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    आरओ से अलग नई सोच, बच्चों ने बनाया ऐसा वॉटर प्यूरीफायर जो गांवों की बदल सकता है तस्वीर

    Updated: Mon, 11 May 2026 12:44 PM (GMT+05:30)

    अमृतसर के विद्यार्थियों ने ध्वनि तरंगों और पराबैंगनी तकनीक आधारित नया जल शोधक तैयार किया है। यह बिना पानी बर्बाद किए स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करवाएगा और ग् ...और पढ़ें

    डीएवी इंटरनेशनल स्कूल अमृतसर के स्टूडेंट्स अपने यंत्र के साथ।

    डीएवी इंटरनेशनल स्कूल अमृतसर के स्टूडेंट्स अपने यंत्र के साथ।

    HighLights

    1. डीएवी अमृतसर छात्रों ने 'सोनिक प्योर' जल शोधक बनाया।

    2. यह मेंब्रेन-रहित, शून्य अपशिष्ट तकनीक पर आधारित है।

    3. ग्रामीण व गरीब परिवारों के लिए सस्ता, स्वच्छ पानी।

    अखिलेश सिंह यादव, अमृतसर। देश को आजाद हुए करीब 80 वर्ष होने जा रहे हैं, लेकिन आज भी बड़ी संख्या में लोग स्वच्छ पेयजल से वंचित हैं। खासकर गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए साफ पानी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसी समस्या समाधान अमृतसर के डीएवी इंटरनेशनल स्कूल के विद्यार्थियों ने निकाला है।

    स्कूल के स्टूडेंट्स ने एक अनोखा और सस्ता जल शोधक तैयार किया है, जो भविष्य में गरीब और ग्रामीण परिवारों के लिए बड़ी राहत बन सकता है। दसवीं कक्षा के विद्यार्थी मानस चौधरी, सान्वी और हसित ने अपनी वैज्ञानिक सोच और नवाचार क्षमता का परिचय देते हुए “सोनिक प्योर” नामक जल शोधक प्रणाली विकसित की है।

    यह तकनीक पारंपरिक जल शोधक प्रणालियों से पूरी तरह अलग बताई जा रही है। विद्यार्थियों का दावा है कि यह प्रणाली बिना अधिक पानी बर्बाद किए स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध करवाने में सक्षम होगी।

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    AI जनरेटेड इमेज से जानें कैसे होता है पानी साफ- 

    DAV

    बिना मेंबरेन होता है पानी साफ

    विद्यार्थियों ने बताया कि उनकी प्रणाली मेंबरेन रहित और शून्य अपशिष्ट तकनीक पर आधारित है। इसे विशेष रूप से ग्रामीण भारत और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। जहां पारंपरिक आरओ प्रणाली में बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है और महंगे फिल्टर लगाने पड़ते हैं, वहीं इस नई तकनीक में ध्वनि तरंगों का उपयोग किया गया है।

    प्रक्रिया के पहले चरण में अल्ट्रासोनिक ध्वनि तरंगों के माध्यम से पानी में कंपन पैदा किया जाता है। इससे पानी में मौजूद मिट्टी, कीचड़ और सूक्ष्म प्लास्टिक कण एक जगह इकट्ठा होकर अलग हो जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में किसी झिल्ली का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों के आधार पर अशुद्धियों को अलग किया जाता है।

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    दूसरे चरण में पराबैंगनी किरणों का इस्तेमाल 

    दूसरे चरण में पराबैंगनी किरण आधारित कीटाणुशोधन प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। इसके जरिए पानी में मौजूद लगभग सभी बैक्टीरिया और वायरस नष्ट हो जाते हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि यह तकनीक पानी की बर्बादी को लगभग समाप्त कर देती है और कम खर्च में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध करवाने का विकल्प बन सकती है।

    मानस चौधरी ने बताया कि यदि यह परियोजना भविष्य में बड़े स्तर पर तैयार होकर बाजार तक पहुंचती है तो गरीब परिवारों के लिए बेहद सस्ता और उपयोगी समाधान साबित होगी। लोगों को स्वच्छ पानी के लिए अधिक खर्च नहीं करना पड़ेगा।

    भविष्य का सोच तैयार की गई तकनीक

    विद्यालय की प्रिंसिपल डॉ. अंजना गुप्ता ने विद्यार्थियों की इस उपलब्धि की सराहना करते हुए कहा कि यह परियोजना उनकी वैज्ञानिक सोच, दूरदर्शिता और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि जल संरक्षण और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में भविष्य की संभावित बड़ी पहल है, जो आने वाले समय में समाज के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।

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