गुप्तेश्वर गुफा मंदिर: ओडिशा की रहस्यमयी गुफा में विराजमान स्वयंभू शिवलिंग की अनोखी कहानी
ओडिशा के कोरापुट में स्थित गुप्तेश्वर गुफा मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक रहस्यमयी स्थल है, जहां स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है।

ओडिशा का गुप्तेश्वर गुफा मंदिर स्वयंभू शिवलिंग और रामायण काल से जुड़ा इतिहास (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
ओडिशा के कोरापुट में रहस्यमयी गुप्तेश्वर गुफा मंदिर स्थित है।
यहां स्वयंभू शिवलिंग है, जिसे गुप्त केदार भी कहते हैं।
रामायण काल से जुड़ा इतिहास, सावन में भक्तों की भीड़।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमारे देश में मंदिरों का अपना अलग इतिहास और कहानी है। कुछ मंदिर अपनी वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं, तो कुछ की ऐसी अनोखी कहानियां हैं जो इनके महत्व को और ज्यादा बढ़ाती हैं। इन्हीं मंदिरों में से एक है- गुप्तेश्वर गुफा मंदिर।
यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसके लिए मान्यता है कि इस मंदिर में शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ था इसलिए इसे स्वयंभू मंदिर भी कहा जाता है। यह भारत के ओडिशा राज्य के कोरापुट जिले के जेपोर से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
रहस्यमयी गुफाओं के बीच मौजूद होने की वजह से यह मंदिर गुप्तेश्वर गुफा मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। इसकी कुछ अनोखी कहानियां और अपना अलग इतिहास है। यही नहीं इस मंदिर के लिए कहा जाता है कि यहां आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। आइए जानें इस मंदिर से जुड़ी कुछ अद्भुत बातों के बारे में।
मंदिर की खासियत क्या है?
कोरापुट से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है 'गुप्तेश्वर' गुफा मंदिर जिसका अर्थ है 'छिपे हुए देवता'। यह एक अत्यंत मनमोहक तीर्थस्थल ही जो न केवल भगवान शिव को समर्पित एक धार्मिक स्थल है, बल्कि इतिहास, प्रकृति की भव्यता और अटूट आस्था का एक अनूठा संगम भी है।
स्थानीय लोग इसे 'गुप्त केदार' के नाम से बुलाते हैं और यह गुफा घने जंगलों से घिरी है और शांत कोलाब नदी के किनारे स्थित है। इसका शांत माहौल इसे और भी खास बनाता है। मंदिर का एक और आकर्षण है चूना-पत्थर से बनी यह गुफा जो अपने विशाल और लगातार बढ़ते स्वयंभू शिवलिंग के लिए मशहूर है।
गुप्तेश्वर मंदिर का शिवलिंग है खास
गुप्तेश्वर मंदिर का सुंदर रास्ता भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है और गुप्तेश्वर गुफा तक पहुंचने के लिए पहाड़ी के नीचे से 200 सीढ़ियां बनाई गई हैं। जब आप गुफा के प्रवेश द्वार पर पहुंचते हैं, तो चंपा के पेड़ों की भीनी-भीनी खुशबू हवा में घुली होती है।
मंदिर का प्रवेश द्वार लगभग 9.5 फीट चौड़ा और 6.5 फीट ऊंचा है। इस मंदिर में मौजूद शिवलिंग 3 फीट ऊंचा है और इसकी गोलाई 10 फीट है। इस मंदिर में एक और गुफा है जिसे कामधेनु के थन के रूप में पूजा जाता है। लोग उस थन से टपकने वाली पानी की बूंदों को इकट्ठा करने के लिए लंबे समय तक इंतजार करते हैं और इस पानी को पीना अमृत पान के सामान माना जाता है।
रामायण काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
इस मंदिर के लेकर एक मान्यता है कि रामायण काल में भगवान राम ने स्वयं वनवास के दौरान दंडकारण्य जंगल में इस लिंग की खोज की थी। मशहूर कवि कालिदास ने अपनी रचना 'मेघदूतम्' में रामगिरि जंगल की मनमोहक सुंदरता का जिक्र किया है, जहां यह गुफा मंदिर स्थित है।
समय के साथ इस गुफा का अस्तित्व धुंधला पड़ने लगा, लेकिन 17वीं सदी में एक शिकारी की अचानक हुई मुलाकात से महाराजा वीर विक्रम देव को इस गुफा के बारे में पता चला और गुप्तेश्वर गुफा को फिर से खोजा गया। यहां मौजूद स्वयंभू शिवलिंग की भव्यता से प्रभावित होकर, राजा ने पुजारियों को नियुक्त किया और एक ऐसी परंपरा शुरू की जो आज भी जारी है। इस मंदिर में सावन के पवित्र महीने में पैदल तीर्थयात्रा होती है और हजारों श्रद्धालु इस जगह पर इकठ्ठा होकर मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं।
सावन में लगता है भक्तों का मेला
इस मंदिर में सावन के महीने में, बोल बम यात्रा के दौरान हजारों भक्त लगभग 40 से 60 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं। लाखों की संख्या में कांवड़िये यहां जल लेकर आते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। इस मंदिर में भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
भले ही इस मंदिर का नाम गुप्तेश्वर है जिसका अर्थ होता है छिपे हुए ईश्वर, लेकिन गुप्तेश्वर मंदिर में भगवान शिव की मौजूदगी का एहसास यहां आने वाले हर भक्त को जरूर होता है।
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Source:https://www.incredibleindia.gov.in/
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