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    मोदी-बादल की मुलाकात, क्या बदलेगी चंडीगढ़ की राजनीति? निगम चुनाव के सियासी समीकरणों पर लगाए जाने लगे कयास

    Updated: Sun, 09 Aug 2026 02:39 PM (IST)

    प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात से चंडीगढ़ की राजनीति में हलचल तेज हो गई है, जिससे भाजपा-अकाली दल के बीच गठबंधन की अटकलें लगाई जा रही हैं। ...और पढ़ें

    संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात करते शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल।

    संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात करते शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल।

    HighLights

    1. मोदी-बादल मुलाकात से चंडीगढ़ राजनीति में गठबंधन की अटकलें।

    2. आगामी नगर निगम चुनाव पर संभावित गठबंधन का असर।

    3. 2020 में अलग लड़ने से भाजपा-अकाली दल को नुकसान हुआ।

    राजेश ढल्ल, चंडीगढ़। शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की शुक्रवार को संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात चंडीगढ़ की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। दोबारा गठबंधन के कयासों के बीच इसका पहला राजनीतिक असर चंडीगढ़ में दिखाई देने की संभावना जताई जा रही है।

    पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले इस साल नवंबर में चंडीगढ़ नगर निगम के चुनाव होने हैं, ऐसे में दोनों दलों का साथ आना नगर निगम चुनाव के समीकरण बदल सकता है। वर्ष 1997 से 2016 तक भाजपा और अकाली दल गठबंधन में चुनाव लड़ते रहे।

    हालांकि, 2020 में गठबंधन टूटने के बाद दोनों दलों ने चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव अलग-अलग लड़ा। इसका नुकसान भाजपा और अकाली दल दोनों को हुआ, जबकि आम आदमी पार्टी को इसका फायदा मिला और वह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।

    अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात के बाद गठबंधन की चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं। चंडीगढ़ भाजपा को उम्मीद है कि यदि गठबंधन होता है तो आगामी नगर निगम चुनाव में दोनों दलों को इसका फायदा मिल सकता है

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    गठबंधन के तहत भाजपा अकाली दल के लिए चार सीटें छोड़ती आई है, लेकिन अब गठबंधन होने पर अकाली दल पहले के मुकाबले में ज्यादा सीट की मांग करेगा क्योंकि पहले चार सीट उस समय दी जाती थी जब नगर निगम में 26 वार्ड थे लेकिन अब वार्ड की संख्या बढ़कर 35 हो गई है।

    साल 2020 के नगर निगम चुनाव में शिअद के अध्यक्ष हरदीप सिंह बुटरेला थे जो कि अब आम आदमी पार्टी में हैं। साल 2020 के नगर निगम चुनाव में शिअद ने शहर में 15 उम्मीदवार खड़े किए थे उस समय सिर्फ एक ही उम्मीदवार चुनाव जीता।

    गठबंधन न होने के कारण भाजपा लोकसभा भी हारी

    शहर की एक मात्र लोकसभा सीट पर भी अकाली दल का भाजपा उम्मीदवार को समर्थन रहा है।पिछला लोकसभा चुनाव में गठबंधन होने के कारण भाजपा को नुकसान हुआ क्योकि अकाली दल ने भाजपा को समर्थन नहीं दिया और भाजपा उम्मीदवार संजय टंडन सिर्फ 2500 वोट के मार्जन से हार गए थे।

    भाजपा नेताओं के अनुसार अगर गठबंधन होता तो चंडीगढ़ की सीट भी भाजपा जीत जाती जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का चंडीगढ़ लोकसभा सीट पर गठबंधन था, जिसका कांग्रेस उम्मीदवार मनीष तिवारी को फायदा मिला।

    साल 2024 के लोकसभा चुनाव में अकाली दल ने अपना अलग उम्मीदवार खड़ा किया था लेकिन उम्मीदवार हरदीप सिंह आप में शामिल हो गए थे। शहर में अकाली दल का एक बार मेयर और दो बार सीनियर डिप्टी मेयर और डिप्टी मेयर भी बना है।

    चंडीगढ़ भाजपा का मानना है कि अकाली दल के साथ पुराने राजनीतिक समीकरण बहाल होने से वोटों के बंटवारे को रोकने में मदद मिल सकती है। वहीं, गठबंधन होने की स्थिति में वार्ड स्तर पर सीटों के बंटवारे और चुनावी रणनीति को लेकर भी नए समीकरण बनेंगे।

    साल 2020 में यह रही थी स्थिति 

    पार्टी कुल वोट वोट शेयर सीटें
    भाजपा 1,13,045 29.30% 12
    शिअद 10,744 2.78% 1
    दोनों मिलाकर 1,23,789 32.08% 13

     

    राजनीतिक विश्लेषक की राय

    भाजपा और अकाली दल के बीच यदि दोबारा राजनीतिक गठबंधन आकार लेता है, तो उसका तात्कालिक पहला असर चंडीगढ़ नगर निगम की राजनीति पर दिखाई दे सकता है। दोनों दल लंबे समय तक गठबंधन की राजनीति के माध्यम से एक-दूसरे के पारंपरिक वोट आधार को जोड़ते रहे हैं। साल 2020 में अलग-अलग चुनाव लड़ने से वोटों का विभाजन हुआ और आम आदमी पार्टी को इसका राजनीतिक लाभ मिला। आगामी नगर निगम चुनाव इस लिहाज से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यहां मुकाबला केवल सीटों का नहीं, बल्कि वोटों के प्रभावी एकीकरण का भी होगा। यदि भाजपा और अकाली दल साथ आते हैं तो दोनों की संगठनात्मक पकड़ और सामाजिक-राजनीतिक आधार के जुड़ने से मुकाबला त्रिकोणीय से अधिक सीधा और प्रतिस्पर्धी हो सकता है। गठबंधन का लाभ केवल सीटों के गणित से तय नहीं होगा। सीट बंटवारा, उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल और दोनों दलों के कार्यकर्ताओं का जमीनी समन्वय इसकी सफलता के निर्णायक कारक होंगे। साथ ही, यह भी देखना होगा कि गठबंधन का मतदाता इसे स्वाभाविक राजनीतिक पुनर्संयोजन के रूप में स्वीकार करता है या नहीं। 
    प्रोफेसर डाॅ. भरत, राजनीतिक विश्लेषक, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