महाप्रभु जगन्नाथ एनिमेटेड फिल्म पर विवाद बढ़ा, पुरी के शंकराचार्य ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जताई नाराजगी
एनिमेटेड फिल्म 'महाप्रभु जगन्नाथ' की रिलीज को सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिलने के बाद विवाद गहरा गया है। पुरी के शंकराचार्य ने धार्मिक मामलों में अदालती ...और पढ़ें

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती (फाइल फोटो)
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने 'महाप्रभु जगन्नाथ' एनिमेटेड फिल्म रिलीज को मंजूरी दी।
पुरी शंकराचार्य ने धार्मिक मामलों में अदालती हस्तक्षेप पर नाराजगी जताई।
फिल्म पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप, विवाद जारी।
जागरण संवाददाता, भुवनेश्वर। एनिमेटेड फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ की रिलीज को सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिलने के बाद विवाद और गहरा गया है। पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने धर्म और धार्मिक परंपराओं से जुड़े मामलों में अदालतों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे विषयों पर निर्णय का अधिकार धार्मिक संस्थाओं और आध्यात्मिक परंपराओं को होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने फिल्म की रिलीज की अनुमति दी है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि 16 जुलाई से शुरू हुई भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा और उससे जुड़े सभी प्रमुख अनुष्ठान संपन्न हो चुके हैं। इसके बाद अदालत ने फिल्म को 28 जुलाई या उसके बाद प्रदर्शित करने की अनुमति दे दी।
फिल्म का विरोध पहले से ही श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) और कई धार्मिक संगठनों द्वारा किया जा रहा है। उनका कहना है कि भगवान जगन्नाथ को एनिमेटेड या कार्टून रूप में प्रस्तुत करना धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकता है तथा इससे युवा पीढ़ी के बीच जगन्नाथ संस्कृति और परंपराओं की गलत व्याख्या होने की आशंका है।
जगन्नाथ संस्कृति विशेषज्ञ नरेश दास ने कहा कि यदि फिल्म का निर्माण शास्त्रों और पुराणों में वर्णित भगवान जगन्नाथ के स्वरूप और परंपराओं के अनुरूप किया जाता तो इसे अधिक स्वीकार्यता मिलती। वहीं बिभूति भूषण चौधरी ने कहा कि भगवान जगन्नाथ के एनिमेटेड चित्रण से करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
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दूसरी ओर फिल्म निर्माताओं ने अपने पक्ष में कहा है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने ओड़िया, हिंदी और तेलुगु संस्करणों को ‘यू’ प्रमाणपत्र प्रदान किया है।
निर्माताओं का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केवल विरोध के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता और किसी भी संस्था को सीबीएफसी के निर्णय को पलटने का अधिकार नहीं है। फिल्म को लेकर अब धार्मिक आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच बहस तेज हो गई है।