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    'पूर्व CM बेअंत सिंह 31 अगस्त को शहीद, खालड़ा 6 सितंबर...'; रवनीत बिट्टू बोले- फिल्म सतलुज में इतिहास का अधूरा चित्रण

    Updated: Wed, 08 Jul 2026 11:00 PM (IST)

    रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म 'सतलुज' को ओटीटी से हटाए जाने के विवाद पर कहा कि भाजपा ने प्रतिबंध नहीं लगाया, बल्कि उस समय कांग्रेस सत्ता ...और पढ़ें

    रवनीत बिट्टू बोले- फिल्म सतलुज में इतिहास का अधूरा चित्रण। फोटो जागरण

    रवनीत बिट्टू बोले- फिल्म सतलुज में इतिहास का अधूरा चित्रण। फोटो जागरण

    HighLights

    1. बिट्टू ने कहा भाजपा ने फिल्म सतलुज पर प्रतिबंध नहीं लगाया।

    2. फिल्म में पंजाब के इतिहास का एकतरफा चित्रण दिखाया गया।

    3. दिलजीत दोसांझ पर वित्तीय लाभ के लिए गुमराह करने का आरोप।

    अंकित शर्मा, जालंधर। फिल्म सतलुज को ओटीटी से हटाए जाने के बाद चल रहे विवाद पर रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा कि इस फिल्म पर भाजपा ने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है। उस समय तो केंद्र में कांग्रेस थी और स्टेट में भी। फिर बीजेपी का नाम लेकर क्यूं रोटियां सेकी जा रह हैं। बीजेपी सरकार तो खुद इस हटाए जाने की जांच कर रही है।

    बिट्टू ने कहा कि इस फिल्म को लेकर उन पर भी कमेंट किए जा रहे हैं, क्योंकि उनके दादा बलिदानी पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह थे। वे उन्हीं की लैगेसी अमनम, शांति, डेवलपमेंट को लेकर चल रहे हैं। मेरे दादा फरवरी 1992 में सीएम बने थे और 31 अगस्त 1995 को शहीद हुए थे। उससे पहले खालड़ा साहिब पर कोई केस भी नहीं था। खालड़ा साहिब को न ही कभी पुलिस ने उठाया नहीं।

    जो निरंतर अज्ञात शवों का लगातार श्मशान घाटों से डाटा तैयार करते थे और तब उनकी फैमिली पर भी कोई केस दर्ज नहीं था। वो लगातार कनाडा, अमेरिका की धरती पर जाते थे और न ही उनके खिलाफ लुक आउट सर्कुलर जारी हुआ था। फिल्म में दिखाया गया कि दादा बेअंत सिंह आर्डर आर्डर दे रहे हैं, पर ये चेक क्यूं नहीं किया गया कि उनकी तो एक सप्ताह पहले 31 अगस्त 1995 को शहादत हो गई थी।

    उनके बाद छह सितंबर 1995 को खालड़ा साहिब को उठाया जाता है। बिट्टू ने उस दौर के लोगों की तस्वीरें दिखाते हुए कहा कि अगर दलजीत दुसांझ अगर वाके ही पंजाब के लोगों की बात करते हैं या हिमायती बनते हैं तो उस दौरे का केवल एक हिस्सा ही क्यूं दिखाया।

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    दिलजीत दुसांझ ने गायक चमकीला पर भी फिल्म बनाई। जिसका एक-एक गीत ही महिलाओं के शरीर पर होता था। उस चमकीला को जिसने मारा था, आज उसे हीरो बनाया हुआ है। मैं दलजीत सिंह दुसांझ और डायरेक्टरों को यही कहता हूं कि आप फिल्में बनाए, पर पंजाब की रियालिटी पर। दोनों तरफ दिखाए। जिन पुलिस वालों को पदश्री मिले, गैलेंटरी अवार्ड मिले उन्हें भी तो दिखाएं। या फिर पंजाब में सिर आग ही लगानी है या हथियार ही चुकवाने हैं।

    ये पिक्चर का केवल अपना ही एक मकसद है जो हमने करना था कर दिया। फिर उसके बाद ये बात फैला दी कि पंजाब में यही हालाता। हालांकि पंजाबियों में गुस्सा ज्यादा है और वे रिएक्ट करते हैं। यही उन्होंने किया फिल्म डाली और खुद ही शोर मचा दिया कि हटा दी गई। बीजेपी तब थी ही नहीं फिर इसे क्यूं रोकेगी। ओटीटी का जो प्लेटफार्म है वो सरकार व सैंसर को कंट्रोल में नहीं है।

    असल लड़ाई क्या थी समझें उसे..

