पंजाब में गहराता भूजल संकट, रेड जोन से निकालने की कवायद तेज; 111 ब्लॉक ओवर-एक्सप्लाइटेड
पंजाब भूजल संकट से जूझ रहा है, जहां 153 में से 111 ब्लॉक अत्यधिक दोहन की श्रेणी में हैं, जबकि राज्य अपनी क्षमता से 56% अधिक भूजल निकाल रहा है। ...और पढ़ें
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पंजाब में गहराता भूजल संकट। फाइल फोटो
HighLights
पंजाब के 111 ब्लॉक भूजल के अत्यधिक दोहन की श्रेणी में।
राज्य अपनी क्षमता से 56% अधिक भूजल का उपयोग कर रहा।
फसल विविधीकरण और सिंचाई आधुनिकीकरण से संकट से निपटने का प्रयास।
रोहित कुमार, चंडीगढ़। भूजल संकट से जूझ रहे पंजाब को 'रेड जोन' से बाहर निकालने के लिए राज्य सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में सिंचाई व्यवस्था और खेती के तौर-तरीकों में बड़े बदलाव शुरू किए हैं। फसल विविधीकरण, नहरी सिंचाई का विस्तार, लिफ्ट इरिगेशन परियोजनाएं, भूमिगत पाइपलाइन और माइक्रो इरिगेशन जैसी योजनाओं पर तेजी से काम किया जा रहा है।
इन प्रयासों के शुरुआती सकारात्मक परिणाम भी कुछ क्षेत्रों में दिखाई देने लगे हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार के ताजा भूजल आकलन ने साफ कर दिया है कि चुनौती अभी भी काफी बड़ी है। राज्य के 153 भूजल आकलन ब्लाकों में से 111 ब्लाक ओवर-एक्सप्लाइटेड श्रेणी में हैं, जबकि पंजाब अपने दोहन योग्य भूजल संसाधनों की तुलना में 56 प्रतिशत अधिक भूजल निकाल रहा है।
राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री सीआर पाटिल ने बताया कि पंजाब का वार्षिक भूजल पुनर्भरण (एनुअल ग्राउंडवाटर रिचार्ज) 18.60 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है, जबकि वार्षिक दोहन योग्य भूजल संसाधन 16.80 बीसीएम आंका गया है। इसके बावजूद राज्य में भूजल का दोहन तय सीमा से काफी अधिक बना हुआ है। केंद्र ने माना है कि सिंचाई के लिए ट्यूबवेलों पर अत्यधिक निर्भरता और धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसल का बड़ा रकबा भूजल स्तर पर लगातार दबाव बना रहा है।
जिला स्तर के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। संगरूर में भूजल दोहन 309.99 प्रतिशत दर्ज किया गया, जो राज्य में सबसे अधिक है। इसके बाद मलेरकोटला (301.93 प्रतिशत), जालंधर (281.17 प्रतिशत), कपूरथला (242.96 प्रतिशत), मोगा (233.09 प्रतिशत), बरनाला (219.36 प्रतिशत) और पटियाला (208.53 प्रतिशत) का स्थान है।
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वहीं, तरनतारन (202.49 प्रतिशत), लुधियाना (194.65 प्रतिशत), फतेहगढ़ साहिब (182.13 प्रतिशत) तथा अमृतसर (160.33 प्रतिशत) में भी भूजल दोहन सुरक्षित सीमा से काफी ऊपर दर्ज किया गया है।
हालांकि, कुछ जिलों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है। श्री मुक्तसर साहिब में भूजल दोहन 27.81 प्रतिशत, पठानकोट में 41.05 प्रतिशत, फाजिल्का में 65.18 प्रतिशत और रूपनगर में 92.80 प्रतिशत दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां नहरी सिंचाई की पहुंच बेहतर हुई है और किसानों ने वैकल्पिक फसलों की ओर रुख किया है, वहां भूजल पर दबाव कुछ हद तक कम हुआ है।
भूजल संकट से निपटने के लिए राज्य सरकार ने फसल विविधीकरण को सबसे बड़ा हथियार बनाया है। किसानों को धान की जगह मक्का, कपास, दालें और तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
साथ ही करीब 7,200 करोड़ रुपये की लागत से पुरानी और बंद पड़ी नहरों तथा रजवाहों का आधुनिकीकरण किया गया है। इसका असर यह हुआ है कि दशकों बाद कई इलाकों में नहरी पानी खेतों के आखिरी छोर तक पहुंचने लगा है, जिससे ट्यूबवेलों पर निर्भरता कम होने की उम्मीद बढ़ी है।
इसके अलावा रूपनगर सहित ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 650 करोड़ रुपये की लिफ्ट इरिगेशन परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनके जरिए सतलुज और स्वां नदी का पानी खेतों तक पहुंचाया जा रहा है। खेतों में सिंचाई के दौरान पानी की बर्बादी रोकने के लिए भूमिगत पाइपलाइन बिछाने पर सब्सिडी दी जा रही है।
वहीं 'पर ड्रॉप मोर क्रॉप' योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। भूजल के संतुलित उपयोग और निगरानी के लिए पंजाब वाटर रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी का भी गठन किया गया है।