पांच साल बिना फैसले जेल में रहा आरोपी, देशद्रोह के आरोपों के बावजूद अदालत ने दी जमानत
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने पांच साल से हिरासत में बंद आरोपी को जमानत दी। अदालत ने कहा कि लंबी सुनवाई और देरी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकती ...और पढ़ें

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट।
HighLights
यूएपीए आरोपी को पांच साल बाद मिली जमानत।
हाई कोर्ट ने अत्यधिक हिरासत को मौलिक अधिकार उल्लंघन बताया।
मोगा झंडा मामले में सशर्त जमानत मंजूर हुई।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाते हुए एक फैसले में यूएपीए के तहत गिरफ्तार आरोपित को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि ट्रायल में अत्यधिक देरी और लंबी प्री-ट्रायल हिरासत किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकती है।
यह आदेश जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने आरोपित आकाशदीप सिंह उर्फ मुन्ना की अपील पर सुनाया। आरोपी पर वर्ष 2020 में मोगा स्थित सरकारी परिसर में कथित तौर पर खालिस्तानी झंडा फहराने और तिरंगे का अपमान करने के गंभीर आरोप हैं। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी पांच साल से अधिक समय से हिरासत में है और ट्रायल अभी तक पूरा नहीं हुआ है।
ऐसे में निरंतर हिरासत न्याय के हित में नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर आरोप होने के बावजूद, यदि मुकदमे में देरी हो रही है, तो व्यक्ति के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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प्री-ट्रायल हिरासत का उद्देश्य सजा देना नहीं
पीठ ने कहा कि “प्री-ट्रायल हिरासत का उद्देश्य सजा देना नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करना है।” अदालत ने माना कि आरोपी की अब तक की हिरासत “अत्यधिक” हो चुकी है और आगे हिरासत में रखना अनुचित होगा।हालांकि, अदालत ने आरोपों की गंभीरता को भी स्वीकार किया और कहा कि जमानत देते समय राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने सशर्त जमानत मंजूर की। अदालत ने आरोपी को एक लाख रुपये के मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया, साथ ही यह शर्त लगाई कि वह किसी भी राष्ट्रविरोधी गतिविधि में शामिल नहीं होगा और कानून के दायरे में रहेगा।
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शर्तों के उल्लंघन पर जमानत होगी रद
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी किसी शर्त का उल्लंघन करता है तो राज्य जमानत रद कराने के लिए स्वतंत्र होगा। गौरतलब है कि यह मामला 14 अगस्त 2020 का है, जब आरोपियों ने कथित रूप से मोगा के डीसी कार्यालय परिसर में खालिस्तानी झंडा फहराया और तिरंगे का अपमान किया था।
इस घटना के बाद पंजाब पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की थी, जिसे बाद में केंद्र सरकार ने एनआईए को सौंप दिया।फिलहाल, मामले का ट्रायल जारी है और कई गवाहों की गवाही अभी बाकी है। हाई कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता दोनों का संरक्षण समान रूप से आवश्यक है।