जब जूनियर की मदद के लिए चलती बस से शेरशाह ने लगाई थी छलांग...पढ़ें कारगिल के शेर के बहादुरी के किस्से
कैप्टन विक्रम बत्रा बचपन से ही साहसी थे, जिन्होंने चलती बस से कूदकर जूनियर की जान बचाई और घर से सांप को निडरता से बाहर निकाला। उनके पिता गिरधारी लाल ब ...और पढ़ें

कैप्टन विक्रम बत्रा की पुरानी तस्वीरें।
HighLights
बचपन से निडर-साहसी थी कैप्टन विक्रम बत्रा।
घर में घुसे सांप को निडरता से बाहर निकाला।
पिता ने साझा किए बेटे के बहादुरी के किस्से।
मोहित पांडेय/उपेंद्र सेन गुप्ता, चंडीगढ़। कारगिल के शेर कैप्टन विक्रम बत्रा के लिए बहादुरी कोई अचानक आई खूबी नहीं थी, बल्कि बचपन से ही उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थी। कभी चलती बस से गिरी अपनी जूनियर को बचाने के लिए उन्होंने जान की परवाह किए बिना छलांग लगा दी थी, तो कभी घर में घुसे सांप को देखकर भी उनके कदम पीछे नहीं हटे। उन्होंने डंडे से सांप को उठाकर घर से बाहर फेंक दिया था।
कारगिल विजय दिवस के अवसर पर दैनिक जागरण से विशेष बातचीत में कैप्टन विक्रम बत्रा के पिता गिरधारी लाल (जीएल) बत्रा ने बेटे के बचपन से लेकर उनके सर्वोच्च बलिदान तक की कई यादें साझा कीं। चाल, नजर और लड़ने का अंदाज एक शेर जैसा होने की वजह से कैप्टन विक्रम बत्रा का सेना के मिशन के दौरान कोड नेम 'शेरशाह' रखा गया था।
गिरधारी लाल बताते हैं कि विक्रम बचपन से ही साहसी, खुशमिजाज और देशभक्ति की भावना से भरे हुए थे। देश के लिए बेटे का सर्वोच्च बलिदान किसी भी माता-पिता के लिए सबसे बड़ा त्याग है।
बत्रा के पिता ने आगे का एक किस्सा साझा करते हुए बताया कि विक्की जब दसवीं कक्षा में थे। एक दिन वह बस से घर लौट रहे थे। बस में अधिक भीड़ होने के कारण उनकी जूनियर खुले गेट से नीचे गिर गई। उसे बचाने के लिए विक्रम ने चलती बस से छलांग लगा दी। इसके बाद उसे पालमपुर के निजी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती करवाया।
वहीं, जब वह अपनी ट्रेनिंग पूरी करके घर लौटे तो उनके घर में सांप निकल आया था, जिसे उन्होंने निडर होकर डंडे से उठाकर बाहर फेंक दिया था। बातचीत के दौरान गिरधारी लाल बत्रा ने कहा कि बेटे का देश के लिए सर्वोच्च बलिदान इससे बड़ा त्याग कोई नहीं है। आज भी वह पल याद आता है, जब उनका शव पालमपुर पहुंचा था।
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विक्रम के शव की पहचान करने के लिए पालमपुर आर्मी अस्पताल बुलाया गया तो विक्रम से 15 मिनट छोटे जुड़वा भाई विशाल बत्रा और उनके जीजा शव की पहचान के लिए गए थे। विशाल अपने बड़े भाई को पहचान नहीं पा रहे थे, क्योंकि जिस शव को उन्हें दिखाया गया था, उसके चेहरे पर दाढ़ी थी। विक्रम शुरू से ही क्लीन शेव रहते थे।
युद्ध के दौरान विक्रम बत्रा ने करीब दो महीने तक दाढ़ी नहीं बनाई थी। इसकी वजह से विशाल उन्हें पहचान नहीं पा रहे थे। अंततः जीवन को बहुत ध्यान से देखने के बाद विशाल ने विक्रम के पार्थिव शरीर की पहचान की। पिता ने कहा कि मैं भी आर्मी में अफसर बनना चाहता था। स्वास्थ्य कारणों से मेरा सिलेक्शन नहीं हो पाया था। पर विक्रम ने आर्मी अफसर बनकर मेरा सपना पूरा कर दिया।
बत्रा का सक्सेस सिग्नेचर.... 'ये दिल मांगे मोर'

बत्रा के पिता ने कहा कि विक्की के अंदर किसी भी बात का डर नहीं था। उनका केवल एक ही लक्ष्य था कि हर हालत में जीत हासिल करनी है और दुश्मनों से धरती माता को छुड़ाना है। 5140 की चोटी रणनीतिक रूप से बहुत महत्व रखती थी। ऐसे में उसे जीतना बहुत जरूरी था।
उस चोटी को उन्होंने फतह किया और जज्बा देखिए कि दुश्मन के सात सैनिकों को ढेर करने के बाद उन्होंने बंकर भी नष्ट किया। एक एंटी एयरक्राफ्ट गन को भी कब्जे में लिया। इतना कुछ करने के बाद भी उनका कहना था कि 'ये दिल मांगे मोर'।
उनके कमांडर ने उनसे पूछा कि अरे विक्की, यह स्लोगन तुम क्यों रख रहे हो, तो उन्होंने कहा कि मैं दुश्मनों को पूरी तरह से खदेड़ना चाहता हूं। अभी हमको और लड़ना है।
तीन से चार हजार लोग मिलने आते थे
पंजाब के एनसीसी निदेशालय के एयर विंग में कैप्टन विक्रम बत्रा दो बार बेस्ट कैडेट रहे। इसके साथ दिल्ली के लाल किले में गणतंत्र दिवस पर होने वाली परेड में भी चंडीगढ़ से 1994 में सिलेक्ट हुए।
इसके साथ ही विक्रम पर फिल्म बनने के बाद करीब तीन से चार हजार लोग उनके बारे में जानने के लिए उनके पालमपुर स्थित घर पर दिन-रात आते हैं। गिरधारी लाल बत्रा लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए विस्तार से कैप्टन विक्रम के बारे में बताते हैं।