Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    35 साल से ओडिशा में रह रहे बांग्लादेशी को मिली जमानत, कोर्ट ने कहा- लंबी हिरासत स्वयं सजा नहीं बन सकती

    Updated: Fri, 22 May 2026 03:19 PM (IST)

    ओडिशा हाईकोर्ट ने 35 साल से राज्य में रह रहे एक बांग्लादेशी नागरिक को जमानत दे दी है, जिसने भारतीय महिला से शादी कर परिवार बसाया था। ...और पढ़ें

    News Article Hero Image

    HighLights

    1. 35 साल से ओडिशा में रह रहे बांग्लादेशी को जमानत।

    2. कोर्ट ने अनुच्छेद-21 के तहत जीवन का अधिकार माना।

    3. अवैध निवास वैध नहीं, निगरानी जारी रहेगी: हाईकोर्ट।

    जागरण संवाददाता, अनुगुल। राष्ट्रीय सुरक्षा, अवैध प्रवास और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाते हुए उड़ीसा हाईकोर्ट ने 35 वर्षों से ओडिशा में रह रहे एक बांग्लादेशी नागरिक को जमानत दे दी है।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत देने का अर्थ उसके भारत में अवैध निवास को वैध ठहराना नहीं है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त है।

    न्यायमूर्ति जी. सतपथी की एकल पीठ ने बांग्लादेशी नागरिक अबू साहिक उर्फ साहिद उर्फ अबू सईद हावलदार की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि आरोपी पिछले तीन दशक से अधिक समय से गंजाम जिले के आस्का क्षेत्र में रह रहा है।

    उसने स्थानीय समाज में खुद को स्थापित किया, भारतीय महिला से विवाह किया और परिवार बसाया। उसके खिलाफ किसी प्रकार की आतंकवादी या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप भी नहीं है।

    1991 में आया था भारत, आस्का में शुरू किया था काम

    अदालत में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार अबू साहिक वर्ष 1991 में लगभग 20 वर्ष की आयु में भारत आया था। उसने आस्का में छाता मरम्मत का छोटा व्यवसाय शुरू किया और धीरे-धीरे स्थानीय लोगों के बीच घुलमिल गया। वर्ष 2001 में उसने स्थानीय महिला तेहरा बानो से विवाह किया। दंपती के दो पुत्र और दो पुत्रियां हैं।

    करीब 35 वर्षों तक सामान्य जीवन जीने के बाद अगस्त 2025 में पूछताछ के दौरान उसकी वास्तविक नागरिकता का खुलासा हुआ। इसके बाद आस्का थाना में मामला दर्ज कर पांच सितंबर 2025 से उसे न्यायिक हिरासत में रखा गया था।

    'लंबी हिरासत स्वयं सजा नहीं बन सकती'

    सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी का पूरा परिवार भारत में रह रहा है और उसके बच्चे यहीं पले-बढ़े हैं।

    करीब नौ महीने से परिवार अलगाव का सामना कर रहा है। अदालत ने भी माना कि मुकदमे के अंतिम निष्कर्ष तक किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्यायोचित नहीं माना जा सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा कि विदेशी नागरिकों और अवैध प्रवासियों के मामलों में कानून का पालन आवश्यक है, लेकिन मानवीय गरिमा की भी अनदेखी नहीं की जा सकती।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत के बाद भी विदेशी अधिनियम, 1946 के तहत प्रशासन उसकी गतिविधियों और आवाजाही पर निगरानी रख सकता है।

    राज्य सरकार को जारी किए अहम निर्देश

    मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और प्रशासन को कई महत्वपूर्ण निर्देश भी दिए। अदालत ने कहा कि विदेशी नागरिकों से जुड़े मामलों की जांच और सुनवाई में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। लंबी हिरासत को सजा का रूप नहीं लेने दिया जा सकता।

    खबरें और भी

    अदालत ने होल्डिंग सेंटरों में रह रहे विदेशी नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों के साथ मानवीय व्यवहार सुनिश्चित करने, भोजन, चिकित्सा और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

    साथ ही कहा कि जमानत मिलने पर संबंधित ट्रायल कोर्ट तुरंत सक्षम प्राधिकारी को सूचना दे ताकि भविष्य में निर्वासन की प्रक्रिया कानूनी रूप से पूरी की जा सके।

    50 हजार के मुचलके पर मिली राहत

    हाईकोर्ट ने आरोपी को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों के आधार पर रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने फैसले की प्रति मुख्य सचिव, गृह विभाग और डीजीपी ओडिशा को भी भेजने का निर्देश दिया है।

    यह भी पढ़ें- Russia-Ukraine War: यूक्रेन के हमले में ओडिशा के मजदूर की मौत, रूस से गांव पहुंचा पार्थिव शरीर