श्री हरिमंदिर साहिब में माथा टेकते ही आशा भोसले की आंखों में आ गए थे आंसू, बोली थीं- अब जीवन में कुछ नहीं...
दिसंबर 2011 में 80 वर्षीय आशा भोसले ने श्री हरिमंदिर साहिब, अमृतसर का आध्यात्मिक दौरा किया। घुटनों के ऑपरेशन के बावजूद, उन्होंने गुरु घर में श्रद्धा स ...और पढ़ें

जब गुरु घर में नतमस्तक हुई थीं आशा भोसले। फोटो जागरण
नितिन धीमान, अमृतसर। दिसंबर 2011 की वह सुबह कुछ अलग ही थी। हवा में आध्यात्मिकता की सुगंध थी और वातावरण में एक अनकही शांति। प्रसिद्ध गायिका आशा भोसले अपनी उम्र और शारीरिक पीड़ा को पीछे छोड़ते हुए गहरी आध्यात्मिक पुकार के साथ श्री हरिमंदिर साहिब पहुंचीं।
वह किसी प्रसिद्धि को पीछे छोड़कर एक साधारण श्रद्धालु की तरह आई थीं। सिर पर दुपट्टा, चेहरे पर सादगी और आंखों में श्रद्धा भाव लेकर यहां पहुंचीं। वर्षों से उनके मन में एक इच्छा थी कि वह गुरु घर के दर्शन करें और उस दिन उन्हें ऐसा लगा मानो स्वयं वाहेगुरु ने उन्हें बुलाया हो।
आशा भोसले उस समय 80 साल की थीं। 1977 में उनके घुटनों का ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टरों ने उन्हें सावधानी बरतने की सलाह दी थी। झुकने और घुटने टेकने से मना किया था, लेकिन जब वह पवित्र सरोवर के पास पहुंचीं और गुरुबाणी की ध्वनि उनके कानों में गूंजी तो जैसे उनके भीतर कुछ बदल गया।
धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए वह श्री हरिमंदिर साहिब के सम्मुख पहुंचीं। उस क्षण उनके चेहरे पर भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। और फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसकी उन्होंने खुद भी कल्पना नहीं की थी।
'मुझे नहीं पता, यह कैसे हुआ...'
उन्होंने अपने घुटने टेक दिए। यह शारीरिक क्रिया नहीं थी, बल्कि गुरु घर के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक था। उन्होंने कहा कि मेरे घुटनों का ऑपरेशन हुआ है, फिर भी आज मैं झुक गई। नतमस्तक होते हुए मेरी आंखों से आंसू छलक उठे। मुझे नहीं पता यह कैसे हुआ। कोई शक्ति थी जिसने मुझे ऐसा करने का बल दिया। उस क्षण में दर्द, उम्र और सीमाएं सब कुछ जैसे गायब हो गया था। केवल भक्ति थी, केवल विश्वास था।
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जब बोली थीं- जीवन में और कुछ नहीं चाहिए
उन्होंने माथा टेका, प्रसाद ग्रहण किया और कुछ देर वहीं बैठकर शांति को महसूस करती रहीं। उनके चेहरे पर एक संतोष था। मानो जीवन की कोई बड़ी इच्छा पूरी हो गई हो। आशा भोसले ने तब कहा था कि अब मुझे लगता है कि जीवन में और कुछ नहीं चाहिए। दिल करता है कि मैं बार-बार यहां आऊं। यहां के लोगों का प्यार ही मुझे जीवित रखता है।
जलियांवाला बाग पहुंचते ही मन हो गया भारी
उनकी यह यात्रा केवल हरिमंदिर साहिब तक सीमित नहीं रही। वह आगे बढ़ीं और जलियांवाला बाग भी गईं। वहां पहुंचकर उनका मन भारी हो गया। उन्होंने कहा कि इतिहास की यह दर्दनाक घटना मानो इस स्थल की हवा में महसूस होती है। उन्होंने शहीदों की स्मृति में सिर झुकाया और पवित्र ज्योति के सामने कुछ क्षण मौन खड़ी रहीं।