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    बंगाल में बढ़ रहा पलायन का दर्द, खाली हो रहे गांव; हर दिन 1000 से अधिक लोग छोड़ रहे अपना घर

    Updated: Fri, 27 Mar 2026 07:12 AM (IST)

    बंगाल के उत्तरी क्षेत्र के प्रमुख रेलवे स्टेशनों में शामिल मालदा टाउन स्टेशन पर हर दिन एक सन्नाटा और शोर साथ-साथ चलता है। सन्नाटा रोजगार के अवसरों का ...और पढ़ें

    बंगाल में बढ़ रहा पलायन का दर्द, खाली हो रहे गांव (फोटो- जागरण)

    बंगाल में बढ़ रहा पलायन का दर्द, खाली हो रहे गांव (फोटो- जागरण)

    HighLights

    1. रोजगार नहीं मिलने के कारण हो रहा पलायन

    2. अकेले मालदा से ही हर दिन 1000 से अधिक लोगों का पलायन

    विपिन राय, सिलीगुड़ी। बंगाल के उत्तरी क्षेत्र के प्रमुख रेलवे स्टेशनों में शामिल मालदा टाउन स्टेशन पर हर दिन एक सन्नाटा और शोर साथ-साथ चलता है। सन्नाटा रोजगार के अवसरों का और शोर उन युवाओं का, जो अपने सपनों को बोरे में बांधकर दिल्ली, पंजाब और महाराष्ट्र की ओर निकल पड़ते हैं।

    उत्तर बंगाल के आठ जिलों में रोजगार देने वाले गिने-चुने बड़े उद्योगों का भी नहीं होना सिर्फ आर्थिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि एक पूरे क्षेत्र के भविष्य का संकट है।

    एक अनुमान के मुताबिक अकेले मालदा जिले से रोजाना 1000 से अधिक मजदूर रोजगार की तलाश में दिल्ली, मध्य प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु या दक्षिण के अन्य राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं। पलायन की सबसे गंभीर समस्या मालदा में हैं।

    इसके अलावा उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण दिनाजपुर जिले में भी लगभग ऐसी ही स्थिति है। उद्योग जगत से जुड़े लोग बताते हैं कि इन जिलों की भौगोलिक बनावट भी बड़े कल-कारखाने लगने की राह में बाधा हैं।

    परिवहन व्यवस्था कमजोर होने से कच्चा माल और अन्य सामग्री लाने-ले जाने में दिक्कत होती है। कोयला जैसी जरूरी चीजें दूर से मंगवानी पड़ती हैं। इसमें काफी खर्च होता है। नतीजा बड़े उद्योग यहां टिक नहीं पाते। जहां तक छोटी इकाइयों की बात है तो अधिकांश ¨सडिकेट राज और कट मनी के चक्कर में शुरू ही नहीं हो पातीं।

    नेताओं की जेब भरे बिना नहीं मिलती जमीन

    छोटे उद्योग लगाने की बात करें तो सबसे बड़ी बाधा जमीन है। कोई उद्यमी यहां फैक्ट्री लगाना चाहे तो स्थानीय तृणमूल कांग्रेस नेताओं की जेब भरे बिना जमीन नहीं मिलती। जमीन मिल भी जाए तो निर्माण के हर कदम पर सिंडिकेट का उत्पात शुरू हो जाता है।

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    गिट्टी, बालू, ईंट, राजमिस्त्री और मजदूर,सब कुछ सिंडिकेट से ही लेना पड़ता है। बाजार दर से कहीं ज्यादा कीमत पर लेना मजबूरी है। उपर से कारखाना लग जाए तो वहां काम करने के लिए तृणमूल समर्थकों को ही रखना होगा।

    यह काम नहीं करें तो इनके खिलाफ कार्रवाई भी नहीं की जा सकती। किसी को काम से निकाला तो कारखाना बंद। थक-हार कर कई निवेशक अपनी योजनाएं छोड़ देते हैं। विपक्ष का कहना है कि यही सिंडिकेट राज उत्तर बंगाल के विकास को रोक रहा है।

    माफिया राज खत्म होगा: भाजपा सांसद

    दार्जिलिंग के भाजपा सांसद राजू बिष्ट ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में बंगाल का कभी भला नहीं होगा। भाजपा की डबल इंजन सरकार बनने के बाद माफिया राज खत्म होगा और कल कारखाने लगेंगे।

    इससे युवाओं का पलायन रुकेगा। इस बार विधानसभा चुनाव में बेरोजगारी और पलायन बड़ा मुद्दा बन चुका है। एक समय औद्योगिक रूप से मजबूत बंगाल के युवाओं को आज पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।