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    सतयुग से लेकर महाभारत तक, अक्षय तृतीया से जुड़े हैं ये गहरे रहस्य, पढ़ें इस दिन क्या-क्या हुआ था?

    Updated: Mon, 06 Apr 2026 07:14 PM (IST)

    अक्षय तृतीया हिंदू धर्म में केवल सोना खरीदने या शुभ कार्यों की शुरुआत का दिन नहीं है, बल्कि यह युगों के प्रारंभ की तिथि मानी जाती है। ...और पढ़ें

    Akshaya Tritiya History: अक्षय तृतीया से जुड़ी पौराणिक कथाएं। (Ai Generated Image)

    Akshaya Tritiya History: अक्षय तृतीया से जुड़ी पौराणिक कथाएं। (Ai Generated Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया को केवल सोना खरीदने या शुभ कामों की शुरुआत का दिन ही नहीं माना जाता, बल्कि यह तिथि ब्रह्मांड के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं की गवाह रही है। शास्त्रों में इसे युगादि तिथि कहा गया है, जिसका मतलब है युगों के प्रारंभ की तिथि। सतयुग से लेकर द्वापर के महाभारत काल तक, इस दिन कई ऐसी दिव्य घटनाएं घटीं, जिन्हें लोग आज भी याद करते हैं। आइए जानते हैं अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya 2026) के उन गहरे रहस्यों के बारे में, जो इसे साल की सबसे पवित्र तिथि बनाते हैं।

    अक्षय तृतीया से जुड़े 5 पौराणिक रहस्य

    Akshay Tritiya 2026 katha 2

    Ai Generated Image

    सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ

    मत्स्य पुराण के अनुसार, अक्षय तृतीया ही वह दिन है, जब समय चक्र बदला और सतयुग व त्रेतायुग की शुरुआत हुई। इसीलिए इसे 'कृतयुगादि' तिथि भी कहते हैं। इस दिन किया गया कोई भी आध्यात्मिक काम अक्षय फल देता है, क्योंकि इसकी शुभता सीधे युग परिवर्तन से जुड़ी है।

    स्वर्ग से धरती पर आईं मां गंगा

    वाल्मीकि रामायण के बालकांड के अनुसार, राजा भगीरथ की कठिन तपस्या के बाद मां गंगा स्वर्ग की पवित्रता लेकर इसी दिन पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। उनके स्पर्श से भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार हुआ, इसीलिए अक्षय तृतीया पर गंगा स्नान का फल अश्वमेध यज्ञ के समान माना जाता है।

    भगवान परशुराम का प्राकट्य

    कलिका पुराण और महाभारत के वन पर्व के अनुसार, अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। भगवान विष्णु ने इसी दिन माता रेणुका के गर्भ से परशुराम के रूप में छठा अवतार लिया था। वे चिरंजीवी माने जाते हैं, इसीलिए इस दिन की ऊर्जा भी अक्षय यानी कभी खत्म न होने वाली होती है।

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    महाभारत का लेखन और अक्षय पात्र

    महाभारत कथा के अनुसार, महर्षि वेदव्यास जी ने इसी दिन गणेश जी को महाभारत सुनाना और लिखवाना शुरू किया था। साथ ही, वनवास के दौरान भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को अक्षय पात्र इसी दिन भेंट किया था, जिससे पांडवों के पास भोजन की कभी कमी नहीं हुई।

    बद्रीनाथ धाम के कपाट

    हिमालय की गोद में स्थित बद्रीनाथ धाम के कपाट ठंड के बाद इसी दिन भक्तों के लिए खोले जाते हैं। इसके साथ ही नर-नारायण ने इसी दिन तपस्या की थी, जिससे इस स्थान का आध्यात्मिक महत्व बढ़ गया।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।