ममता की विदाई, वाम को नई उम्मीद: बंगाल की राजनीति में फिर से अपनी जमीन तलाश रहे वाम दल
दोपहर में भाजपा की जीत के संकेत से ही कोलकाता से लेकर जिलों तक माकपा के दफ्तरों में आज असामान्य हलचल देखने को मिली। जैसे-जैसे रुझान आने लगे, कार्यकर्त ...और पढ़ें

बंगाल की राजनीति में फिर से अपनी जमीन तलाश रहे वाम दल (फोटो- पीटीआई)
HighLights
बंगाल में वामपंथ के लिए खुल सकती है राजनीतिक जगह
विपक्ष की नई भूमिका में अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश करेंगे वाम दल
2011 में माकपा के 34 वर्षों के लंबे शासन को उखाड़ फेंक बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई थीं
इंद्रजीत सिंह, कोलकाता। 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना'। बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के साथ सोमवार को एक और तस्वीर उभरकर सामने आई, वो थी माकपा कार्यकर्ताओं के जश्न की। यह जश्न सीधे जीत का नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन के बदलते संकेतों का था।
पार्टी कार्यालयों में भीड़, नारेबाजी और उत्साह ने इस बात का संकेत दिया कि वाम खेमे के लिए यह सिर्फ सीटों का खेल नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक लड़ाई में वापसी का क्षण है।
दोपहर में भाजपा की जीत के संकेत से ही कोलकाता से लेकर जिलों तक माकपा के दफ्तरों में आज असामान्य हलचल देखने को मिली। जैसे-जैसे रुझान आने लगे, कार्यकर्ताओं का जमावड़ा बढ़ता गया।
दिलचस्प बात यह कि माकपा को सिर्फ एक सीट मिली है। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में छिपी हैं उत्साह की जड़ें : दरअसल, इस उत्साह की जड़ें मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में छिपी हैं।
पिछले एक दशक से बंगाल की राजनीति मुख्यत: तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सिमट गई थी। इस ध्रुवीकरण में वामपंथ लगभग हाशिये पर चला गया था। लेकिन इस बार के चुनावी नतीजे ने संकेत दिया है कि सत्ता की लड़ाई में भले ही माकपा सीधे मुकाबले में न हो, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की संभावित कमजोरी को वाम खेमे अपने लिए अवसर के रूप में देख रहा है।
माकपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि यह जश्न किसी की हार या जीत का नहीं है, बल्कि उस माहौल के टूटने का है जिसमें वाम राजनीति को खत्म मान लिया गया था। आज तस्वीर बदलती दिख रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि माकपा का यह उत्साह प्रतीकात्मक जरूर है, लेकिन इसके पीछे एक रणनीतिक सोच भी है। भाजपा की जीत और तृणमूल की हार, दोनों ही परिस्थितियां वामपंथ के लिए राजनीतिक जगह खोल सकती हैं।
सत्ता परिवर्तन के बाद विपक्ष की नई भूमिका में वाम दल अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश करेंगे। अंतत: बंगाल की राजनीति में यह दृश्य एक दिलचस्प मोड़ को दर्शाता है-जहां तीसरा खिलाड़ी भी अपनी वापसी की पटकथा लिखने की कोशिश में जुटा है।
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बता दें कि टीएमसी सुप्रीमो ममता 2011 में माकपा के 34 वर्षों के लंबे शासन को उखाड़ फेंक बंगाल की सत्ता पर काबिज हुई थीं। उसके बाद के कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर माकपा कार्यकर्ताओं पर अत्याचार के आरोप लगे थे।