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    कब थमेगी युवाओं के सब्र की ‘परीक्षा’

    By Manu TyagiEdited By: Naveen Kumar
    Updated: Sat, 16 May 2026 11:09 AM (IST)

    नीट-यूजी परीक्षा रद होने से 23 लाख छात्रों का भविष्य अनिश्चित है, जो भारत की परीक्षा प्रणाली की खोखली व्यवस्था को उजागर करता है। ...और पढ़ें

    परीक्षाएं केवल करियर का जरिया नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के उत्थान की एकमात्र सीढ़ी

    परीक्षाएं केवल करियर का जरिया नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के उत्थान की एकमात्र सीढ़ी

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    मनु त्‍यागी। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में परीक्षाएं केवल करियर का जरिया नहीं, बल्कि वे लाखों मध्यवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए सामाजिक व आर्थिक उत्थान की एकमात्र सीढ़ी हैं। देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा, नीट-यूजी में शामिल हुए 23 लाख से अधिक अभ्यर्थियों का भविष्य आज अनिश्चितता के मोड़ पर है। परीक्षा रद होने की इस घटना ने न केवल देश की मेधा को हताश किया है, इससे हमारी संपूर्ण परीक्षा प्रणाली का खोखलापन भी एक बार फिर दुनिया के सामने उजागर हुआ है।

    सवाल सिर्फ एक परीक्षा के रद होने तक का नहीं है, सवाल उस मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक शोषण और नैतिक पतन का है जिसके चक्रव्यूह में आज का युवा फंस चुका है। क्या उस मानसिक क्षति का भुगतान कोई जिम्मेदार/जवाबदेह कर पाएगा? सालभर दिन-रात एक कर, अपनी नींद और सामाजिक जीवन से इतर तैयारी करने वाले 23 लाख छात्रों की मानसिक क्षति का हिसाब किसके बहीखाते में दर्ज होगा?

    इसके पीछे छात्रों की एंग्जायटी, अवसाद और आत्मघाती विचारों का जाल उमड़ता है, स्वजन के लिए भी कितनी बड़ी चुनौती है, इसे सिर्फ वही स्वजन महसूस कर सकते हैं, जो इस पीड़ा से गुजर रहे हैं। क्योंकि इसकी जिम्मेदारी लेने के लिए कोई आगे नहीं आता। हां, ये व्यवस्थागत विफलता देश के युवाओं में व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास को भी जन्म देती है। जिसकी चिंता, सिस्टम के लिए बहुत जरूरी है।

    जब अपनी मेहनत पर भरोसा करने वाले ईमानदार छात्रों को यह पता चलता है कि चंद रुपयों के दम पर पर्चे पहले ही बिक चुके थे, तो उनका पूरी लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है। इस सामूहिक मानसिक अवसाद की पहली और अंतिम जिम्मेदार परीक्षा नियामक संस्थाएं और उनकी थोथी नीतियां हैं।

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    ठेके के ढांचे पर खड़ी एजेंसी

    जब भी कोई बड़ा पेपर लीक होता है, तो सबसे पहला कदम कुछ छोटे मोहरों, कंप्यूटर आपरेटरों या स्थानीय साल्वर गैंग की गिरफ्तारी तक ही सीमित रह जाता है। मूल सवाल, वहीं का वहीं रह जाता है कि आखिर असली जवाबदेही किसकी है? क्योंकि पानी का बहाव तो हमेशा ऊपर से ही आता है। इस प्रकरण में तो राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के कर्मचारियों तक की भी मिलीभगत तक सामने आ रही है।

    ऐसा संलिप्तता के संकेत मिलना इसलिए भी स्वाभाविक है, लंबे समय अपने ढांचे को आकार देने में लगी ये एजेंसी आज भी अस्थाई कर्मचारियों के कमजोर लाट पर ही खड़ी है। एनटीए का संकट 'छिटपुट' नहीं, बल्कि ढांचागत है। आखिर क्यों लाइलाज हुई यह प्रणाली? सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार, जन-आक्रोश और उच्च स्तरीय सुधार समितियों के गठन के बावजूद यह तंत्र क्यों नहीं सुधर पा रहा?

