चंडीगढ़ में ट्रिब्यून चौक पर फ्लाईओवर बनेगा या नहीं? फिर फंसा पेंच; हाईकोर्ट की रोक, अंडरपास का दिया विकल्प
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ के ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर परियोजना को मास्टर प्लान-2031 का उल्लंघन मानते हुए खारिज कर दिया है। अदालत ने यातायात ...और पढ़ें

ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर प्रोजेक्ट को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ा झटका।
HighLights
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर प्रोजेक्ट खारिज किया।
मास्टर प्लान-2031 का उल्लंघन बताया, अंडरपास का विकल्प।
चंडीगढ़ की शहरी पहचान, वास्तु स्वरूप संरक्षित रखने पर जोर।
दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर प्रोजेक्ट को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। चीफ जस्टिस शील नागू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने शुक्रवार को स्पष्ट कर दिया कि दक्षिण मार्ग (दक्षिण मार्ग) पर प्रस्तावित ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर का निर्माण चंडीगढ़ मास्टर प्लान-2031 के प्रविधानों का उल्लंघन होगा, इसलिए इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।
अदालत ने हालांकि यह भी कहा कि यातायात समस्या के समाधान के लिए अंडरपास एक स्वीकार्य विकल्प हो सकता है और उस पर विचार किया जा सकता है। ओपन कोर्ट में आदेश सुनाते हुए खंडपीठ ने प्रशासन को निर्देश दिया कि चंडीगढ़ की मूल शहरी पहचान और वास्तु स्वरूप को संरक्षित रखा जाए।
विशेष रूप से फेज-1 के सेक्टरों तथा दक्षिण मार्ग क्षेत्र के मूल चरित्र और शहरी डिजाइन को बनाए रखने पर जोर दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि बढ़ते ट्रैफिक दबाव से निपटने के लिए निजी वाहनों पर निर्भरता कम करना आवश्यक है और इसके लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को और अधिक मजबूत तथा विस्तारित किया जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत पहले ही प्रस्तावित परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक लगा चुकी थी। अदालत ने इस तथ्य पर गंभीरता दिखाई थी कि ट्रिब्यून चौक के आसपास लगे आम सहित अनेक पेड़ पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से मौजूद हैं और फ्लाईओवर निर्माण के लिए इन्हें काटा या भारी छंटाई की जा सकती है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित की थी।
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यह मामला ट्रिब्यून चौक पर प्रस्तावित फ्लाईओवर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता तनु बेदी ने दलील दी कि प्रस्तावित फ्लाईओवर न केवल मास्टर प्लान-2031 के विपरीत है बल्कि इससे शहर की नियोजित शहरी संरचना, हरित पट्टियों और पैदल यात्रियों के अनुकूल स्वरूप को भी नुकसान पहुंचेगा।
उन्होंने अदालत को बताया कि चंडीगढ़ को पैदल और साइकिल अनुकूल शहर के रूप में विकसित किया गया था तथा फ्लाईओवर जैसी संरचनाएं शहर के दृश्य स्वरूप और गैर-मोटर चालित परिवहन व्यवस्था को प्रभावित करती हैं।
उनका तर्क था कि निजी वाहनों के लिए लगातार आधारभूत ढांचा बढ़ाने से जाम की समस्या खत्म नहीं होती बल्कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित हो जाती है। उन्होंने फ्लाईओवर को चंडीगढ़ की विरासत के लिए “मृत्यु घंटी” तक करार दिया।
वहीं यूटी प्रशासन की ओर से वरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता अमित झांजी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मास्टर प्लान फ्लाईओवर निर्माण की अनुमति देता है। उन्होंने दलील दी कि विरासत क्षेत्र केवल सेक्टर 1 से 30 तक सीमित हैं, पूरा शहर नहीं।
प्रशासन ने यह भी कहा कि शहर की आबादी और ट्राईसिटी क्षेत्र का विस्तार मूल योजना से कहीं अधिक हो चुका है। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट कर दिया कि ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर मास्टर प्लान-2031 के अनुरूप नहीं है, जबकि अंडरपास पर विचार किया जा सकता है।
दयानंद शर्मा, चंडीगढ़ ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर प्रोजेक्ट को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है।चीफ जस्टिस शील नागू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने शुक्रवार को स्पष्ट कर दिया कि दक्षिण मार्ग (दक्षिण मार्ग) पर प्रस्तावित ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर का निर्माण चंडीगढ़ मास्टर प्लान-2031 के प्रावधानों का उल्लंघन होगा, इसलिए इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने हालांकि यह भी कहा कि यातायात समस्या के समाधान के लिए अंडरपास एक स्वीकार्य विकल्प हो सकता है और उस पर विचार किया जा सकता है।ओपन कोर्ट में आदेश सुनाते हुए खंडपीठ ने प्रशासन को निर्देश दिया कि चंडीगढ़ की मूल शहरी पहचान और वास्तु स्वरूप को संरक्षित रखा जाए। विशेष रूप से फेज-1 के सेक्टरों तथा दक्षिण मार्ग क्षेत्र के मूल चरित्र और शहरी डिजाइन को बनाए रखने पर जोर दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि बढ़ते ट्रैफिक दबाव से निपटने के लिए निजी वाहनों पर निर्भरता कम करना आवश्यक है और इसके लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को और अधिक मजबूत तथा विस्तारित किया जाना चाहिए।मामले की सुनवाई के दौरान अदालत पहले ही प्रस्तावित परियोजना के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक लगा चुकी थी। अदालत ने इस तथ्य पर गंभीरता दिखाई थी कि ट्रिब्यून चौक के आसपास लगे आम सहित अनेक पेड़ पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से मौजूद हैं और फ्लाईओवर निर्माण के लिए इन्हें काटा या भारी छंटाई की जा सकती है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित की थी।यह मामला ट्रिब्यून चौक पर प्रस्तावित फ्लाईओवर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता तनु बेदी ने दलील दी कि प्रस्तावित फ्लाईओवर न केवल मास्टर प्लान-2031 के विपरीत है बल्कि इससे शहर की नियोजित शहरी संरचना, हरित पट्टियों और पैदल यात्रियों के अनुकूल स्वरूप को भी नुकसान पहुंचेगा। उन्होंने अदालत को बताया कि चंडीगढ़ को पैदल और साइकिल अनुकूल शहर के रूप में विकसित किया गया था तथा फ्लाईओवर जैसी संरचनाएं शहर के दृश्य स्वरूप और गैर-मोटर चालित परिवहन व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। उनका तर्क था कि निजी वाहनों के लिए लगातार आधारभूत ढांचा बढ़ाने से जाम की समस्या खत्म नहीं होती बल्कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित हो जाती है। उन्होंने फ्लाईओवर को चंडीगढ़ की विरासत के लिए “मृत्यु घंटी” तक करार दिया।वहीं यूटी प्रशासन की ओर से वरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता अमित झांजी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मास्टर प्लान फ्लाईओवर निर्माण की अनुमति देता है। उन्होंने दलील दी कि विरासत क्षेत्र केवल सेक्टर 1 से 30 तक सीमित हैं, पूरा शहर नहीं। प्रशासन ने यह भी कहा कि शहर की आबादी और ट्राइसिटी क्षेत्र का विस्तार मूल योजना से कहीं अधिक हो चुका है। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट कर दिया कि ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर मास्टर प्लान-2031 के अनुरूप नहीं है, जबकि अंडरपास पर विचार किया जा सकता है।