Dasha Mata ki Katha: घर में चल रही है भयंकर दरिद्रता? आज ही पढ़ें दशा माता की ये पावन कथा
घर की बिगड़ती दशा को सुधारने और सुख-समृद्धि पाने के लिए जरूर पढ़ें दशा माता की ये पावन व्रत कथा। ...और पढ़ें
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Dasha Mata Ki Katha: दशा माता की कहानी (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेक्स, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में 'दशा माता' (Dasha Mata) का व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव को समझने और धैर्य रखने की एक महान सीख है। यह कहानी हमें बताती है कि इंसान का वक्त (दशा) हमेशा एक जैसा नहीं रहता, लेकिन सच्ची श्रद्धा से बिगड़े हुए हालात भी सुधर सकते हैं।
यहां पढ़ें कथा
प्राचीन समय में राजा नल और रानी दमयंती का एक खुशहाल राज्य था। एक दिन एक ब्राह्मणी रानी के पास आई, जिसके गले में पीला धागा (डोरा) बंधा था। उसने बताया कि यह 'दशा माता' का डोरा है, जिसे पहनने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। रानी ने भी वह धागा पहन लिया।
जब राजा नल ने रानी के गले में वह धागा देखा, तो वे बोले, "हमें किसी चीज की कमी नहीं है, फिर इस धागे की क्या जरूरत?" और उन्होंने जबरदस्ती वह धागा तोड़कर फेंक दिया। उसी रात राजा के सपने में बुढ़िया के रूप में दशा माता आईं और कहा, "हे राजा! तेरी अच्छी दशा जा रही है और अब बुरी दशा आ रही है।"
दुखों का पहाड़ और परीक्षा की घड़ी
अगले ही दिन से राजा का ऐश्वर्य छिन गया। गरीबी इस कदर बढ़ी कि राजा-रानी को अपना देश छोड़कर जाना पड़ा। उन्होंने अपने बच्चों को एक भील राजा के पास अमानत के तौर पर छोड़ा और खुद काम की तलाश में भटकने लगे।
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रास्ते में उनके साथ अजीब घटनाएं होने लगीं:
- मित्र ने उन्हें प्यार से सुलाया, लेकिन खूंटी पर टंगा हार 'खूंटी' ही निगल गई। चोरी के इल्जाम के डर से वे रात में ही वहां से भाग निकले।
- जब राजा अपनी बहन के पास पहुंचे, तो गरीबी देख बहन ने उन्हें खाने में 'कांदा-रोटी' (प्याज-रोटी) दी। रानी ने वह रोटी जमीन में गाड़ दी।
- भूख लगने पर रानी ने कुछ मछलियां भूनने की कोशिश की, लेकिन वे जीवित होकर नदी में कूद गईं। किस्मत ऐसी थी कि राजा के हाथ से भी चील ने सारा भोजन झपट लिया। दोनों को लगा कि दूसरा शायद झूठ बोल रहा है।
जब बदली तकदीर
भटकते हुए वे रानी के मायके पहुंचे। वहां रानी ने दासी का और राजा ने एक तेली के यहां काम करना शुरू किया। जब 'होली दसा' (दशा माता का दिन) आया, तब रानी ने अपनी माता (राजमाता) के साथ स्नान किया। जब राजमाता ने रानी का सिर गूंथा, तो उन्होंने उसकी पीठ पर 'पद्म' का निशान देखा और अपनी बेटी को पहचान लिया।

(Image Source: AI-Generated)
रानी ने रोते हुए सब बताया और दशा माता का व्रत पूरे नियम से किया। व्रत के प्रभाव से माता प्रसन्न हुईं और उनके बुरे दिन खत्म हो गए।
अचानक होने लगे चमत्कार
- जब राजा नल और रानी वापस अपने राज्य की ओर चले, तो चमत्कार होने लगे।
- रानी ने जहां कांदा-रोटी गाड़ी थी, वहां अब सोने की रोटी और चांदी का कांदा निकला।
- वही खूंटी हार उगलने लगी, जिससे मित्र के मन का संदेह दूर हुआ।
- उन्होंने उनके बच्चों को सकुशल लौटा दिया।
- जब वे अपनी राजधानी पहुंचे, तो प्रजा ने ढोल-नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया। दशा माता की कृपा से राजा का वैभव पहले से भी ज्यादा बढ़ गया।
व्रत के जरूरी नियम और पूजा विधि
कच्चे सूत का डोरा: इस दिन महिलाएं कच्चे सूत का एक डोरा लेती हैं, जिसमें 10 गांठें लगाई जाती हैं। इसे 'दशा माता का डोरा' कहा जाता है।
पीपल की पूजा: इस दिन पीपल के पेड़ की पूजा का सबसे ज्यादा महत्व है। महिलाएं सूत का डोरा लेकर पीपल की 10 बार परिक्रमा करती हैं और डोरी को पेड़ पर लपेटती हैं।
एक समय का भोजन: इस व्रत में पूरे दिन में सिर्फ एक बार ही भोजन किया जाता है, वह भी बिना नमक का। खाने में मुख्य रूप से गेहूं का इस्तेमाल किया जाता है।
घर की सफाई: इस दिन घर की साफ-सफाई का खास ख्याल रखा जाता है। पुराने झाड़ू या बेकार कचरे को घर से बाहर निकाल दिया जाता है ताकि लक्ष्मी जी का वास हो सके।
नल-दमयंती की कथा: बिना दशा माता की कथा (Dasha Mata ki Katha) सुने यह व्रत अधूरा माना जाता है। राजा नल और रानी दमयंती की कहानी इस दिन विशेष रूप से सुनी जाती है।
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