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    'शक कितना भी मजबूत हो, सबूत का विकल्प नहीं हो सकता...', 25 साल बाद पंजाब-हरियाणा HC ने किया हत्या के दोषी को बरी

    Updated: Tue, 04 Aug 2026 03:27 PM (IST)

    पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 25 साल पुराने हत्या के मामले में आजीवन कारावास काट रहे दोषी को बरी कर दिया। ...और पढ़ें

    25 साल बाद पंजाब-हरियाणा HC ने किया हत्या के दोषी को बरी (File Photo)

    25 साल बाद पंजाब-हरियाणा HC ने किया हत्या के दोषी को बरी (File Photo)


    HighLights

    1. हाई कोर्ट ने 25 साल पुराने हत्या के दोषी को बरी किया।

    2. अदालत ने कहा, शक कितना भी मजबूत हो, सबूत नहीं।

    3. अभियोजन संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा।

    राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हत्या के एक 25 वर्ष पुराने मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषी को बरी करते हुए कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि शक कितना भी मजबूत हो, वह सबूत का विकल्प नहीं हो सकता। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन न तो परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित कर सका और न ही यह साबित कर पाया कि अपराध केवल आरोपित ने ही किया था। ऐसे में आरोपित को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।

    जस्टिस विनोद एस भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने सोनीपत निवासी नरेश उर्फ काला की अपील स्वीकार करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सोनीपत द्वारा दो जुलाई 2005 को सुनाई गई हत्या की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा रद कर दी। मामला 26 अक्टूबर 2001 को दर्ज एफआइआर से संबंधित था।

    साल 2001 की है घटना

    अभियोजन के अनुसार दलबीर की हत्या 25-26 अक्टूबर 2001 की रात को हुई थी। पुलिस का दावा था कि आरोपित के खिलाफ मामला 'लास्ट सीन', अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति तथा खून से सने कपड़ों की बरामदगी पर आधारित है।

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    हालांकि हाई कोर्ट ने पाया कि जिन गवाहों के आधार पर अभियोजन ने यह कहानी खड़ी की थी, वे सभी अदालत में अपने पहले के बयान से मुकर गए और शत्रुतापूर्ण घोषित कर दिए गए।

    खंडपीठ ने कहा कि 'लास्ट सीन' सिद्धांत तभी लागू होता है, जब आरोपित और मृतक को अंतिम बार साथ देखे जाने तथा शव मिलने के बीच का अंतर इतना कम हो कि किसी अन्य व्यक्ति के अपराध करने की संभावना ही न बचे। इस मामले में ऐसी कोई स्थिति साबित नहीं हुई। हाई कोर्ट ने बरामदगी संबंधी साक्ष्यों को भी अपर्याप्त माना।

    अदालत ने कहा कि आरोपित के घर से बरामद शर्ट पर मिले दागों के संबंध में फोरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट में स्पष्ट था कि दाग इतने क्षतिग्रस्त हो चुके थे कि यह तक निर्धारित नहीं किया जा सका कि वे मानव रक्त के हैं या नहीं। इसलिए इन दागों को मृतक के रक्त से जोड़ना संभव नहीं था। मृतक के पिता ने स्वयं स्वीकार किया था कि आरोपित और उसका बेटा अच्छे मित्र थे तथा दोनों परिवारों के बीच कोई दुश्मनी नहीं थी।

    अदालत ने कहा कि मृतक के शरीर में अल्कोहल की मात्रा 69 प्रतिशत पाई गई थी और वह नाली में मुंह के बल पड़ा मिला था। ऐसे में गिरने से चोट लगने की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। इन परिस्थितियों में अभियोजन संदेह से परे अपराध सिद्ध करने में विफल रहा, इसलिए आरोपित को संदेह का लाभ देते हुए उसकी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा रद कर अपील स्वीकार कर ली गई।