐसा आलीशान पुल खड़ा किया गया है, जो सड़क से जुड़ना शायद अपनी तौहीन समझता है।
दूरदर्शी योजनाकारों और इंजीनियरों ने पुल तो चकाचक बना दिया, लेकिन एप्रोच रोड बनाना भूल गए या यूं कहें कि उसे जानबूझकर छोड़ दिया गया, ताकि ग्रामीण अपनी फिटनेस पर ध्यान दे सकें।
नतीजा यह है कि आज इस करोड़ों के अजूबे पर चढ़ने और उतरने के लिए लोग 'बांस की सीढ़ी' का स्वदेशी जुगाड़ इस्तेमाल कर रहे हैं। आखिर 12 करोड़ के शाही पुल के दर्शन मुफ्त में थोड़े ही होते हैं, थोड़ी मशक्कत और जान का जोखिम तो बनता ही है!
बारिश के इस सुहावने मौसम में जब वैकल्पिक कच्चा रास्ता पूरी तरह जलमग्न होकर गायब हो जाता है, तब यह पुल स्थानीय लोगों के लिए किसी महंगे 'एडवेंचर पार्क' का काम करता है।
रोजमर्रा की मजदूरी करने वाले, घर की महिलाएं और स्कूल जाते नौनिहाल छात्र-छात्राएं अपना 9 किलोमीटर का लंबा चक्कर बचाने के लिए रोज मौत के कुएं जैसा करतब दिखाते हैं। वे बांस की इस सीढ़ी से ऐसे ऊपर-नीचे लटकते हैं मानो ओलंपिक की तैयारी कर रहे हों।
अगर गलती से सीढ़ी फिसल गई या टूट गई, तो सीधा ऊपर का टिकट कट सकता है, लेकिन शायद प्रशासन को लगता है कि इतनी छोटी-मोटी कुर्बानियां तो विकास के इस महायज्ञ में देनी ही पड़ती हैं।
अब आप सोच रहे होंगे कि प्रशासन इस 'लटकते विकास' पर क्या कहता है? उनके पास हमेशा की तरह अपनी नाकामी छुपाने का एक सरकारी ब्रह्मास्त्र मौजूद है- 'रैयती भूमि का विवाद'। वर्षों से यह बहाना इतनी खूबसूरती से सुनाया जा रहा है कि फाइलें भी अब इसके नाम पर आराम फरमाती हैं।
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कुचिंडा शहर को लसा, चंदनीमाल और ढुडीपाली जैसी पंचायतों से जोड़ने का जो सुनहरा सपना दिखाया गया था, वह फिलहाल उसी बांस की सीढ़ी पर टंगा हिचकोले खा रहा है।
ग्रामीण चीख-चीख कर कह रहे हैं कि हुजूर, कोई बड़ा हादसा हो जाएगा, लेकिन लगता है प्रशासन को उसी बड़े हादसे का इंतज़ार है, ताकि उसके बाद मुआवजे का चेक बांटकर पुल का 'विधिवत' उद्घाटन किया जा सके।
फिलहाल, तो जनता को चाहिए कि वे अपनी सीढ़ी मजबूत रखें, क्योंकि सरकारी सिस्टम की नींव तो पूरी तरह से खोखली हो चुकी है।
भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है। इसमें थोड़ा समय लगेगा भूमि अधिकरण होते ही अप्रोच रोड का निर्माण संपूर्ण कर दिया जाएगा। - संजय नायक, एसडीओ, कुचिंडा, आरएंडबी विभाग (सड़क और भवन विभाग)