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    श्रीगुंडिचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ की 'राहास नीति', 3 दिनों तक ब्रजधाम के रूप में जीवंत होती है गुंडिचा पूरी

    By Laxmi Narayan PatnayakEdited By: Piyush Pandey
    Updated: Wed, 22 Jul 2026 06:30 AM (GMT+05:30)

    श्रीगुंडिचा मंदिर में रथयात्रा के दौरान सप्तमी से नवमी तक तीन दिनों तक विशेष 'राहास नीति' का आयोजन होता है। ...और पढ़ें

    जगन्नाथ रथयात्रा। (जागरण)

    जगन्नाथ रथयात्रा। (जागरण)

    HighLights

    1. राहास नीति श्रीगुंडिचा मंदिर में तीन दिनों तक होती है।

    2. यह श्रीकृष्ण की गोपियों संग रासलीला का प्रतीक है।

    3. श्रीगुंडिचा मंदिर इस दौरान प्रतीकात्मक ब्रजधाम बन जाता है।

    जागरण संवाददाता, पुरी। भगवान श्रीजगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण का ही स्वरूप माना जाता है। यही कारण है कि रथयात्रा के दौरान श्रीगुंडिचा मंदिर में विराजमान रहने के समय भगवान की अनेक विशेष लीलाएं और परंपराएं निभाई जाती हैं। इन्हीं में से एक है 'राहास नीति', जो सप्तमी, अष्टमी और नवमी तक लगातार तीन दिनों तक संपन्न होती है।

    परंपरा के अनुसार संध्याधूप के बाद श्रीमंदिर के खटशैया घर से श्रीमदनमोहन को विधिवत विजय कर जय-विजय द्वार के समीप विराजमान कराया जाता है।

    यहीं राहास नीति संपन्न होती है। इस अवसर पर भगवान की विशेष बंदापना की जाती है तथा शीतल भोग अर्पित किया जाता है।

    इसी दिन श्रीमदनमोहन की विशेष बंदापना और चंदन लागी नीति भी संपन्न होती है। श्रीमंदिर की परंपरा में इसे 'ओड़िया मठ सर्वांग' कहा जाता है। इस अवसर पर चतुर्धा मूर्तियों के साथ श्रीमदनमोहन और रामकृष्ण को भी चंदन अर्पित किया जाता है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रीगुंडिचा मंदिर को घोष (गौड़ पल्ली) अर्थात ब्रजधाम का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि ब्रज में गोपियां भगवान श्रीकृष्ण से अत्यंत प्रेम करती थीं और उनके साथ रासलीला करती थीं।

    प्रतीकात्मक रूप से बन जाता है ब्रजधाम

    श्रीमंदिर के रत्नसिंहासन पर विराजमान रहने के दौरान गोपियों को भगवान के दर्शन सहज रूप से नहीं मिल पाते, लेकिन रथयात्रा के समय जब महाप्रभु श्रीगुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, तब यह स्थान प्रतीकात्मक रूप से ब्रजधाम बन जाता है।

    विश्वास है कि इसी अवधि में भगवान जगन्नाथ अपने प्रिय कन्हैया स्वरूप में गोपियों को सान्निध्य प्रदान करते हैं। प्रतीकात्मक रूप से भगवान जगन्नाथ की चलंत प्रतिमा श्रीमदनमोहन राहास स्थल पर विराजमान होकर राहास नीति का पालन करती है।

    श्रद्धालुओं का मानना है कि इस अनुष्ठान के माध्यम से महाप्रभु ब्रजवासियों और गोपियों को अपने दिव्य सान्निध्य का सौभाग्य प्रदान करते हैं।

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