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    राजा हो या नेता, अकाल तख्त का आदेश सबके लिए सर्वोच्च; जानिए पंजाब की राजनीति में क्यों खास है इसका स्थान

    Updated: Mon, 29 Jun 2026 03:02 PM (IST)

    बेअदबी कानून पर 78 सिख विधायक व 9 मंत्रियों को तलब करने के बाद अकाल तख्त फिर चर्चा में है। जानिए इसकी स्थापना, अधिकार, धार्मिक प्रभाव, ऐतिहासिक भूमिका ...और पढ़ें

    श्री अकाल तख्त साहिब।

    श्री अकाल तख्त साहिब।

    HighLights

    1. अकाल तख्त सिख धर्म का सर्वोच्च धार्मिक संस्थान है।

    2. इसके आदेशों की धार्मिक और नैतिक मान्यता अत्यंत गहरी है।

    3. नेताओं को तलब कर धार्मिक प्रायश्चित करने को कहा जाता है।

    नितिन धीमान, अमृतसर। पंजाब में बेअदबी कानून को लेकर शुरू हुए विवाद के बीच श्री अकाल तख्त साहिब एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। श्री अकाल तख्त साहिब के सामने आज, सोमवार पंजाब के 78 सिख विधायकों और 9 सिख मंत्रियों को तलब हुए। उन्हें आदेश दिया गया कि अगले एक महीने में जागत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम-2026 में जरूरी संशोधन किए जाएं।

    इससे पहले मुख्यमंत्री भगवंत मान को भी एक विवादित वीडियो के मामले में इनके समक्ष पेश होना पड़ा था। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर श्री अकाल तख्त साहिब क्या है, इसकी धार्मिक और सामाजिक शक्ति कितनी है और इसके आदेशों को नेता इतने गंभीरता से क्यों लेते हैं।

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    क्या है श्री अकाल तख्त साहिब?

    श्री अकाल तख्त साहिब सिख धर्म का सर्वोच्च सांसारिक धार्मिक संस्थान माना जाता है। 'अकाल तख्त' का अर्थ है 'अकाल पुरुष का सिंहासन'। यह श्री हरिमंदिर साहिब के ठीक सामने स्थित है। इसकी स्थापना सिखों के छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब ने वर्ष 1606 से 1609 के बीच करवाई थी।

    उस समय इसका उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सिख समाज की सामाजिक, न्यायिक और राजनीतिक गरिमा को भी स्थापित करना था। इसे तत्कालीन मुगल शासकों के सिंहासन से ऊंचा बनाकर यह संदेश दिया गया था कि अन्याय के सामने सिख समाज स्वतंत्र और आत्मसम्मान के साथ खड़ा रहेगा।

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    क्यों है तख्त इतनी बड़ी धार्मिक ताकत?

    श्री अकाल तख्त साहिब के प्रमुख को जत्थेदार कहा जाता है। सिख समुदाय में उन्हें सर्वोच्च धार्मिक-सांसारिक प्राधिकारी माना जाता है। जत्थेदार किसी भी सिख व्यक्ति को, चाहे वह मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, अधिकारी या कोई बड़ा धार्मिक नेता ही क्यों न हो, स्पष्टीकरण के लिए तलब कर सकते हैं।

    हालांकि श्री अकाल तख्त साहिब के पास किसी अदालत या पुलिस जैसी कानूनी शक्ति नहीं होती, लेकिन इसके आदेशों की धार्मिक और नैतिक मान्यता अत्यंत गहरी है। यही कारण है कि अधिकांश नेता इसके आदेशों का पालन करना उचित समझते हैं।

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    इतिहास में रही निर्णायक भूमिका

    ब्रिटिश शासन से पहले और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान श्री अकाल तख्त साहिब सिख समाज के बड़े राजनीतिक और सामाजिक निर्णयों का प्रमुख केंद्र रहा। अठारहवीं शताब्दी में यहीं सरबत खालसा की बैठकों का आयोजन होता था, जिनमें सिख समुदाय से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लिए जाते थे और बाहरी आक्रमणों का मुकाबला करने की रणनीति बनाई जाती थी।

