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    राजस्थान का अनोखा 'सास-बहू' मंदिर: न सास की पूजा, न बहू की, तो कैसे पड़ा यह नाम?

    Updated: Thu, 23 Jul 2026 03:00 PM (IST)

    भारत में एक अनोखा मंदिर है जिसे सास-बहू मंदिर के नाम से जाना जाता है, जो असल में भगवान विष्णु को समर्पित सहस्त्रबाहु मंदिर है। ...और पढ़ें

    राजस्थान के उदयपुर में सहस्त्रबाहु मंदिर

    राजस्थान के उदयपुर में सहस्त्रबाहु मंदिर

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हम सभी ने हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों के बारे में सुना होगा, जहां उनकी नियमित रूप से पूजा होती है। लेकिन क्या आपने कभी किसी ऐसे मंदिर का नाम सुना है, जो सास-बहु के नाम पर आधारित हो। सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन भारत में एक ऐसा भी मंदिर है, जिसका नाम सास-बहु है।

    इस नाम को सुनते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले सास-बहू के रिश्ते, मीठी नोक-झोंक याद आती है, लेकिन सच इसके बिल्कुल विपरीत है। भारत के सास-बहु वाले इस मंदिर में न तो सास की पूजा होती है और न बहु की। फिर इस मंदिर का नाम सास-बहू कैसे पड़ा? आइए जानते हैं इसके पीछे का सच।

    सहस्त्रबाहु मंदिर का इतिहास

    राजस्थान के उदयपुर के राजसी शहर से तकरीबन 22 किलोमीटर की सुखद यात्रा के बाद आता है, सहस्त्रबाहु मंदिर, जिसे सास-बहू मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर की स्थापत्य कला कोई नई नहीं, बल्कि 10वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास की हैं।

    प्रचलित कहानियों के मुताबिक, मंदिर का मूल नाम सहस्त्रबाहु था, जिसका मतलब है, 'हजार भुजाओं वाला' जो भगवान विष्णु को समर्पित है। हालांकि समय के साथ यह नाम ज्यादा उच्चारण होने वाले सास-बहू में बदल गया, जिसके कारण लोग इस मंदिर को सास-बहू मंदिर के नाम से जानते हैं।

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    राजस्थान के नागदा गांव में स्थित इस परिसर के अंदर दो मुख्य मंदिर हैं। विशाल मंदिर सास और छोटा मंदिर बहू। सास मंदिर 10 छोटे मंदिरों के समूह से घिरा हुआ है, जबकि बहू मंदिर में 5 अन्य छोटे मंदिर हैं। सास के मंदिरों के समक्ष एक मेहराबदार प्रवेश द्वार है, जहां खास मौकों पर भगवान विष्णु की मूर्ति को रखा जाता है। इसमें तीन अलग-अलग दिशाओं में खुलने वाले तीन अन्य द्वार हैं, जबकि चौथा दरबार एक ऐसे कमरे में जहां आम जनता का जाना मना है।

    राजा महिपाला ने बनवाया था मंदिर

    इस मंदिर के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि, इस मंदिर का निर्माण कच्छवाह वंश के राजा महिपाला ने 10वीं या 11वीं शताब्दी के आसपास करवाया था। महिपाला की रानी भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। राजा भी अपनी पत्नी के प्रति काफी प्रेममय और उदार स्वभाव रखने वाला था। इसी तरह भगवान शिव को सम्मान देने के लिए उसने एक अन्य मंदिर बनाया। यह मंदिर राजा की बहू के लिए बने विष्णु जी के मंदिर के बगल था।

    जब भगवान विष्णु के मंदिर का निर्माण हुआ, तो सबसे पहले इसका नाम सहस्त्रबाहु मंदिर रखा गया, जिसका मतलब हजार भुजाओं वाला, जो भगवान विष्णु के रूप का प्रतीक है। समय बीतने के साथ ही यह मंदिर सास-बहु मंदिर के नाम से काफी फेमस हो गया।

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    Source- incredibleindia

    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।