पश्चिम बंगाल में कैसे खिला कमल? वो 10 कदम, जिनसे भाजपा ने ममता के गढ़ में लगाई सेंध
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ममता बनर्जी की टीएमसी को हराकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जिससे राज्य की राजनीतिक दिशा बदल गई है। ...और पढ़ें

बंगाल में भाजपा की जीत के 10 निर्णायक कारण

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। खेला होबे… पिछले पांच वर्षों से ममता बनर्जी अपने विरोधियों को अपने प्रतिद्वंद्वियों पर कटाक्ष करने के लिए इसी नारे अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती थीं, लेकिन 2026 के चुनावी नतीजों ने दिशा और दशा दोनों बदल दी है।
बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद पिछले 15 वर्षों से एकछत्र राज्य करने वाले ममता की टीएमसी का सर्यास्त हो चुका है और राज्य में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार का उदय हुआ है। पिछली बार 2021 विधानसभा चनव में महज 77 सीटों पर सिमट जाने वाली पार्टी ने 2026 में 206 सीट जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है।
बंगाल में बीजेपी की यह जीत सिर्फ चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीतिक यात्रा का वह तीसरा सबसे बड़ा मोड़ है, जिसकी शुरुआत 1977 के वामपंथी शासन और 2011 के ममता बनर्जी के उदय से हुई थी। आज हम आपको वो 10 फैक्टर बताने जा रहे हैं, जिसने 2026 विधानसभा चुनाव में बंगाल की दिशा और दशा को बदल दिया है।
वो 10 कदम, जिसने बदली बंगाल की राजनीति
'दीदी...ओ...दीदी'
पिछली बार 2021 विधानसभा चुनाव के दौरान एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ममता बनर्जी पर किया गया 'दीदी... ओ... दीदी!' वाला कटाक्ष मजeक के तौर पर किया गया था। जिस पर ममता बनर्जी ने कटाक्ष करते हुए महिलाओं का अपमान बताया था। बंगाल के चुनाव में महिला वोटरों की भूमिका निर्णायक होती है, ऐसे में इस दौरान टीएमसी ने 'दीदी... ओ... दीदी!' को प्रचार को महिलाओं का कलंक बताते हुए प्रचार किया। आलम यह हुआ कि बीजेपी जोरदार प्रचार के बावजूद भी सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाई।
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2026 में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। बीजेपी ने अपने चुनाव प्रचार में व्यक्तिगत टकरावों से हटकर पार्टी नेताओं द्वारा प्रणालीगत मुद्दों के रूप में वर्णित मुद्दों, शासन, भ्रष्टाचार, कार्य निष्पादन और कानून व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित किया। इससे भाजपा को अपने मुख्य मतदाओं के साथ-साथ महिलाओं और अन्य मतदाताओं को भी अपने पक्ष में करने में कामयाब हुई।
स्थानीय नेताओं पर फोकस
इस बार चुनाव प्रचार में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य में लंबा समय बिताया और यहां तक कहा कि वे चुनाव प्रचार की निगरानी के लिए जितने समय की आवश्यकता होगी, बंगाल में रहेंगे। पिछले चुनावों के विपरीत, इस बार राष्ट्रीय नेताओं के समर्थन से राज्य के प्रमुख चेहरों पर ध्यान केंद्रित किया गया।
खासकर सुवेंदु अधिकारी जो कभी ममता बनर्जी के खास हुआ करते थे, जमीनी स्तर पर पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार के रूप में उभरे। गृहमंत्री, प्रधानमंत्री के अलावा भाजपा शासित राज्यों के केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने सैकड़ों रैलियों और रोड शो के माध्यम से पूरे बंगाल में प्रचार किया और अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
'मछली' वाले नैरेटिव का खंडन
चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी ने सांस्कृतिक भय पैदा करने की कोशिश करते हुए वोटरों को चेतावनी दी कि अगर बीजेपी बंगाल में आएगी तो वे आपको मछली, मांस और अंडे खाने से रोक देगी, वे बंगाल को शाकाहारी राज्य बनाकर हमारे पहचान को मिटाना चाहते हैं।