    इसके पीछे सबसे बड़ा कारण एजेंसी की आउटसोर्सिंग पर अत्यधिक निर्भरता है। एनटीए एक पूर्ण सरकारी विभाग के बजाय एक स्वायत्त संस्था की तरह काम करता है, जिसके पास परीक्षाओं के विज्ञानी संचालन के लिए खुद का मजबूत बुनियादी ढांचा नहीं है। प्रश्न पत्र छापने वाले प्रिंटिंग प्रेस से लेकर परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा और कंप्यूटर लैब तक सब कुछ निजी वेंडर्स को ‘ठेके’ पर दिया जाता है। गौर करने वाली बात है, पूर्व के प्रकरणों के बाद एजेंसी को बाहर से छपाई न कराने के लिए आगाह भी किया गया था।

    यह निजीकरण ही परीक्षा माफिया के लिए सुरक्षा घेरे में सेंध लगाने का सबसे आसान जरिया बनता है। दूसरा बड़ा कारण स्थायी और विशेषज्ञ कर्मचारियों की भारी कमी है। देश की सबसे बड़ी परीक्षाओं को आयोजित करने वाली इस शीर्ष संस्था का संचालन बड़े पैमाने पर प्रतिनियुक्ति और अनुबंध पर रखे गए कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है। जब तक आंतरिक तंत्र में जवाबदेही और गोपनीयता का कड़ा प्रोटोकाल लागू नहीं होगा, तब तक सूचनाओं का रिसाव रोकना असंभव है।

    इसके साथ ही, डिजिटल सुरक्षा और उन्नत तकनीक के उपयोग में भी एजेंसी की ढिलाई साफ दिखती है। एक तरफ हम नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को देशभर में हर सिरे पर लागू करने की पुरजोर कोशिशों से जुटे हैं। दूसरी तरफ दुनिया के सबसे युवा आबादी वाले देश भारत में अपना भविष्य बनाने की देहरी पर खड़े अभ्यर्थियों के लिए निष्कलंक परीक्षा कराने का सिस्टम तक नहीं है।

    एजेंसी ने जितनी सहजता, सरलता और सौम्यता के साथ इस परीक्षा को दोबारा से कराए जाने की बात कह दी, उस परीक्षा को दोबारा से कराने में तकरीबन 500 करोड़ से अधिक का खर्च आएगा। छात्रों/अभ्यर्थियों की मानसिक यातना को एक क्षण के लिए इतर रखकर भी सोचें तो यदि एजेंसी पूर्व की लापरवाहियों से सबक लेकर सुधार करती, पारदर्शिता को सुदृढ बनाती, इतने बड़े खर्च को अपने ढांचे में सुधार के लिए व्यय करती तो आज उस पर ऐसे कलंक नहीं लग रहे होते।

    देश की सबसे बड़ी और सुरक्षित मानी जाने वाली परीक्षा एजेंसी अगर अपनी कस्टडी चेन और डिजिटल सुरक्षा को अभेद्य नहीं रख सकती, तो उसके बने रहने के नैतिक अधिकार पर भी सवाल उठता है। हाई-टेक सर्विलांस, एआइ मानीटरिंग और बायोमीट्रिक सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे अंततः खोखले साबित हुए।

    स्वायत्त संस्थाओं के नाम पर एनटीए को पूरी छूट देना और संकट आने पर केवल 'जांच समितियों' का गठन कर देना शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी को कम नहीं करता। बार-बार होती इन गड़बड़ियों के बावजूद परीक्षा तंत्र का समय रहते पुनर्सृजन न कर पाना मंत्रालय की नीतिगत शिथिलता को दर्शाता है।

