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    असम में कांग्रेस की मुस्लिम बहुल सीटों पर जीत के क्या हैं मायने, कौन-सा फैक्टर कर गया काम?

    Updated: Thu, 07 May 2026 06:57 PM (IST)

    असम विधानसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस को मुस्लिम बहुल सीटों पर सफलता मिली, जबकि बीजेपी ने हिंदू वोटों के दम पर बड़ी जीत दर्ज की। एआईयूडीएफ के कमजोर पड़ ...और पढ़ें

    असम में मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस की बड़ी जीत (फाइल फोटो)

    असम में मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस की बड़ी जीत (फाइल फोटो)

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    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाया है। कांग्रेस को ज्यादातर सफलता मुस्लिम बहुल सीटों पर मिली, जबकि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने हिंदू वोटों के दम पर बड़ी जीत दर्ज की। इसमें आदिवासी और चाय बागान के मजदूर समुदाय का भी बड़ा समर्थन बीजेपी को मिला, जो पहले लंबे समय तक कांग्रेस के साथ माना जाता था।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी AIUDF का कमजोर पड़ना रहा। यह पार्टी लंबे समय से असम के बंगाली भाषी मुस्लिम समुदाय, जिन्हें आमतौर पर 'मिया' कहा जाता है, उनकी राजनीति का बड़ा चेहरा मानी जाती थी। यह समुदाय राज्य की कुल आबादी का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा माना जाता है।

    पहले लोअर असम और बराक घाटी के इलाकों में मुस्लिम वोट कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच बंट जाते थे। इसका फायदा कई सीटों पर बीजेपी और उसके सहयोगी असम गण परिषद को मिलता था। लेकिन इस बार एआईयूडीएफ की संगठनात्मक ताकत और जनाधार कमजोर पड़ने से बड़ी संख्या में मुस्लिम वोट कांग्रेस की तरफ चले गए।

    मुस्लिम वोटों का रणनीतिक ध्रुवीकरण

    इस चुनाव में मुस्लिम समुदाय के बीच रणनीतिक वोटिंग भी देखने को मिली। कई मतदाताओं को लगा कि बीजेपी को सीधे चुनौती देने की स्थिति में सिर्फ कांग्रेस ही है। इसी सोच के चलते कई सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार कमजोर माने जाने के बावजूद मुस्लिम वोट एकजुट होकर कांग्रेस के पक्ष में गए।

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    वहीं मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी ने हिंदू वोटों को जाति और क्षेत्रीय आधार से ऊपर उठाकर एकजुट करने में सफलता हासिल की। अपर असम, नॉर्थ बैंक और मध्य असम के कई इलाकों में बीजेपी ने चुनाव को वैचारिक मुकाबले में बदल दिया, जिससे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के बाहर कांग्रेस की पकड़ कमजोर पड़ गई।

    दरांग और नगांव जैसे जिलों में चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियानों का असर भी चुनाव में साफ दिखा। मुस्लिम समुदाय के कई लोगों ने इन कार्रवाइयों को डर और असुरक्षा से जोड़ा, जबकि बड़ी संख्या में स्थानीय असमिया और बहुसंख्यक समुदाय के मतदाताओं ने इसे जमीन बचाने और सख्त प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में देखा।

    परिसीमन के बाद बदला चुनावी गणित

    एआईयूडीएफ को लेकर भी लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हुई कि पार्टी अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को फायदा पहुंचा रही है, क्योंकि वह विरोधी वोटों को बांट रही थी। राज्यसभा चुनाव के दौरान बीजेपी को दिए गए समर्थन के बाद यह धारणा और मजबूत हो गई। इसके बाद कई अल्पसंख्यक मतदाताओं ने एआईयूडीएफ छोड़कर कांग्रेस का साथ दिया।

    साल 2023 में हुए परिसीमन ने भी असम की राजनीति को काफी बदल दिया। नई सीमांकन प्रक्रिया में कई मिश्रित आबादी वाली सीटें खत्म हो गईं और सीटें अधिक स्पष्ट रूप से बहुसंख्यक या मुस्लिम बहुल बन गईं। पहले कांग्रेस मुस्लिम वोटों के साथ कुछ हिंदू वोट जोड़कर कई सीटें जीत लेती थी, लेकिन परिसीमन के बाद यह समीकरण बदल गया।

    पहले करीब 35 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में थे, लेकिन परिसीमन के बाद यह संख्या घटकर करीब 22 सीटों तक रह गई। चुनाव नतीजों में यही बदलाव साफ दिखाई दिया। कांग्रेस मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल सीटों तक सीमित होती दिखी, जबकि बीजेपी ने राज्य के अधिकांश बहुसंख्यक इलाकों में अपना दबदबा कायम कर लिया।

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