भाजपा ने तुरंत इसका जवाब देने के लिए दिखावटी रणनीति अपनाई। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर समेत कई नेता चुनाव प्रचार के दौरान सार्वजनिक रूप से मछली खाते नजर आए, जिससे यह आरोप चर्चा का विषय बन गया। भाजपा नेताओं ने कहा, "दीदी कहती हैं कि हम मछली पर प्रतिबंध लगा देंगे? मैं अभी खा रहा हूं!"
टीएमसी के वोट चोरी के आरोप का खंडन
जब चुनाव आयोग ने बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में संशोधन के चलते लगभग 90 लाख नाम हटा दिए गए, तो ममता बनर्जी और अन्य टीएमसी नेताओं ने तीखा हमला करते हुए इसे लोकतंत्र की हत्या और चुपके से लागू किया गया एनआरसी करार दिया।
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हालांकि, भाजपा अपने रुख पर अड़ी रही। सुवेंदु अधिकारी और अमित शाह जैसे नेताओं ने इस प्रक्रिया को फर्जी मतदाताओं की सफाई और धांधली वाली व्यवस्था में एक आवश्यक सुधार के रूप में पेश किया। सुवेंदु ने टीएमसी की प्रतिक्रिया का मजाक उड़ाते हुए कहा, "पिशिमा इसलिए रो रही हैं क्योंकि उनकी फर्जी मतदाता फैक्ट्री को सील कर दिया गया है।"
घुसपैठ का मुद्दा
चुनाव प्रचार के दौरान बंगाल में घुसपैठ का मुद्दा गरमाता रहा। भाजपा ने सीमावर्ती जिलों में अवैध प्रवासन के खतरे को बार-बार उजागर किया। उन्होंने सफलतापूर्वक टीएमसी को वोट बैंक की राजनीति में शामिल घुसपैठियों का संरक्षक बताया।
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अपनी 15 दिवसीय प्रवास के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने वादा किया, "भाजपा के सत्ता में आने के बाद, एक पक्षी भी अवैध रूप से सीमा पार नहीं कर पाएगा। हम एक ऐसा सुरक्षा तंत्र बनाएंगे जो बंगाल को नागरिकों के लिए किला बना देगा, न कि घुसपैठियों का अड्डा।"
भ्रष्टाचार और शासन
चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने टीएमसी के 15 वर्षों के शासन के खिलाफ एक व्यापक आरोपपत्र जारी किया, जिसमें शिक्षक भर्ती घोटाले पर विशेष ध्यान दिया गया, जहां अदालत के आदेश पर 25,000 नियुक्तियों को रद्द करना व्यवस्थागत भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गया।
चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी माफिया शासन और पारदर्शी प्रशासन के बीच चुनाव के रूप में प्रस्तुत करके, मध्यवर्गीय वर्ग और युवाओं को यह समझाने में सफल रही कि राज्य की आर्थिक गिरावट टीएमसी के शासन मॉडल का सीधा परिणाम है।
नियम और कानून
भाजपा लगातार कानून व्यवस्था के मुद्दे को उठाती रही। बीजेपी ने चुनाव को भय (डर) और निरापात (सुरक्षा) के बीच चुनाव के रूप में पेश किया। आरजी कर मामले जैसी घटनाओं का बार-बार हवाला देकर राज्य द्वारा अपराध और जवाबदेही से निपटने के तरीके पर सवाल उठाए गए।
महिला मतदाता
बंगाल में ममता बनर्जी की लक्ष्मी भंडार योजना को एक अभेद्य राजनीतिक कवच माना जाता था, जिसके तहत 24 करोड़ से अधिक महिलाओं को 1,000 रुपये से 1,200 रुपये तक की सहायता राशि प्रदान की जाती थी। लेकिन बीजेपी ने न केवल इस योजना को चुनौती दी, बल्कि प्रभावी रूप से दांव को दोगुना कर दिया। भाजपा ने मातृ शक्ति वंदन योजना बंगाल में प्रत्येक महिला को प्रति माह 3,000 रुपये देने का वादा किया।
भाजपा को बाहरी कहने की कोशिश
टीएमसी ने भाजपा बोहिरागोटो (बाहरी) के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन भाजपा ने स्पष्ट रूप से स्थानीयकरण पर जोर देकर जवाब दिया है। बीजेपी ने केंद्रीय नेताओं पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय, पार्टी ने सुवेंदु अधिकारी जैसे बंगाली चेहरों को प्रमुखता दी। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने रैलियों बंगाली भाषा, संस्कृति और स्थानीय मुद्दे पर बात कर टीएमसी के बाहरी कहने वाले आरोपों को दरकिनार कर दिया।
2021 की हार के बाद ली सबक
बंगाल में 2021 की हार से भाजपा को जो सबसे बड़ा सबक मिला, वह यह था कि विभाजित घर नहीं टिक सकता। क्योंकि- 2026 में बीजेपी ने अपने आंतरिक पुराने नेता बनाम नए नेत" के मतभेद को सुलझाते हुए एक मजबूत संयुक्त मोर्चा बनाया। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष को उनके पुराने गढ़ खड़गपुर सदर से मैदान में उतारकर भाजपा ने यह संकेत दिया कि जमीनी स्तर के कार्यकर्ता फिर से कमान संभाल रहे हैं।
दिलीप घोष को मुख्य नेतृत्व में वापस लाकर, भाजपा ने यह सुनिश्चित किया कि टीएमसी के दलबदलुओं के आने से मूल कार्यकर्ता अलग-थलग महसूस न करें।
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