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    7 जीभ, 3 पैर और 2 सिर: वेदों के वो शक्तिशाली देवता, जो हर घर में मौजूद हैं!

    Updated: Thu, 09 Jul 2026 10:35 AM (IST)

    अग्नि पंचमहाभूतों में से एक है और हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है, जो सभी अनुष्ठानों में अहम भूमिका निभाती है। इसे देवताओं और मनुष्यों के बीच संदेश ...और पढ़ें

    अग्नि देवता का असली रूप (Picture Credit- AI Image)

    अग्नि देवता का असली रूप (Picture Credit- AI Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश सृष्टि और मानव शरीर से जुड़े पांच मूल तत्व हैं, जिन्हें पंचमहाभूत के नाम से भी जाना जाता है। पंच तत्वों में अग्नि का खास महत्व है। हिंदू धर्म में सभी तरह के अनुष्ठान अग्नि से ही शुरू होते हैं।

    ऋग्वेद और कई अन्य धार्मिक ग्रंथों में अग्नि का उल्लेख अग्नि देवता के रूप में देखने को मिलता है। यहां तक कि हमारे वेदों का पहला ही शब्द अग्नि से शुरू होता है। हवन से लेकर आरती करने के लिए अग्नि सबसे अहम चीज मानी जाती है।

    हिंदू धर्म में अग्नि को मनुष्यों और देवताओं के बीच का दूत यानी संदेशवाहक माना गया है। जब हमें अपनी प्रार्थनाओं को देवता तक पहुंचाना होता है, तो हम यज्ञ के माध्यम से अग्नि का सहारा लेते हैं। प्राचीन इतिहास में अग्नि क शुद्ध करने वाली शक्ति के रूप में भी देखा जाता है।

    अग्नि का आम जीवन में महत्व

    अग्नि के माध्यम से ही खाना पकाया जाता है, क्योंकि यह सबके चूल्हे में मौजूद है। लोगों के पेट में भोजन आग के द्वारा ही पचता है। अग्नि मनुष्य के अस्तित्व और विकास दोनों के लिए अत्यंत जरूरी चीजों में शामिल है, यही वजह है कि, सदियों से अग्नि को सम्मान की नजर से देखा जाता है, और लोग उसकी पूजा करते हैं।

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    पौराणिक कथाओं में अग्नि 

    हिंदू धर्म से जुड़े कई पौराणिक ग्रंथों में अग्नि देवता को कभी-कभी स्वर्ग के स्वामी देवराज इंद्र का जुड़वा भाई बताया जाता है। वैदिक काल में इंद्र के बाद सबसे बड़ा स्थान अग्नि देवता का था।

    अग्नि देव कैसे दिखाई देते हैं?

    माना जाता है कि, अग्नि देवता के दो सिर हैं, जिसमें एक सिर अमरता तो दूसरा जीवन का प्रतीक है। इंद्र और वरुण के साथ प्रारंभिक वैदिक काल के सर्वश्रेष्ठ देवताओं में से एक थे। उन्हें आमतौर पर स्वर्ग और पृथ्वी तथा मानव और देवताओं के बीच की कड़ी भी कहा जाता है।

    उनका वाहन एक मेढ़ा को माना जाता है। अग्नि पूजा की शुरुआत प्रारंभिक वैदिक काल में रहने वाले लोगों द्वारा की गई थी। उन्हें यज्ञ की अग्नि के रूप में दर्शाया जाता है। माना जाता है कि, अग्नि का जन्म तीन स्तरों, पृथ्वी, मध्य आकाश और स्वर्ग में हुआ था। अग्नि देवता के जन्म को लेकर भी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

    अग्नि को मानव रूप में कैसे दिखाया जाता है?

    जब अग्नि देवता को मानव रूप में दिखाया जाता है, तो उन्हें दो मुख वाला दिखाया जाता है, जिनके शरीर पर घी लगा होता है, ताकि ज्वाला को ईंधन मिल सके। उनकी 7 ज्वलंत जीभें और नुकीले सुनहरे दांत होते हैं। बाल काले और लंबे और शरीर का रंग लाल होता है।

    उनके शरीर के अंदर से रोशनी की सात किरणें निकलती हैं और उनके साथ हाथ और तीन पैर होते हैं। उन्हें आमतौर पर मेमनों या बकरियों पर सवार दिखाया जाता है या कभी-कभी तोतों पर सवार होते हैं।

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    अग्नि देवता भेदभाव से परे

    माना जाता है कि, अग्नि देवता अपने भक्तों में किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करते हैं। वे सभी के घर में निवास करते हैं। उनके लिए जवान और बूढ़ा, अमीर-गरीब, ब्राह्मण-क्षत्रिय सभी एक समान हैं। माना जाता है कि, जब लोग अग्नि का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्हें इसे अलग-अलग दिशाओं में करना चाहिए।

    किस दिशा में अग्नि का कौन-सा प्रयोग

    देवताओं को अर्पण करने के लिए हमेशा अग्नि का इस्तेमाल पूर्व दिशा में करना चाहिए।

    जबकि दक्षिण दिशा में अग्नि का उपयोग मृतक को अर्पण के लिए करना चाहिए।

    खाना पकाने के लिए अग्नि का इस्तेमाल पश्चिम दिशा में करना चाहिए। अग्नि मृत्यु के बाद पाप को कम करने या उसे अमरता देने की शक्ति भी होती है।

    वैदिक काल से ही सबसे जरूरी देवताओं में से एक होने के कारण अग्नि आज भी मनु्ष्यों के लिए काफी खास माने जाते हैं और अग्नि देव के आशीर्वाद के बिना पृथ्वी पर जीवन बने रहना काफी मुश्किल है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।