22 साल बाद मिला न्याय, पर खोई जिंदगी का हिसाब कौन देगा? ओडिशा के चर्चित कोरापुट मर्डर केस में SC की तल्ख टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कोरापुट तिहरे हत्याकांड में दोषी अर्जुन जानी को 22 साल बाद सभी आरोपों से बरी कर दिया है, कमजोर साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभी ...और पढ़ें

कोर्ट की प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने अर्जुन जानी को तिहरे हत्याकांड से बरी किया।
कमजोर साक्ष्य और गवाह के विरोधाभासी बयानों पर फैसला।
न्यायिक देरी और प्रक्रियात्मक चूक पर शीर्ष अदालत की टिप्पणी।
संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल। ओडिशा के कोरापुट जिले के बहुचर्चित तिहरे हत्याकांड में दोषी ठहराए गए अर्जुन जानी को सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 22 वर्ष जेल में बिताने के बाद सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ पेश किए गए साक्ष्य कमजोर और बेहद अविश्वसनीय थे।
अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के जीवन के 22 साल बिना किसी ठोस और विश्वसनीय सबूत के छीन लिए गए।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ की तल्ख टिप्पणी
न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एस.के. सिंह की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए।
पीठ ने स्पष्ट कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना, तथाकथित स्वीकारोक्ति हासिल करने के लिए थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करना और फिर उसी आधार पर दोषी ठहराना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
क्या था वर्ष 2004 का यह मामला?
यह मामला वर्ष 2004 का है, जब कोरापुट जिले में कमला, सोनबरी और रत्नाई नामक तीन महिलाओं की नृशंस हत्या कर दी गई थी।
पुलिस और अभियोजन पक्ष का पूरा मामला मुख्य रूप से केवल एक प्रत्यक्षदर्शी (Eye Witness) की गवाही पर टिका हुआ था। उस गवाह ने दावा किया था कि उसने अर्जुन जानी को रत्नाई पर हमला करते देखा था।
गवाह के बयानों में भारी विरोधाभास
अदालत में गहन समीक्षा के दौरान गवाह की गवाही में कई गंभीर विरोधाभास सामने आए। गवाह ने स्वीकार किया कि घटना की रात उसी रास्ते से गुजरने के बावजूद उसने अन्य दो महिलाओं के शव नहीं देखे थे।
इसके अलावा, उसने अलग-अलग समय पर अलग-अलग लोगों को घटना के बारे में जो जानकारी दी थी, उन बयानों में कोई एकरूपता नहीं थी।
हाइकोर्ट की प्रक्रियात्मक चूक से कटे 10 अतिरिक्त साल
इन विरोधाभासों के बावजूद अर्जुन जानी को वर्ष 2006 में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी गई थी। इसके बाद उनकी अपील पर समय रहते सुनवाई नहीं हो सकी।
11 जनवरी 2016 को उड़ीसा उच्च न्यायालय ने अपील दाखिल करने में हुई 3,157 दिनों की देरी को माफ करने से इन्कार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
शीर्ष अदालत ने इस प्रक्रियात्मक चूक पर भी गहरी चिंता जताई और कहा कि इसके कारण अर्जुन जानी को करीब एक दशक अतिरिक्त जेल की सलाखों के पीछे गुजारना पड़ा।
बाद में अर्जुन जानी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मई में शीर्ष अदालत ने उनकी अपील स्वीकार कर जमानत दी थी। अब सभी साक्ष्यों की विस्तृत समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पूर्णतः निर्दोष पाते हुए बरी कर दिया है।
इस फैसले ने एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि कमजोर जांच और न्यायिक देरी के कारण गंवाए गए 22 सालों की भरपाई व्यवस्था कैसे करेगी।