अनजाने में हुए पापों को नष्ट कर देती है अपरा एकादशी, बिना यह कथा पढ़े अधूरा है आपका व्रत
एकादशी का व्रत बिना कथा के श्रवण या पाठ के अधूरा माना जाता है। चलिए पढ़ते हैं अपरा एकादशी व्रत की कथा।

अपरा एकादशी व्रत की कथा
HighLights
कथा के बिना अधूरा है अपरा एकादशी व्रत
राजा महीध्वज को प्रेत योनि से मिली थी मुक्ति
धौम्य ऋषि ने पुण्य अर्पित कर राजा को मोक्ष दिलाया
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आज 13 मई को अपरा एकादशी का पावन व्रत रखा जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक उसकी कथा का श्रवण (सुनना) या पाठ न किया जाए। आइए पढ़ते हैं अपरा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा और इसके अद्भुत लाभ।
श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का संवाद
महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, "हे भगवन! ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और इसका महात्म्य क्या है?" भगवान श्रीकृष्ण इसका उत्तर देते हुए कहते हैं, "हे राजन! इस एकादशी को 'अपरा' और 'अचला' एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान त्रिविक्रम (विष्णु जी के वामन अवतार) की पूजा की जाती है। पुराणों के अनुसार, यह व्रत अपार धन देने वाला है। जो भी मनुष्य सच्ची श्रद्धा से इस व्रत को करता है, वह संसार में कीर्ति और प्रसिद्धि प्राप्त करता है।"
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अपरा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा
प्राचीन काल में महीध्वज नाम का एक धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज इसके बिल्कुल विपरीत क्रूर, अधर्मी और अन्यायी था। वज्रध्वज अपने बड़े भाई से बहुत ईर्ष्या करता था। एक रात मौका पाकर वज्रध्वज ने राजा महीध्वज की हत्या कर दी और उनके शव को जंगल में एक पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा को शांति नहीं मिली और वे प्रेत बनकर उसी पीपल के पेड़ पर रहने लगे। प्रेत योनि में आकर वे अक्सर वहां से गुजरने वालों को परेशान करते थे।

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ऋषि ने इस तरह दिलाई राजा को मुक्ति
एक दिन धौम्य नामक एक महान ॠषि उस जंगल से गुजर रहे थे। उन्होंने उस प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके अतीत और इस दुर्दशा का कारण जान लिया। ऋषि को राजा पर दया आ गई और उन्होंने प्रेत को पेड़ से नीचे उतारा व परलोक विद्या का ज्ञान दिया। ॠषि ने राजा को इस कष्टकारी प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया।
उन्होंने स्वयं पूरे विधि-विधान से अपरा एकादशी का व्रत किया और व्रत से मिलने वाला सारा पुण्य उस प्रेत (राजा महीध्वज) को अर्पित कर दिया। इस महापुण्य के प्रभाव से राजा को तुरंत प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई। उन्होंने एक दिव्य शरीर धारण किया और ऋषि धौम्य को हृदय से धन्यवाद देते हुए पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान किया।
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