    इतिहास में महाराजा रणजीत सिंह का उदाहरण सबसे चर्चित माना जाता है। उन्हें भी एक मामले में श्री अकाल तख्त साहिब के समक्ष पेश होना पड़ा था और उन्होंने सार्वजनिक रूप से धार्मिक दंड स्वीकार किया था। यह घटना आज भी श्री अकाल तख्त साहिब की सर्वोच्च धार्मिक प्रतिष्ठा का उदाहरण मानी जाती है।

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    स्वतंत्रता के बाद भी बना रहा प्रभाव

    स्वतंत्रता के बाद भी पंजाब की राजनीति पर श्री अकाल तख्त साहिब का प्रभाव लगातार बना रहा। पंजाबी सूबा आंदोलन के दौरान इसके कई निर्णयों का व्यापक असर देखने को मिला। वर्ष 1975 में आपातकाल के दौरान शिरोमणि अकाली दल का लोकतंत्र बचाओ आंदोलन भी इसी परिसर से शुरू हुआ था।

    उग्रवाद के दौर में भी श्री अकाल तख्त साहिब राजनीतिक और धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना रहा। समय-समय पर कई प्रमुख नेताओं को यहां तलब किया गया। इनमें पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला और पूर्व केंद्रीय मंत्री बूटा सिंह जैसे नाम शामिल हैं। इन नेताओं ने बाद में श्री अकाल तख्त साहिब के समक्ष उपस्थित होकर धार्मिक प्रायश्चित किया।

    वर्ष 2024 में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल को श्री अकाल तख्त साहिब ने 'तनखैया' घोषित किया था। उन पर बेअदबी मामलों और डेरा सच्चा सौदा से जुड़े फैसलों को लेकर धार्मिक जिम्मेदारी तय की गई थी। उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगने और सेवा करने का निर्देश दिया गया। साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को दिया गया 'पंथ रत्न फख्र-ए-कौम' सम्मान भी वापस लेने का फैसला किया गया।

    कैसी होती है धार्मिक सजा?

    श्री अकाल तख्त साहिब किसी को जेल भेजने या आर्थिक दंड देने का अधिकार नहीं रखता। यदि किसी व्यक्ति को धार्मिक रूप से दोषी माना जाता है तो उसे 'टंखैया' घोषित किया जाता है। इसके बाद उसे धार्मिक प्रायश्चित के रूप में सेवा करने के निर्देश दिए जाते हैं।

    इस सेवा में श्री हरिमंदिर साहिब परिसर में जूते साफ करना, बर्तन धोना, शौचालय की सफाई करना, संगत से सार्वजनिक रूप से माफी मांगना या गले में तख्ती पहनकर सेवा करना शामिल हो सकता है। गंभीर मामलों में धार्मिक और सामाजिक बहिष्कार का भी निर्णय लिया जा सकता है।

    समन की अनदेखी क्यों पड़ती है भारी?

    श्री अकाल तख्त साहिब के समन की अनदेखी करना केवल प्रशासनिक आदेश की अवहेलना नहीं, बल्कि धार्मिक अधिकार को चुनौती देना माना जाता है। इतिहास में पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला ने जब श्री अकाल तख्त साहिब के निर्देशों का पालन नहीं किया था तो उन्हें 'टंखैया' घोषित कर धार्मिक रूप से बहिष्कृत किया गया। बाद में उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी।

    इसी कारण पंजाब की राजनीति में चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, अधिकांश नेता श्री अकाल तख्त साहिब के समन को गंभीरता से लेते हैं। उनका मानना होता है कि धार्मिक संस्थान के समक्ष उपस्थित होकर अपना पक्ष रखना राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से अधिक उचित है, क्योंकि इसकी अनदेखी का असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सिख समाज में उनकी स्वीकार्यता पर भी पड़ सकता है।

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