किसान परिवार से CM तक... कैसे कर्नाटक की राजनीति के हीरो बने सिद्दरमैया? अब छोड़ा मुख्यमंत्री का पद
सिद्दरमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है, करीब आठ साल तक दो अलग-अलग कार्यकाल में सेवा की। अब उनकी जगह डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्र ...और पढ़ें
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गरीबी से उठकर कर्नाटक की सत्ता तक पहुंचे सिद्दरमैया (फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सिद्दरमैया ने गुरुवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। करीब आठ साल और आठ दिन तक दो अलग-अलग कार्यकाल में मुख्यमंत्री रहने के बाद उन्होंने पद छोड़ा। अब उनकी जगह उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने की संभावना है।
कांग्रेस अब 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटेगी। वहीं सूत्रों के अनुसार, सिद्धारमैया को आगे चलकर राज्यसभा भेजा जा सकता है, ताकि 2029 लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें पार्टी में राष्ट्रीय भूमिका दी जा सके।
पिछले तीन साल से कर्नाटक कांग्रेस में सिद्दरमैया और डीके शिवकुमार के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान चल रही थी। कई बार यह विवाद सरकार के लिए मुश्किल का कारण भी बना। अब पार्टी ने इस मुद्दे का समाधान निकाल लिया है।
सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड
80 वर्षीय सिद्दरमैया ने जनवरी 2026 में कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया था। उन्होंने डी देवराज उर्स का रिकॉर्ड तोड़ा। बताया जाता है कि डीके शिवकुमार खेमे की ओर से लगातार नेतृत्व परिवर्तन का दबाव था, लेकिन सिद्दरमैया लंबे समय तक पद पर बने रहे।
इससे कांग्रेस के भीतर उनकी मजबूत पकड़ साफ दिखाई दी। सिद्दरमैया की सबसे बड़ी ताकत 'अहिंदा' वोट बैंक माना जाता है। इसमें पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय शामिल हैं। कर्नाटक की राजनीति में यह बड़ा सामाजिक समूह माना जाता है।
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कल्याणकारी योजनाओं से बनाई पहचान
सिद्दरमैया पहली बार 2013 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने थे। उस दौरान उन्होंने कई जनकल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, जिससे उनकी पहचान 'जनता के नेता' के रूप में बनी। उनकी 'भाग्य' योजनाओं के तहत गरीब परिवारों को 10 किलो चावल, सस्ती दरों पर तेल, दाल, नमक और चीनी जैसी सुविधाएं दी गईं।
विपक्ष ने इन योजनाओं के खर्च को लेकर सवाल उठाए, लेकिन सिद्दरमैया को वित्तीय अनुशासन रखने वाला नेता भी माना गया। हालांकि उनके कार्यकाल में मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण यानी एमयूडीए जमीन घोटाले जैसे विवाद भी सामने आए। आरोप था कि उनकी पत्नी पार्वती को मैसूर के पॉश इलाके में 14 भूखंड आवंटित किए गए थे। बाद में सिद्धारमैया और उनकी पत्नी को इस मामले में क्लीन चिट मिल गई।
किसान परिवार से निकले नेता
सिद्दरमैया का जन्म अप्रैल 1948 में कर्नाटक के मैसूर क्षेत्र के एक किसान परिवार में हुआ था। वह कुरुबा समुदाय से आते हैं। बचपन में आर्थिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने विज्ञान और कानून की पढ़ाई की।
उनके पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर बनें, लेकिन सिद्धारमैया ने राजनीति और समाज सेवा का रास्ता चुना। 1960 और 1970 के दशक में समाजवादी विचारधारा से प्रभावित होकर वह राजनीति की ओर आए। राम मनोहर लोहिया और देवराज उर्स की राजनीति का उन पर गहरा असर पड़ा।
जनता दल से कांग्रेस तक का सफर
सिद्दरमैया ने 1978 में राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। 1983 में वह पहली बार विधायक बने। बाद में उन्होंने जनता दल जॉइन किया और तेजी से पार्टी में आगे बढ़े। 1988 में वह परिवहन मंत्री बने और 1994 में वित्त मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। बाद में वह उपमुख्यमंत्री भी बने।
लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि जनता दल में आगे बढ़ने की सीमाएं हैं क्योंकि एच डी देवगौड़ा अपने बेटे एच डी कुमारस्वामी को आगे बढ़ा रहे थे। इसके बाद सिद्दरमैया ने 2006 में कांग्रेस का दामन थाम लिया। उन्होंने अहिंदा वोट बैंक को मजबूत किया और राज्यभर में यात्राएं निकालकर अपनी राजनीतिक पकड़ बढ़ाई।
2013 की जीत से बदली राजनीति
2013 के विधानसभा चुनाव में सिद्दरमैया ने कांग्रेस को बड़ी जीत दिलाई और मुख्यमंत्री बने। इसके बाद वह कर्नाटक की राजनीति के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाने लगे। उनकी छवि ऐसे नेता की बनी जो गरीब, पिछड़े और आम लोगों की राजनीति करता है।
यही वजह रही कि लंबे समय तक कांग्रेस ने उन्हें कर्नाटक में अपना सबसे बड़ा चेहरा बनाए रखा। अब मुख्यमंत्री पद छोड़ने के साथ कर्नाटक की राजनीति में एक बड़ा अध्याय खत्म हुआ है, लेकिन कांग्रेस में उनकी भूमिका अभी भी अहम मानी जा रही है।