    बिट्टू कहते हैं कि जब ये लड़ाई चल रही थी, टैरेरिस्ट रोज लोगों को मारते थे। तब विवाह शादी या अपने घर आते थे तो पैसे देकर जाते थे। पर तब पुलिस उनके घर पहुंच उनके घरवालों को इंटैरोगेट करते थे। तब क्या परिवारों की तरफ से केवल अखबारों में बेदखलीका नोटिस छपा दिया जाता था। ताकि पुलिस उन्हें परेशान न करे। जबकि पैसा और लूट का सामान सबकुछ आता था।

    जब वो इन्काउंटर में टैरेरिस्ट मारा जाता था, तो बाडी क्लेम करने के लिए भी कोई नहीं जाता था। उनका अंतिम संस्कार भी पुलिस ही करती थी। बसों से निकाल-निकाल कर मारे गए थे, तब भी अज्ञातों के रूप में ही उनका संस्कार भी पुलिस ही करती थी। जो पुलिस वाले भी मारे जाते थे, उनके परिवार वाले भी डर के मारे बाडी लेने नहीं आते थे। क्योंकि टैरेरिस्टों का डर था उन्हें भी।

    तब भी उनका संस्कार पुलिस ही करती थी। मैं उस दौर की घटनाओं से इंकार नहीं करता हूं। क्योंकि पुलिस जब धक्का करती थी, तभी सीबीआई ने उन दोषियों को पकड़ा और आज वो सजा भुगत रहे हैं। अगर वही टैरेरिस्ट या आतंकी अच्छे थे तो तब क्यूं चुनाव नहीं होते थे।बेअंत सिंह जब मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने आकर इलेक्शन करवाए थे। सरपंच व पंचों को ताकत दी।

    श्री दरबार साहिब और 1985 की घटनाएं इनसे अलग हैं। ये लड़ाई तो चोर-डाकू और लूटने वालों की है। बहनों की ईज्जत लूटते थे। इस सारे मामले में मैं खालड़ा साहिब को बीच में नहीं ला रहा हूं क्योंकि वो टैरेरिस्ट नहीं थे। हालांकि खालड़ा साहिब ने जो डाटा इकट्ठा किया था उन्हें मल्टीप्लाई कर दिया। तरनतारन, अमृतसर और मंड एरिया था। वहां से अगर 500 का रिकार्ड मिला तो मल्टीप्लाई बाये 1200 पिंड कर दिया। उस हिसाब से 25000 का डाटा क्लेक्ट हो गया।

    जितना कहा जा रहा है उतने पंजाब में नहीं मरे। अंत में वो मोबाइल पर तस्वीरें दिखाकर सवाल उठाते हैं कि उस दौर में ग्रेनेड या हथियारों के साथ चलने वाले लोग कौन थे? फिल्म खालड़ा साहिब के लिए नहीं दिलजीत सिंह दुसांझ के लिए देखी जा रही है, क्योंकि उनका दुनिया भर में नाम है वो आर्टिस्ट हैं। इस फिल्म से जुड़े हैं और उसका पैसा इससे जुड़ा है।

    दिलजीत खुद ही फिल्म डलवाकर उसे हटाने संबंधी इमोशनल मैसेज डाल लोगों को गुमराह कर रहा है, क्योंकि उसका उसमें पैसा लगा हुआ है। जब ओटीटी में डाली गई तो उसमें 200 रुपये से लेकर 500 रुपये में पैकेज पर लोगों ने उसे खरीद कर डाउनलोड किया।

    वो तो अपनी कमाई करके बाहर चला गया। आज से पहले तो 99 प्रतिशत लोगों किसी को ये भी पता ही नहीं था कि खालड़ा साहिब कौन थे। उनसे किसी को कोई लेना देना नहीं है। इस दौरान उन्होंने हिंदुओं को भी जागने के लिए कहा कि तब 25 हजार से अधिक हिंदू मारे गए थे। अब नहीं तो फिर कब जागोगे।