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    Shani Pradosh Vrat 2026: प्रदोष व्रत के दिन करें शिव मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ, जीवन के सभी दुख होंगे दूर

    Updated: Tue, 10 Feb 2026 02:20 PM (IST)

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, शनि प्रदोष व्रत 14 फरवरी 2026 को है। इस दिन महादेव और मां पार्वती की पूजा के साथ शिव मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करने से जन्म- ...और पढ़ें

    Shani Pradosh Vrat 2026: कैसे प्राप्त करें महादेव की कृपा (Image Source: AI-Generated)

    Shani Pradosh Vrat 2026: कैसे प्राप्त करें महादेव की कृपा (Image Source: AI-Generated) 

    HighLights

    1. शनि प्रदोष व्रत 14 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा

    2. शिव मृत्युंजय स्तोत्र पाठ से पाप मिटते हैं

    3. महादेव की कृपा से जीवन में खुशियां आती हैं

    धर्म डेक्स, नई दिल्ली। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शनि प्रदोष व्रत (Shani Pradosh Vrat 2026) के दिन विधिपूर्वक महादेव और मां पार्वती की साधना करने से साधक के जन्म-जन्मांतर के पाप मिट जाते हैं और शिव जी की कृपा से जीवन में खुशियों का आगमन होता है। इस दिन पूजा के दौरान सच्चे मन से शिव मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ जरूर करना चाहिए।

    ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र का पाठ करने से महादेव प्रसन्न होते हैं और साधक की सभी मुरादें पूरी करते हैं। साथ ही जीवन की सभी समस्याएं दूर होती हैं।

    प्रदोष व्रत 2026 डेट और शुभ मुहूर्त (Pradosh Vrat 2026 Date and Shubh Muhurat)


    वैदिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन का पहला प्रदोष व्रत 14 फरवरी को प्रदोष व्रत किया जाएगा।
    फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत- 14 फरवरी को दोपहर 04 बजकर 01 मिनट पर
    फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि का समापन- 15 फरवरी को शाम 05 बजकर 04 मिनट पर

    lord shiv  (16)

    ॥ शिव मृत्युंजय स्तोत्र॥

    रत्नसानुशरासनं रजताद्रिश्रृंगनिकेतनं

    शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम्।

    क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवंदितं

    चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥

    पंचपादपपुष्पगन्धिपदाम्बुजद्वयशोभितं

    भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम्।

    भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशिनं भवमव्ययं

    चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥

    मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं

    पंकजासनपद्मलोचनपूजितांगघ्रिसरोरुहम्।

    देवसिद्धतरंगिणी करसिक्तशीतजटाधरं

    चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥

    कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वरकुण्डलं वृषवाहनं

    नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम्।

    अंधकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं

    चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥

    यक्षराजसखं भगाक्षिहरं भुजंगविभूषणं

    शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम्।

    क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं

    चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥

    भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं

    दक्षयज्ञविनाशिनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम्।

    भुक्तिमुक्तिफलप्रदं निखिलाघसंघनिबर्हणं

    चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥

    भक्तवत्सलमर्चतां निधिमक्षयं हरिदम्बरं

    सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनूपमम्।

    भूमिवारिनभोहुताशनसोमपालितस्वाकृतिं

    चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥

    विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं

    संहरन्तमथ प्रपंचमशेषलोकनिवासिनम्।

    क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमाव्रतं

    चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:॥

    रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम्।

    नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥

    कालकण्ठं कलामूर्तिं कालाग्निं कालनाशनम्।

    नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥

    नीलकण्ठं विरुपाक्षं निर्मलं निरूपद्रवम्।

    नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥

    वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम्।

    नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥

    देवदेवं जगन्नाथं देवेशमृषभध्वजम्।

    नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥

    अनन्तमव्ययं शान्तमक्षमालाधरं हरम्।

    नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥

    आनन्दं परमं नित्यं कैवल्यपदकारणम्।

    नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥

    स्वर्गापवर्गदातारं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणम्।

    नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति॥

    ॥ इति श्रीपद्मपुराणान्तर्गत उत्तरखण्डे श्रीमृत्युञ्जयस्तोत्रं सम्पूर्णम्। ॥

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