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    नगर निगम चुनाव से पहले चंडीगढ़ में बिखर रही आप, छह पार्षद बदल चुके दल; नेतृत्व पर उठे सवाल

    Updated: Tue, 28 Jul 2026 11:52 AM (IST)

    चंडीगढ़ में नगर निगम चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी (आप) बिखर रही है, जिसमें 2021 से अब तक छह पार्षद दल बदल चुके हैं। पार्षदों के दल बदलने से पार्टी के ...और पढ़ें

    2021 से अब तक आप के छह पार्षद अलविदा कह दूसरे दलों में शामिल हो चुके।

    2021 से अब तक आप के छह पार्षद अलविदा कह दूसरे दलों में शामिल हो चुके।

    HighLights

    1. आप के छह पार्षद 2021 से अब तक दल बदल चुके हैं।

    2. निगम चुनाव से पहले आप में नेतृत्व पर उठे सवाल।

    3. कमजोर संगठन और नेतृत्व दल बदलने का मुख्य कारण बताया।

    जागरण संवाददाता, चंडीगढ़। इसी साल नगर निगम के चुनाव होने हैं, लेकिन उससे पहले ही आम आदमी पार्टी (आप) में बिखरने लगी है। इससे नेतृत्व पर सवाल उठने लगे हैं।

    वर्ष 2021 के नगर निगम चुनाव में चमत्कारी अंदाज में सबसे अधिक 14 पार्षद सीट जीतने वाली आप के पास अब केवल आठ ही पार्षद बचे हैं। यानी 2021 से अब तक आप के छह पार्षद अलविदा कह दूसरे दलों में शामिल हो चुके हैं।

    कभी सदन में सबसे बड़ी संख्या वाले दल के अगले कुछ दिनों में दो और पार्षद अलविदा कहने की तैयारी में हैं। कांग्रेस नेता ने बताया एक और पार्षद कुछ दिन में ज्वाॅइन करेंगे।

    आप के चंडीगढ़ नेता बिखरते संगठन को संभाल नहीं पा रहे हैं। उनके हाथ से लगातार पार्षद फिसलते जा रहा हैं। पार्टी छोड़ रहे पार्षदों ने इसका मुख्य कारण कमजोर संगठन बताया। नवंबर दिसंबर में नगर निगम चुनाव होने हैं।

    इससे पहले कांग्रेस अपना जनाधार बढ़ाने में जुटी है। पहले झटके भाजपा ने दो पार्षदों को अपने यहां शामिल कर दिए थे। अब कांग्रेस ऐसा कर रही है। कांग्रेस ने गठबंधन खत्म होने के बाद आप के पार्षदों में सेंधमारी शुरू की थी।

     

    यह पार्षद बदल चुके पार्टी

    • भाजपा: कांग्रेस से गुरचरण सिंह, हरप्रीत कौर बबला, गुरबख्श रावत, आप से लखबीर सिंह, पूनम, सुमन को तोड़ा
    • कांग्रेस: आप से तरुणा मेहता, प्रेमलता, दमनप्रीत सिंह और मुनव्वर को शामिल किया
    • आप: शिरोमणि अकाली दल के इकलौते पार्षद हरदीप सिंह को शामिल किया।

     

    खबरें और भी

    पार्टी 2021 चुनाव के समय अब की स्थिति
    आप 14 08
    भाजपा 12 18
    कांग्रेस 08 10 (9 + 1 सांसद का वोट)
     
     
     
    कोई नेतृत्व ही नहीं है। जब तक कोई मुखिया नहीं होता तो पूरा कुनबा बिखर जाता है। पार्षद के काम ही नहीं होते थे। उनकी मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया। अगर नेतृत्व ढंग का होता तो एक के बाद एक पार्षद नहीं छोड़ते। -सुमन शर्मा, डिप्टी मेयर, चंडीगढ़।

     

    संगठन में काम करने का अनुभव रहा। जो संगठन में रहता है वह कभी किसी संगठन के बिना नहीं रह सकता। उसने ऐसे ही खुद को ढाला होता है। आप में न कोई संगठन था और न ही नेतृत्व। सभी प्रधान थे। हर कोई मर्जी का मालिक होता था। संगठन में ऐसा नहीं होता। यहां एक लीडर होता है पार्टी की लाइन होती है। उसी हिसाब से चलना होता है। इसलिए वह छोड़कर कांग्रेस में आई थी। आप के बुलबुले की उम्र बहुत कम थी। इसका उन्हें पहले ही पता चल गया था। आप की स्थिति शुरू से ऐसी थी कि पार्षद इस्तीफा जेब में रखते थे। -तरुणा मेहता, पार्षद, कांग्रेस, आप से जीती थी।

     

    आप में कोई सुनवाई ही नहीं होती। संगठन नाम की कोई चीज नहीं है। पंजाब में आप की सरकार है लेकिन एक थाने तक में पार्षद की बात नहीं सुनी जाती। सबसे अधिक वोट से वह जीते थे फिर भी कभी तव्वजो नहीं मिली। इसलिए आप छोड़ राजनीति सीखने कांग्रेस आया।
    -मुनव्वर, पार्षद, आप से कांग्रेस में शामिल।

     

    जिन्हें कोई पूछता नहीं था उन्हें आप ने मौका देकर पार्षद बनाया। निजी स्वार्थाें की पूर्ति नहीं हुई तो दल बदल लिया। पार्षदों को यह पता था कि उन्हें आगे टिकट नहीं मिलेगी तो उन्होंने दल बदल लिया। लेकिन जनता इनको जवाब देगी। आप में ऐसे विश्वासघात लोगों की कोई जगह नहीं है। -विजय पाल यादव, अध्यक्ष, आप।