महाभारत काल का वह 'पवित्र कुंड', जहां द्रौपदी ने प्रतिज्ञा पूरी होने के बाद धोए थे खून से सने बाल
यह वही कुंड है, जहां महाभारत काल में भीम द्वारा दुशासन के वध के बाद, द्रौपदी ने अपने खून से सने बाल धोकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की थी। ...और पढ़ें

कुरुक्षेत्र में है 'द्रोपदी कुंड'। (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाभारत काल के कई पौराणिक स्थल आज भी देश में मौजूद हैं, जिनसे जुड़ी रोचक कथाएं हमें उस समय में ले जाती हैं, जब यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। ऐसा ही एक स्थल हरियाणा के कुरुक्षेत्र में है। इस स्थल का नाम है 'द्रौपद कूप'। इस कूप की विशेषता है कि यहां पर द्रौपदी ने अपने रक्त से सने बालों को धोया था। चलिए हम आपको इस स्थान से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और रोचक तथ्य बताते हैं।
'द्रौपदी कूप' का धार्मिक महत्व
यह बात तो सभी जानते हैं कि महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया था। इसलिए कुरुक्षेत्र के आस-पास आपको बहुत सारे ऐसे स्थान मिल जाएंगे, जो महाभारत काल से जुड़े हैं। द्रौपदी कूप का भी बड़ा धार्मिक महत्व है। कुरुक्षेत्र में हर वर्ष अगहन माह में गीता जयंती मनाई जाती है। तब श्रद्धालु इस कूप के दर्शन करने भी आते हैं। यहां एक कुआं जैसा कुंड बना है। ऊपर से जाली लगा दी गई है। बताया जाता है कि यही वो स्थान है जहां पर द्रौपदी ने महाभारत युद्ध के बाद दुशासन के खून से रंगे अपने बाल धोए थे और अपनी प्रतिज्ञा को पूरा किया था।
क्या थी द्रौपदी की प्रतिज्ञा?
महाभारत का युद्ध हुआ ही इसलिए था क्योंकि कौरवों ने भरी सभा में द्रौपदी को निवस्त्र करने और उसका अपमान करने का प्रयास किया था। उस सभा में पांडव कौरवों से शतरंज की बाजी हार गए थे और इस बाजी की जीत में कौरवों ने पांडवों से द्रौपदी को मांगा था। दुर्योधन का छोटा भाई दुशासन ही द्रौपदी को उसके कक्ष से बाल पकड़कर घसीटते हुए लाया था। तब द्रौपदी ने प्रतिज्ञा ली थी कि वह एक दिन उसे रक्त से अपने बालों को भिगोएगी। इसी प्रतिज्ञा को द्रौपदी ने महाभारत युद्ध के बाद पूरा किया था।
यहां है बर्बरीक का मंदिर
बार्बरिक, जिन्हें वर्तमान में हम श्याम बाबा के नाम से जानते हैं। बार्बरिक भीम और हिडिंबा के पुत्र घटोत्कच के पुत्र थे। महाभारत युद्ध में वह भी हिस्सा लेना चाहते थे। धनुर्विद्या में वह इतने माहिर थे कि अकेले ही कौरवों की पूरी सेना को खत्म कर सकते थे।ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें रोका और उनका सिर भी मांग लिया।बार्बरिक ने अपना सिर तो श्रीकृष्ण को दे दिया, मगर उनसे वचन लिया कि वह पूरा महाभारत का युद्ध अपनी आंखों से देख पाएंगे। बाद में बार्बरिक एक मंदिर इस स्थान पर उनकी याद में बना दिया गया। द्रौपदी कूप के साथ-साथ लोग इस स्थान पर भी आकर माथा टेकते हैं।
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अतः महाभारत के युद्ध की गवाही देने वाले इस स्थल का उल्लेख आपको श्रीमद्भगवद्गीता में भी पढ़ने को मिल जाएगा।
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