रोजाना उठती थीं आठ-दस लाशें... कौन थे पंजाब के जसवंत सिंह खालड़ा? जिन्होंने उठाया हजारों मौत के राज से पर्दा
दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। अस्सी के दशक में उन्होंने पंजाब में हजारों युवाओं ...और पढ़ें

कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा (जागरण ग्राफिक्स)
HighLights
फिल्म 'सतलुज' ZEE5 से 48 घंटे में हटाई गई
जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है फिल्म
खालड़ा ने पंजाब में फर्जी एनकाउंटर का मुद्दा उठाया
डिजिटल डेस्क, चंडीगढ़। पंजाबी सिंगर और अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' इन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा चर्चा में है। यह फिल्म 3 जुलाई, 2026 को बिना किसी शोर-शराबे या प्रमोशन के ओटीटी प्लेटफॉर्म जी-5 पर रिलीज की गई थी, लेकिन रिलीज के महज 48 घंटे के भीतर यानी 5 जुलाई को इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।
इस फिल्म को लेकर आखिर इतना विवाद क्यों हैं और जसवंत सिंह खालड़ा आखिर कौन थे, जिनके जीवन पर यह मूवी बेस्ड है? इस आर्टिकल के जरिए विस्तार से समझते हैं।
सतलुज मूवी को लेकर विवाद क्यों?
फिल्म सतलुज पंजाब के एक मशूहर एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बेस्ड है। अस्सी के दशक में जब पंजाब उग्रवाद के दौर से गुजर रहा था। उस दौरान पंजाब के हजारों अज्ञात लोग लापता हो गए थे। जसवंत सिंह ने उन लोगों का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर रखा था। उन्होंने आरोप लगाया कि युवाओं को फर्जी एनकाउंटर में मार गिराया गया।

इस मुद्दे को उठाने के बाद साल 1995 में जसवंत सिंह अचानक गायब हो गए थे। घटना के दस साल बाद जसवंत सिंह की किडनैपिंग और मर्डर मामले में हाई कोर्ट ने पंजाब पुलिस के चार कर्मचारियों को सात साल की सजा सुनाई।
यह फिल्म उसी घटनाक्रम को बताती है। फिल्म का नाम सतलुज से पहले घल्लूघारा और पंजाब 95 रखा गया था। सेंसर बोर्ड की आपत्ति के बाद यह नाम बदला गया।
घल्लूघारा का मतलब
घल्लूघारा एक पंजाबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ नरसंहार होता है। फिल्म सेंसर बोर्ड ने मेकर्स द्वारा रखे गए इस नाम पर आपत्ति जताई थी। जिसके बाद फिल्म का नाम बदलकर पंजाब 95 रखा गया। हालांकि, बाद में इसका नाम एक बार फिर से बदलकर सतलुज रखा गया।
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कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा?
जसवंत सिंह खालड़ा का जन्म साल 1952 में हुआ था। वे समाजसेवी और मानवाधिकार कार्यकर्ता थे। जसवंत अमृतसर में बतौर बैंक डायरेक्टर पद पर काम करते थे।
वह हमेशा कमजोरों की आवाज उठाते थे और उनके हक की लड़ाई लड़ते थे। पंजाब के लिए अस्सी का दशक बहुत मुश्किल भरा रहा। उस दौरान उग्रवाद चरम पर था।
जसवंत सिंह ने उस समय पंजाब पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पंजाब पुलिस द्वारा हजारों सिख युवाओं को अवैध हिरासत में लिया गया और फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया। यही नहीं बिना किसी जानकारी के उनके शवों का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

ऑपरेशन ब्लू स्टार के समय हिरासत में लेने का अधिकार
ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा गांधी की हत्या और 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद पुलिस को संदिग्ध व्यक्तियों यानी किसी को भी शक के आधार पर हिरासत में लेने का अधिकार दिया गया था।
यही कारण है कि बड़ी संख्या में इस छूट का पंजाब पुलिस फायदा उठा रही थी। ‘India Who Killed The Sikhs’ डॉक्यूमेंट्री के अनुसार, पुलिस युवाओं को उठाकर ले जाती थी, फिर झूठा केस बनाती थी। इसके बाद रिहाई के लिए लाखों रुपए मांगती, नहीं देने पर उन्हें फर्जी एनकाउंटर में मार दिया जाता। इस तरह सैकड़ों युवा लापता हुए और उन्हें मार दिया गया। उस दौर मेंआठ से दस लोगों की लाशें रोजाना उठती थीं। पंजाब में हो रहे इस नरसंहार की आवाज जसवंत सिंह खालड़ा ने उठाई...

खालड़ा ने जब पुलिस पर आरोप लगाए तो पुलिस ने इन आरोपों से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जिन युवाओं की हत्या की बात खालड़ा कर रहे हैं, वे विदेशों में फर्जी डॉक्यूमेंट्स पर नौकरी कर रहे हैं। हालांकि, खालड़ा ने फिर भी हार नहीं मानी, वह सिविल कोर्ट और हाईकोर्ट के चक्कर काटते रहे।
कैसे हुई थी जसवंत सिंह खालड़ा की हत्या
जसवंत सिंह खालड़ा 6 सितंबर 1995 को अपने घर के बाहर गाड़ी धो रहे थे। इसी दौरान कुछ लोग आए और उन्हें अपने साथ लेकर चले गए। बाद में पता चला कि वे लोग पुलिस के अधिकारी थे।
करीब डेढ़ महीने बाद 27 अक्टूबर को जसवंत सिंह खालड़ा का शव सतलुज नदी में मिला। उनकी हत्या के बाद माहौल काफी गरमा गया था। उनके परिजनों ने सीबीआई जांच की मांग की थी।
जांच में क्या पता चला?
सीबीआई जांच में कई राज खुलकर सामने आए। कोर्ट ने पंजाब पुलिस के 6 अधिकारियों को दोषी पाया और सात साल की सजा सुनाई। हाई कोर्ट ने छह में से चार आरोपियों की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा अब पीड़ितों की लड़ाई लड़ रही हैं।