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    कभी मजबूरी, कभी मजबूत दोस्ती! 74 साल से है अकाली दल और BJP का सियासी रिश्ता; हर चुनाव में कैसे बदले समीकरण?

    Updated: Wed, 12 Aug 2026 04:43 PM (IST)

    पंजाब में अकाली दल और बीजेपी के बीच गठबंधन कोई नई बात नहीं है। साल 1997 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टी ने मिलकर सरकार बनाई थी। साल 2020 में कृषि क ...और पढ़ें

    अकाली दल और बीजेपी के बीच गठबंधन कितना पुराना (जागरण ग्राफिक्स)

    अकाली दल और बीजेपी के बीच गठबंधन कितना पुराना (जागरण ग्राफिक्स)

    HighLights

    1. सुखबीर बादल-पीएम मोदी मुलाकात से गठबंधन की अटकलें तेज हुईं

    2. बीजेपी नेताओं ने 2027 चुनाव में अकेले लड़ने का संकेत दिया

    3. अकाली दल और बीजेपी के बीच 1997 में गठबंधन हुआ

    डिजिटल डेस्क, चंडीगढ़। शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई हालिया मुलाकात के बाद पंजाब की राजनीति में एक बार फिर नए सियासी समीकरणों की सुगबुगाहट तेज हो गई। लंबे समय बाद हुई इस बैठक से कयास लगाए जाने लगे हैं कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में बीजेपी और अकाली दल एक बार फिर साथ आ सकते हैं।

    हालांकि, हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इन अटकलों पर विराम लगाते दिखे। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सैनी ने कहा कि बीजेपी का सिर्फ पंजाब के लोगों से गठबंधन है। वहीं, बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने कहा कि बीजेपी पंजाब की सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी।

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    उधर, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी के वरिष्ठ नेता पहले भी कई मौकों पर पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने के संकेत दे चुके हैं। हालांकि, कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ जैसे बीजेपी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अकाली दल के साथ आने से पार्टी को चुनावी लाभ मिल सकता है।

    हाल ही में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा था कि गठबंधन पर अंतिम फैसला सही समय पर लिया जाएगा। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि 2027 के चुनाव तक पंजाब की राजनीति क्या मोड़ लेती है।

    फिलहाल, पंजाब चुनाव को अभी समय है। इससे पहले दोनों पार्टियों की जोड़ी के प्रदर्शन पर ध्यान देना भी जरूरी है।

    इसी क्रम में आइए समझते हैं अकाली दल और बीजेपी के बीच कैसे सियासी रिश्ते रहे हैं और अब तक कब-कब दोनों पार्टियां एक साथ चुनावी मैदान में उतर चुकी हैं...

    जनसंघ और अकाली दल

    साल 1952 में भारतीय जनसंघ (अब बीजेपी) और अकाली दल के बीच गंभीर वैचारिक मतभेद थे। ये मतभेद उस दौरान और बढ़ गए जब पंजाब में भाषाई मुद्दे पर दोनों पार्टियों के अलग-अलग मत सामने आए। जहां एक ओर अकाली दल सूबे में पंजाबी भाषा का समर्थन कर रहा था। वहीं, जनसंघ का जोर हिंदी भाषा पर अधिक था।

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    हालांकि, उस समय कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए दोनों में मजबूरीवश नजदीकियां देखने को मिलीं। इस तरह साल 1952 में दोनों में पहला गठबंधन हुआ।

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    साल 1957 से 1966 के दौरान जब अकालियों ने पंजाबी सूबे की मांग की तो जनसंघ ने इसका विरोध किया। हालांकि, 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद साल 1967 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए दोनों दल एक बार फिर साथ आए और मिलकर सरकार बनाई।

    यह साझेदारी भी ज्यादा लंबे तक नहीं चल सकी और 1970 में हिंदी-पंजाबी भाषा नीति और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के अधिकार क्षेत्र से जुड़े विवादों के चलते जनसंघ ने प्रकाश सिंह बादल की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया।

    क्या था गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी विवाद?
    पंजाब सरकार ने कुछ स्थानीय कॉलेजों को गुरु नानक यूनिवर्सिटी के अधिकार क्षेत्र में डालने का आदेश दिया था। विवाद का मुख्य पहलू पंजाबी भाषा को शिक्षण क्षेत्र में जोड़ने से था।

    आपातकाल के दौरान करीब आए दल

    इसके बाद 1975-77 के आपातकाल ने दोनों को दोबारा करीब ला दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1977 में जनता पार्टी (जिसमें जनसंघ शामिल था) और अकाली दल ने मिलकर फिर से सरकार बनाई।

    साल 1979 में जनता पार्टी के विघटन के बाद, अप्रैल 1980 में पूर्व जनसंघ नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का गठन किया, जिसने आगे चलकर पंजाब में अकाली-भाजपा के सबसे लंबे और मजबूत राजनीतिक गठबंधन की नींव रखी।

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    1990 के दशक में गठबंधन

    साल 1990 के दशक में दोनों दलों के बीच दूरियां कम हुईं। 1996 के 'मोगा डिक्लेरेशन' के बाद 1997 के पंजाब विधानसभा चुनाव में बीजेपी और अकाली दल ने औपचारिक रूप से गठबंधन किया। इसके बाद यह दोस्ती लगभग 23 वर्षों तक चली। दोनों दलों ने मिलकर 1997, 2007 और 2012 में पंजाब में सरकार बनाई।

    क्या था मोगा डिक्लेरेशन?
    साल 1996 में पंजाब के मोगा में अकाली दल ने एक आयोजन किया था, जिसमें एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। इस घोषणा के तहत पार्टी ने खुद को केवल एक सिख-विशेष (पंथक) पार्टी के दायरे से बाहर निकालकर सभी धर्मों और समुदायों के पंजाबियों की पार्टी ('पंजाबियत') के रूप में पेश किया था।

    साल 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल ने एनडीए से अपना नाता तोड़ लिया और केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद दोनों पार्टियों के रास्ते अलग हो गए।

    अलग होने के बाद दोनों दलों का चुनावी प्रदर्शन

    पुराने सीट-बंटवारे के फॉर्मूले के अंतर्गत पंजाब विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल 94 और बीजेपी 23 सीटों पर उतरती थी, जबकि लोकसभा में अकाली दल 10 और बीजेपी 3 सीटों पर उम्मीदवार घोषित करती थी।

    साल 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। चुनाव में बीजेपी को एक भी सीट नहीं मिली, जबकि अकाली दल को केवल एक सीट (बठिंडा) मिली।

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