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    पंजाब के तरनतारन में SIR ने मिलाए 48 साल से बिछड़े तीन भाई, छलके खुशी के आंसू

    Updated: Fri, 17 Jul 2026 07:00 AM (IST)

    48 साल पहले बिछड़े तीन भाई एसआईआर प्रक्रिया की मदद से तरनतारन के एक स्कूल में भावुक क्षणों के साथ मिले। ...और पढ़ें

    SIR ने मिलाए 48 साल से बिछड़े तीन भाई। फोटो जागरण

    SIR ने मिलाए 48 साल से बिछड़े तीन भाई। फोटो जागरण

    HighLights

    1. 48 साल बाद एसआईआर ने मिलाए तीन बिछड़े भाई।

    2. रोजगार की तलाश में छोटा भाई 1978 में घर से निकला था।

    3. पूर्व सैनिक भाइयों ने मृत मान लिया था, अब खुशी से मिले।

    धर्मबीर सिंह मल्हार, तरनतारन। 48 साल पहले रोजगार की तलाश में घर से निकला छोटा भाई वक्त की धूल में ऐसा खो गया कि बड़े भाइयों ने उसे और मां को हमेशा के लिए खो चुका मान लिया। वीरवार को एसआइआर के दौरान पूर्वजों के रिकार्ड की तलाश ने किस्मत का ऐसा पन्ना पलटा कि गांव के स्कूल में तीनों भाई आमने-सामने खड़े थे। बरसों का बिछोह खुशी के आंसुओं में बह गया और हर आंख नम हो उठी।

    दरअसल दो पूर्व सैनिक भाई बलविंदर सिंह व रजिंदर सिंह सेना में चले गए थे। जबकि काम की तलाश में छोटा भाई विजय वर्ष 1978 में गांव से ऐसे निकला कि दोबारा घर नहीं पहुंचा।

    हरियाणा के जिला पंचकूला के तहत आते गांव मड़ावाले में परिवार समेत रहते विजय को एसआइआर में अपने पूर्वजों के रिकार्ड की जरूरत आन पड़ी। रिकार्ड की तलाश में विजय जब गांव पहुंचा तो बीएलओ ने रिकार्ड खंगालकर बताया कि उसके दोनों भाई जीवित हैं व गांव में परिवार समेत रहते हैं। फिर क्या था, बीएलओ ने दोनों भाइयों को गांव के स्कूल में बुलाया तो खुशी के मारे आंखों से आंसुओं का सैलाब बहने लगा।

    विजय सिंह की आयु 16 वर्ष थी

    गांव चौताला से संबंधित भाग सिंह सेना से सेवानिवृत्त थे। बाद में उनके दो बेटे बलविंदर सिंह व रजिंदर सिंह सेना में भर्ती हो गए। सबसे छोटा विजय सिंह (अब विजय कुमार) काम की तलाश में वर्ष 1978 में गांव से निकला और हरियाणा के जिला पंचकूला (तहसील कालका) के तहत आते गांव मड़ावाले में जा पहुंचा।

    उस समय विजय सिंह की आयु 16 वर्ष थी। उधर, सेना में तैनात बलविंदर सिंह व रजिंदर सिंह जब भी छुट्टी आते तो अपने खोए हुए भाई को ढूंढ़ने के लिए निकलते, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा।

    वक्त बढ़ता गया व बिछोड़े का दर्द अपने परिवारों के बढ़ने से सिमटने लगा। सेना से सेवानिवृत्त होकर लौटे बलविंदर सिंह व रजिंदर सिंह अब तीसरी पीढ़ी के पालन-पोषण में लगे हैं।

    गांव से कामकाज की तलाश में निकले विजय सिंह जब नहीं मिले तो दोनों भाइयों ने समझा कि अब शायद वह इस संसार में नहीं है। यह बताना जरूरी है कि दोनों भाइयों को जब नौकरी मिली तो पिता भाग सिंह उस समय सेना में थे। गांव से निकलते समय विजय सिंह मां तेज कौर को साथ ले गए थे।

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    भाइयों ने किया अंतिम संस्कार

    जिनकी बाद में गांव मड़ावाले में मृत्यु हुई। जबकि सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद भाग सिंह का निधन हुआ तो दोनों भाइयों ने अंतिम संस्कार से लेकर सभी जिम्मेदारियां निभाईं। पिता की मौत के दौरान विजय सिंह व मां तेज कौर का काफी इंतजार किया गया। न आने पर दोनों भाइयों को यकीन हो गया कि अब यह (विजय सिंह व तेज कौर) संसार में नहीं होंगे।

    पूर्व सैनिक भाइयों को वीरवार को बीएलओ दविंदर सिंह खैहरा (बूथ नंबर 47), रजीव कुमार मन्नण, बीएलओ (बूथ नंबर 46) के पास बुजुर्ग अवस्था में पहुंचे शख्स ने अपना नाम विजय कुमार बताते अपने पूर्वजों का रिकार्ड मांगा तो जवाब मिला कि आपके पिता भाग सिंह की मृत्यु हो चुकी है।

    आपके दो बड़े भाई बलविंदर सिंह व रजिंदर सिंह गांव में परिवार समेत रहते हैं। फिर क्या था, एसआइआर की प्रक्रिया ने 48 वर्ष पूर्व बिछड़े भाइयों को जब स्कूल के आंगन में मिला दिया।

    संबंधित स्टाफ की आंखें भी नम

    विजय कुमार के नाम से अपनी पहचान बताते हुए विजय सिंह ने बताया कि मैं भी अपने गांव में बेटों व पोतों के साथ रहता हूं। वहां पर मैं लेंटर डालने के लिए जाल बांधने का काम करता हूं। खुले आसमान के नीचे बिछड़े हुए भाई जब मिले तो इन तीनों की आंखें तो नम थीं, एसआइआर से संबंधित स्टाफ की आंखें भी नम थीं। विजय का गले में हार डालकर स्वागत किया गया।

    दोबारा परिवार समेत आने का वादा करके वह लौट गए। पूर्व सरपंच मेहर सिंह के अलावा स्कूल शिक्षक सरबजीत कौर, सुखराज कौर ने कहा कि तीनों भाइयों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आभार जताते हुए कहा कि एसआइआर ने हमारे देश में एक नई मिसाल कायम की है।