    ये किसी से छिपा नहीं है कि कोचिंग सेंटरों, प्रिंटिंग प्रेस के भ्रष्ट कर्मचारियों और प्रशासनिक अधिकारियों का एक ऐसा संगठित सिंडिकेट देश में सक्रिय है, जो अरबों रुपये के इस काले कारोबार को बेखौफ चला रहा है। यह सिंडिकेट न्याय प्रणाली की ढिलाई और कम सजा के प्रविधानों का ही तो फायदा उठाकर हर बार बच निकलता है।

    हंगामा : जांच : कमेटी उसके बाद क्या?

    भारत के लिए ये गौरव की बात है कि वो सबसे युवा देश है। यानी 60 प्रतिशत आबादी युवा है। भारत में हर साल लगभग छह-सात करोड़ युवा किसी न किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठते हैं। आप भी समझते हैं कि यह संख्या दुनिया के कई देशों की कुल आबादी से भी अधिक है। आज भी देश के इस विशाल युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अपने जीवन के सबसे सुनहरे और ऊर्जावान वर्ष यानी अपनी उम्र के 20 के पड़ाव का समय सिर्फ सरकारी नौकरियों, मेडिकल या इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी में झोंक देता है।

    ताजा प्रसंग भले नीट के 23 लाख अभ्यर्थियों की दोबारा परीक्षा से जुड़ा है और एनटीए कठघरे में है लेकिन कैट जैसी परीक्षाओं के अलावा सवाल तो हमेशा हर परीक्षा पर ही रहे हैं। और एनटीए की परीक्षा प्रणाली तो अपने अवतरण से ही हर बार गड़बडि़यों के साथ ही परीक्षाएं कराती आई है। सीयूईटी, 2022 की तकनीकी अव्यवस्था, शुरुआती साल में सर्वर क्रैश होने, अंतिम समय में परीक्षा केंद्र बदलने और तकनीकी खामियों के कारण देश भर में अराजकता फैली थी। नीट-यूजी-2024 का महा-विवाद, झारखंड के हजारीबाग और बिहार के पटना से पेपर लीक के पुख्ता सुबूत मिले थे।

    इसके साथ ही संदिग्ध रूप से 'ग्रेस मार्क्स' देने और एक साथ रिकार्ड 67 छात्रों के पूरे अंक (720/720) आने से एजेंसी की विश्वसनीयता पर सवाल उठे थे। यूजीसी-नेट जून 2024, परीक्षा के ठीक एक दिन बाद डार्कनेट पर पेपर लीक होने के इनपुट मिलने के बाद सरकार को यह परीक्षा पूरी तरह रद करनी पड़ी थी। यूजीसी-नेट लीक के तुरंत बाद सीएसआइआर-नेट और नेशनल कामन एंट्रेंस टेस्ट (एनसीईटी) जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं को तकनीकी कारणों का हवाला देकर टालना पड़ा था।

    इसके आगे अभ्यर्थियों की रोजगार हेतु भी परीक्षाओं की गहराइयों में गोते जाएंगे कितने ही परीक्षा घोटालों की काही सामने आती जाएगी, जो कभी छूटी नहीं। चूंकि सरकारी जांच प्रक्रिया में इस पूरे काकस को कभी सामने लाने की इच्छाशक्ति ही नहीं रही। व्यापमं घोटाला (मध्य प्रदेश) भारत के इतिहास का सबसे कुख्यात परीक्षा घोटाला है। जहां सरकारी भर्तियों के लिए साल्वर गैंग, फर्जी उम्मीदवारों और अधिकारियों के गठजोड़ ने पूरी व्यवस्था को खोखला कर दिया था, जिसकी जांच आज भी जारी है।

