आखिर क्यों श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध में शस्त्र न उठाने का लिया था प्रण? रहस्य से आज भी दुनिया है अनजान
श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण क्यों लिया था और पूरी लड़ाई धर्म पर कैसे आधारित थी? इस प्रण के पीछे की सही वजह और किस तरह कुरुक् ...और पढ़ें

श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण क्यों लिया (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सदियों से ही वचन निभाने की परंपरा चली आ रही है और हमारे धर्मशास्त्रों समेत महाकाव्यों में भी कई ऐसी बातों का वर्णन मिलता है जब प्राण लिए गए और जन कल्याण के लिए उनका पालन किया गया।
ऐसी ही एक प्रतिज्ञा श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में ली और महाभारत युद्ध के दौरान उसका पालन किया। यह प्रतिज्ञा थी युद्ध के दौरान कोई भी शस्त्र न उठाने की।
वैसे देखा जाए तो श्री कृष्ण विष्णु जी का ही अवतार थे और किसी बड़ी प्रतिज्ञा का पालन करने के लिए बाध्य नहीं थे, लेकिन उन्होंने धर्म का पालन करते हुए पूरे युद्ध में अर्जुन का साथ दिया और गीता का उपदेश भी दिया।
महाभारत के भीष्म पर्व में इस बात का वर्णन है कि आखिर क्यों कृष्ण जी ने ऐसा प्राण लिया और कब उन्हें इसके विरुद्ध भी काम करना पड़ा। आइए आपको बताते हैं इसके कारणों के बारे में।
श्रीकृष्ण ने क्यों लिया शस्त्र न उठाने प्रण?
महभारत युद्ध के आरंभ में ही श्री कृष्ण ने कोई भी हथियार न उठाने का वचन दिया था और प्रण लिया था कि वो धर्म के पक्ष में ही युद्ध लड़ेंगे। ऐसा इसलिए था क्योंकि अगर श्री कृष्ण स्वयं ही योध लड़ते, तो यह वास्तव में तुरंत ही विजयी होकर युद्ध का समापन कर देते। यही नहीं पूरे महाभारत के दौरान कई विषम परिस्थितियां आईं, लेकिन श्री कृष्ण अपने वचन पर स्थिर बने रहे और उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र या कोई भी शस्त्र नहीं चलाया और ना ही किसी से युद्ध किया। पूरे युद्ध में वो केवल अर्जुन के सारथी के रूप में ही विराजमान थे।
न्याय के लिए नहीं उठाया कोई भी शस्त्र
महाभारत युद्ध में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं युद्ध ना करने का निर्णय इसलिए भी लिया था क्योंकि वो अर्जुन को न्याय का साथ देते हुए युद्ध में विजयी होते देखना चाहते थे।
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इसी वजह से कृष्ण जी ने युद्ध आरंभ होने से पूर्व ही अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए कहा कि 'हे अर्जुन! मैं तो केवल मार्गदर्शक हो सकता हूं बुद्धि रूपी रथ का सारथी हो सकता हूं, लेकिन हर व्यक्ति का जीवन में अपना अपना युद्ध होता है और जो अपना युद्ध स्वयं नहीं लड़ सकता है ईश्वर भी उसकी मदद नहीं करते हैं, इसलिए हमेशा यह समझना चाहिए कि जब युद्ध हमारा है तो यह हमें ही लड़ना होगा' यदि कोई व्यक्ति सत्य की लड़ाई लड़ता है, तो ईश्वर भी उसके साथ होते हैं और अवश्य ही वो विजय प्राप्त करता है।
श्री कृष्ण अर्जुन की विजय धर्म पूर्वक चाहते थे
कृष्ण जी सोचते थे कि यदि अर्जुन विजयी होते हैं तो कोई यह न कहे कि उनका साथ स्वयं विष्णु जी के अवतार श्री कृष्ण ने दिया। यदि अर्जुन अपने बलबूते पर युद्ध लड़ते तो वह न्याय संवत था।
इसलिए श्री कृष्ण ने सोचा कि अर्जुन अपने रिश्तेदारों से अकेले ही लड़ने के लिए काफी बहादुर हैं, लेकिन जब गीता के उपदेश के बाद भी, अर्जुन भीष्म पितामह के विरुद्ध शस्त्र चलाने से पीछे हट गए उस समय क्रोधित होकर, श्री कृष्ण ने एक रथ का पहिया उठा लिया। यह देखकर अर्जुन ने क्षमा प्रार्थना की और स्वयं ही पूरा युद्ध लड़ने का निर्णय लिया।
महभारत के कई ऐसे प्रसंग हैं जो किसी व्यक्ति विशेष की प्रतिज्ञा को दिखाते हैं और यह भी दिखाते हैं कि कैसे सभी ने अपने प्रण का पालन धर्म पूर्वक किया था।
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