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    राजस्थान: डांगावास दलित हत्याकांड में 40 आरोपी बरी, 11 साल बाद आया फैसला

    Updated: Thu, 06 Aug 2026 11:49 PM (IST)

    नागौर के डांगावास में 2015 के दलित हत्याकांड में मेड़ता एससी/एसटी कोर्ट ने सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया है, जिससे पीड़ित पक्ष निराश है और उच्च न्याय ...और पढ़ें

    नागौर दलित हत्याकांड में 40 आरोपी बरी (सांकेतिक तस्वीर)

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    जागरण संवाददाता, जयपुर। राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास में साल 2015 में 23 बीघा खेत के मालिकाना हक को लेकर हुए विवाद में पांच दलितों सहित छह लोगों की हत्या के मामले में मेड़ता अनुसूचित जाति-जनजाति विशिष्ट न्यायालय ने सभी 40 आरोपितों को बरी कर दिया है।

    लंबे समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद आए इस फैसले के बाद गुरुवार को डांगावास गांव में खुशी और गम दोनों देखने को मिला है।

    बरी होने वाले पक्ष में गुरुवार को खुशी का माहौल रहा, स्वजन ने पहुंचकर बरी होने वाले लोगों के साथ खुशी जताई। वहीं, जिन पांच दलितों की हत्या हुई उनके परिवार में निराशा का माहौल नजर आया।

    नागौर दलित हत्याकांड में 40 आरोपी बरी

    न्यायालय के फैसले पर पीड़ित दलित पक्ष का कहना है कि जब सभी आरोपित बरी हो गए तो फिर हत्या किसने की थी। पीड़ित पक्ष ने कहा, मामले की जांच कर रही सीबीआइ सही तरह से जांच के आरोपितों को सजा नहीं दिलवा सकी। पीड़ित पक्ष के गोविंद मेघवाल एवं रतनी देवी ने कहा, यदि सभी 40 आरोपित निर्दोष हैं तो फिर उनके पांच लोगों की हत्या किसने की।

    अब पूरा परिवार न्याय के लिए उच्च न्यायालय में अपील करेगा। उधर न्यायालय ने 245 पेज के अपने फैसले में लिखा कि 14 मई, 2015 की हिंसक घटना में कौन लोग शामिल हैं यह सीबीआइ जुटाए गए सबूतों में साबित नहीं कर सकी। यह नहीं कहा जा सकता कि मौतें स्वभाविक थी, पांचों की मौत हिंसक घटना से हुई, लेकिन न्याय व्यवस्था में केवल घटना होना पर्याप्त नहीं है।

    न्यायालय को यह तय करना होता है कि अपराध किसने किया है। यह साबित नहीं हो पाया और इसी का लाभ सभी 40 आरोपितों को मिल गया। न्यायालय ने मृतकों के आश्रितों एवं घायलों को अनूसूचित जाति-जनजाति नियम के तहत राजस्थान पीड़ित प्रतिकार योजना में मुआवजा दिलवाने के निर्देश दिए हैं।

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    गहलोत बोले, पीड़ित पक्ष का सवाल जायज

    पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गुरूवार को एक बयान में कहा, 11 वर्ष बाद आया फैसला चिंताजनक है। अनुसूचित जाति-जनजाति न्यायालय ने सभी 40 आरोपितों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। पीड़ित पक्ष को न्याय दिलवाने के लिए इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील की प्रक्रिया मजबूती से आगे बढ़नी चाहिए। राज्य सरकार को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

    यह है मामला?

    विवाद की शुरूआत साल 1964 से हुई थी। दलित परिवार के बरसाराम ने 1500 रूपए में 23 बीघा जमीन गांव के ही चिमनाराम के गिरवी रखी थी। पीड़ित पक्ष का दावा है कि 1978 में बरसाराम ने ब्याज सहित 2100 रूपए चिमनाराम को दे दिए थे। लेकिन चिमनाराम ने 25 हजार रूपए की मांग की। इसके बाद दोनों पक्षों विवाद गहरा गया। साल, 2011 में मेड़ता एसीजेएम न्यायालय ने बरसाराम के पक्ष में फैसला सुनाया था।

    हत्याकांड के दिन चिमनाराम पक्ष के कानाराम एवं ओमाराम करीब दो सौ लोगों के साथ ट्रैक्टर, मोटर साइकिलों पर सवार होकर हथियारों के साथ खेत में पहुंच गए। पीड़ित ने अर्जुनराम मेघवाल ने पुलिस को बयान दिया था कि हमलावारों ने दलित पक्ष के लोगों से मारपीट करने के साथ ही ट्रैक्टर चढ़ा दिए, जिससे पांच लोगों की मौत हो गई। इसके अलावा, इस घटना में आरोपित पक्ष के एक व्यक्ति की भी मौत हुई थी।