SYL विवाद में आया नया मोड़, केबीएस सिद्धू बोले- हरियाणा को मिल रहा निर्धारित पानी, नहर के लिए अतिरिक्त नहीं
पंजाब के पूर्व विशेष मुख्य सचिव केबीएस सिद्धू ने दावा किया कि हरियाणा को उसका हिस्सा पहले ही मिल रहा है और एसवाईएल के लिए अतिरिक्त पानी उपलब्ध नहीं है।

SYL नहर।
HighLights
रावी-ब्यास में पानी की उपलब्धता 22% से अधिक घटी।
हरियाणा को पहले ही निर्धारित पानी मिल रहा, अतिरिक्त नहीं।
केबीएस सिद्धू ने नए सिरे से आकलन की मांग की।
रोहित कुमार, चंडीगढ़। रावी-ब्यास नदियों में पानी की उपलब्धता बीते दशकों में 22 प्रतिशत से अधिक घट चुकी है, लेकिन 1987 के इराडी ट्रिब्यूनल के तहत हरियाणा को मिलने वाले हिस्से में उसी अनुपात में कमी नहीं हुई। ऐसे में हरियाणा को उसके मौजूदा हिस्से का पानी पहले ही मिल रहा है और सतलुज-यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर में डालने के लिए अतिरिक्त पानी उपलब्ध नहीं है।
यह दावा पंजाब के पूर्व विशेष मुख्य सचिव केबीएस सिद्धू ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल को भेजे पत्र में किया है। केबीएस सिद्धू ने पत्र की प्रतियां पंजाब के मुख्य सचिव और केंद्रीय जल आयोग को भी भेजी हैं। उन्होंने कहा कि 1987 में इराडी ट्रिब्यूनल ने रावी और ब्यास के पानी का बंटवारा उस समय उपलब्ध नदी प्रवाह के आंकड़ों के आधार पर किया था।
ये आंकड़े 1959-60 तक के थे। ट्रिब्यूनल ने साथ ही यह व्यवस्था भी दी थी कि नदियों के बहाव में वृद्धि या कमी होने पर पंजाब और हरियाणा के हिस्से में भी उसी अनुपात में बदलाव होगा।
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नदियों में 22 फीसदी से अधिक कम पानी
सिद्धू के मुताबिक, अब नदियों का बहाव 22 प्रतिशत से अधिक कम हो चुका है। वहीं राजस्थान, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के हिस्से को घटाया नहीं जा सकता। ऐसे में पानी की कमी का पूरा भार पंजाब और हरियाणा पर पड़ रहा है।
उनका कहना है कि यदि मौजूदा नदी प्रवाह के आधार पर गणना की जाए तो हरियाणा का हिस्सा करीब 1.54 से 1.70 मिलियन एकड़ फुट के बीच बनता है। इसके मुकाबले हरियाणा पहले ही करीब 1.62 मिलियन एकड़ फुट पानी नहरों के जरिए प्राप्त कर रहा है।
2025 तक के आंकड़ों से फिर हो आकलन
केबीएस सिद्धू ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय से रावी-ब्यास के पानी की उपलब्धता का नए सिरे से आकलन कराने की मांग की है। इसके लिए 2025 तक के नदी प्रवाह के आंकड़ों को आधार बनाने को कहा गया है। उन्होंने यह भी कहा है कि पंजाब, हरियाणा और राजस्थान वर्तमान में वास्तव में कितना पानी इस्तेमाल कर रहे हैं, इसकी भी जांच होनी चाहिए। उनके अनुसार, पानी के उपयोग का अंतिम व्यापक आकलन करीब 41 वर्ष पहले किया गया था।
उन्होंने सभी राज्यों के हिस्से में समान अनुपात में कटौती का सुझाव दिया है। सिद्धू का कहना है कि इससे पंजाब और हरियाणा दोनों को मौजूदा व्यवस्था की तुलना में राहत मिल सकती है। हालांकि इसका असर राजस्थान के हिस्से पर पड़ेगा।
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राजस्थान को पानी की कीमत चुकाने का मुद्दा उठाया
सिद्धू ने 29 जनवरी 1955 के उस प्रावधान का भी उल्लेख किया है, जिसके तहत राजस्थान को दिए जाने वाले पानी की कीमत बाद में तय कर भुगतान किया जाना था। उनके अनुसार, बाद में केंद्र की ओर से जारी अधिसूचना में पानी का प्रावधान तो आगे बढ़ा दिया गया, लेकिन भुगतान से जुड़ी शर्त प्रभावी नहीं हुई। उन्होंने इस पुराने मामले को भी निपटाने की मांग की है।
हरियाणा के किसानों की मदद के लिए केंद्र यदि आर्थिक सहायता देना चाहता है तो सिद्धू ने सालाना 450 से 1100 करोड़ रुपये तक की राशि का सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि यह भुगतान केंद्र सरकार की ओर से होना चाहिए, पंजाब की ओर से नहीं, और इसे निश्चित अवधि के बाद समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
'एसवाईएल की क्षमता उपलब्ध पानी से दोगुनी'
सिद्धू ने कहा कि एसवाईएल नहर को 2.21 मिलियन एकड़ फुट पानी ले जाने के लिए बनाया गया था। इसके मुकाबले मौजूदा दावा शून्य से 0.9 मिलियन एकड़ फुट के बीच है। ऐसे में नहर में डालने के लिए उपलब्ध पानी उसकी क्षमता से काफी कम है।
उन्होंने कहा, "हरियाणा को 1987 के के तहत आज जितना पानी मिलना चाहिए, वह पहले ही प्राप्त कर रहा है। नई नहर के लिए अतिरिक्त पानी बचा ही नहीं है।"
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