    रेलवे भर्तियां, कर्मचारी चयन आयोग इनकी परीक्षाओं में तकनीकी धांधली और रिमोट एक्सेस के जरिए पेपर लीक का बड़ा मामला सामने आया था, जिसके खिलाफ युवाओं ने हफ्तों तक सड़क पर प्रदर्शन किया था। इसके अतिरिक्त, रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं में भी बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगते ही रहे हैं। यूजीसी-नेट को भी सुरक्षा कारणों और विश्वसनीयता पर आंच आने के चलते रद करना पड़ा था।

    राज्यों की पुलिस भर्तियां अक्सर ही सवालों के घेरे में होती हैं। और हर बार बात सिर्फ जांच तक ही आकर खत्म हो जाती है। यही कारण है कि सबसे पुराने व्यापमं घोटाले से लेकर बाकी मामलों की जांच आज तक भी जारी ही है। इससे न्याय प्रणाली की असंवेदनशीलता और युवा पीढ़ी के प्रति गैर जिम्मेदार रवैये का भी बोध होता है।

    कड़े और क्रांतिकारी कदम जरूरी/लीपापोती के बजाय चाहिए ‘सर्जरी’:

    इस बार सिस्टम को जांच की नजीर पेश करनी ही होगी। 23 लाख अभ्यर्थियों की पीड़ा, उनके स्वजन की मेहनत की कमाई की क्षति को महज़ एक प्रशासनिक ‘चूक’ मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। सके। देश की प्रतिभाओं को मानसिक अवसाद और व्यवस्था के प्रति अविश्वास से बचाना है, तो अब लीपापोती के बजाय इस संस्था की 'सर्जरी'।

    सरकार और न्यायपालिका को त्वरित कार्यवाही और कार्रवाई की प्रक्रिया को तेज करते हुए कड़े फैसले लेने ही होंगे। इस राष्ट्रीय संकट से उबरने और परीक्षाओं की साख को बहाल करने के लिए अब युद्धस्तर पर कड़े और क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे। पेपर लीक में शामिल अपराधियों, कोचिंग सेंटरों और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं के तहत मामला दर्ज हो और फास्ट-ट्रैक अदालतों के जरिए अधिकतम छह महीने के भीतर सजा सुनिश्चित की जाए।

    पारंपरिक छपाई और परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह बदलकर सुरक्षित, इनक्रिप्टेड डिजिटल कस्टडी और अत्याधुनिक कंप्यूटर आधारित टेस्ट माडल को पूरी तरह अपनाना होगा, जिसमें मानवीय हस्तक्षेप शून्य के बराबर हो। एक ही एजेंसी पर देश की सभी बड़ी परीक्षाओं का बोझ लादने के बजाय, सुरक्षा और संचालन की जिम्मेदारी को विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिए ताकि निगरानी बेहतर हो ।

    इसरो के पूर्व प्रमुख डा. के. राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को बिना किसी देरी के पूरी तरह लागू करना होगा। परीक्षाओं को पूरी तरह से 'मल्टी-सेशन' और सुरक्षित 'हाइब्रिड माडल' पर ले जाना होगा, ताकि यदि एक सेट प्रभावित भी हो, तो पूरी राष्ट्रीय परीक्षा को रद न करना पड़े। सबसे महत्वपूर्ण कदम यह होना चाहिए कि परीक्षाओं के लिए निजी वेंडर्स और निजी केंद्रों को पूरी तरह प्रतिबंधित कर केवल केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों या प्रतिष्ठित सरकारी कालेजों को ही परीक्षा केंद्र बनाया जाए।

    लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 के तहत पेपर लीक करने वालों को बिना किसी ढिलाई के न्यूनतम 10 साल की जेल और एक करोड़ रुपये के जुर्माने की सख्त सजा दी जानी चाहिए ताकि अपराधियों में भय पैदा हो। अब तक के परीक्षा लीक प्रकरणों में इसका असर दिखता नहीं है क्योंकि कोई जांच कभी मूल जड़ तक जाती ही नहीं है।