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    टूटे पैर, बुलंद हौसले! ओडिशा में 250 KM तिपहिया साइकिल चलाकर इलाज कराने अस्पताल पहुंचे 65 साल के बुजुर्ग

    Updated: Fri, 07 Aug 2026 01:24 PM (IST)

    नयागढ़ के 65 वर्षीय शुकदेव नाहक ने टूटे पैर के इलाज के लिए 250 किलोमीटर तिपहिया साइकिल चलाकर बरहमपुर अस्पताल पहुंचे। ...और पढ़ें

    तिपहिया साइकिल चलाकर इलाज कराने अस्पताल पहुंचे 65 साल के बुजुर्ग

    तिपहिया साइकिल चलाकर इलाज कराने अस्पताल पहुंचे 65 साल के बुजुर्ग

    HighLights

    1. 65 वर्षीय शुकदेव नाहक ने 250 KM का सफर तय किया।

    2. टूटे पैर के इलाज के लिए तिपहिया साइकिल से पहुंचे अस्पताल।

    3. अस्पताल में विशेष व्यवस्था, इलाज जारी, हौसले की मिसाल।

    संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल(ओडिशा)। शरीर साथ छोड़ दे तो अक्सर उम्मीद भी दम तोड़ देती है। लेकिन नयागढ़ जिले के बरासाही गांव के 65 वर्षीय शुकदेव नाहक ने यह साबित कर दिया कि टूटते हैं पैर, हौसले नहीं। 

    वर्षों से टूटे पैर के दर्द के साथ जी रहे शुकदेव ने बेहतर इलाज की उम्मीद में अपनी तिपहिया साइकिल उठाई और कई दिनों तक सड़कें नापते हुए करीब 250 किलोमीटर दूर बरहमपुर स्थित एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंच गए। 

    यह सफर केवल दूरी का नहीं था, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और जीने की जिद का था। रास्ते में न कोई सहारा था, न कोई परिजन। हर मोड़ पर दर्द था, हर किलोमीटर पर परीक्षा। फिर भी शुकादेव के मन में एक ही विश्वास था 'शायद इस अस्पताल में मेरा पैर ठीक हो जाए।

    इकलौता बेटा मानसिक बीमारी 

    'सेवानिवृत्त ग्राम रक्षक(चौकीदार) शुकदेव का जीवन पिछले कई वर्षों से कठिनाइयों से घिरा है। वर्ष 2022 से आर्थिक तंगी ने उन्हें लगभग बेबस कर दिया। दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है, जबकि इकलौता बेटा मानसिक बीमारी से जूझ रहा है। 

    अकेले जीवन बिताने वाले शुकदेव के पास इलाज के लिए न पैसे थे, न कोई साथ चलने वाला। लेकिन उन्होंने हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय अपने हौसले को साथी बनाया अस्पताल पहुंचने पर उनका संघर्ष सुनकर डॉक्टर, नर्सें और स्वयंसेवक भावुक हो उठे। तत्काल उन्हें भर्ती कराया गया और उपचार शुरू कर दिया गया। 

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    इलाज के लिए विशेष व्यवस्था 

    अस्पताल प्रशासन ने उनके इलाज के लिए विशेष व्यवस्था की है, जबकि स्वयंसेवक उनकी रोजमर्रा की जरूरतों का भी ध्यान रख रहे हैं। शुकदेव कहते हैं, 'मैं कई सालों से ठीक से चल नहीं पाता। फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी। मुझे भरोसा था कि यहां डॉक्टर मेरा इलाज करेंगे, इसलिए चला आया।' 

    अस्पताल के एक अधिकारी ने बताया कि शुकदेव का उपचार जारी है और विशेषज्ञ चिकित्सकों की निगरानी में उनकी देखभाल की जा रही है। उम्मीद है कि उचित इलाज के बाद वे स्वस्थ होकर अपने गांव लौट सकेंगे।आज जब छोटी-छोटी परेशानियां लोगों का हौसला तोड़ देती हैं, तब शुकदेव नाहक की यह यात्रा एक बड़ा संदेश देती है कि  दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने उम्र, गरीबी, विकलांगता और दूरी भी हार मान लेती है। यह कहानी सिर्फ इलाज तक पहुंचने की नहीं, बल्कि उम्मीद को जिंदा रखने की कहानी है।